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Indian Mangoes: विश्व के शीर्ष आम उत्पादक भारत को बागवानों की कमाई में सुधार के लिए अपनानी होगी मजबूत रणनीति

अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ कृषि पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 16 Jul 2025 09:01 AM IST
सार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है, लेकिन निर्यात में मैक्सिको से पीछे है। देश में आम की 1000 से अधिक किस्में होने के बावजूद, पुराने बाग, कीट एवं रोगों का प्रकोप, मौसम की मार और बिचौलियों के दबदबे से किसानों को अपनी फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता। 

भारतीय आमों का इतिहास 4000 साल पुराना है और भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक है।
भारतीय आमों का इतिहास 4000 साल पुराना है और भारत विश्व का सबसे बड़ा आम उत्पादक है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गांव, कस्बों और शहरों में आम का मौसम जोरों पर है। आमों से लदे पेड़ और बाजारों में फैली आमों की खुशबू हर किसी को लुभा रही है। अमीर-गरीब सभी के लिए सुलभ आम ग्रामीण संस्कृति का हिस्सा हैं, जो इस मौसम को उत्सव में बदल देता है। हमारे यहां अल्फांसो और दक्षिण भारतीय आम फरवरी से ही बाजार में आने लगते हैं और फिर अलग-अलग अंचलों के आमों का क्रम जुलाई और अगस्त के बीच तक चलता है। अमीर खुसरो ने आम को 'फलों का राजा' कहा, तो टैगोर और गालिब ने इसकी प्रशंसा में रचनाएं लिखीं। अकबर इलाहाबादी ने अपने दोस्त मुंशी निसार हुसैन को पत्र में लिखा-‘नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिए, इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए।’ 

उत्पादन और वैश्विक स्थिति
भारत में इस सीजन में 228.37 लाख टन आम उत्पादन का अनुमान है। वर्ष 1975-76 में 74 लाख टन से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 224 लाख टन तक आम उत्पादन पहुंचा है। भारत दुनिया में सबसे बड़ा आम उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का आधा हिस्सा देता है। आम उत्पादन में दूसरे और तीसरे नंबर पर चीन और इंडोनेशिया जैसे देश हैं। प्रमुख आम उत्पादक देशों में थाईलैंड, पाकिस्तान, मैक्सिको, इंडोनेशिया, ब्राजील, बंगलादेश, फिलीपींस और नाईजीरिया भी शामिल हैं। दुनिया के 63 देशो में आम की पैदावार होती है। आम की उत्पादकता कई देशों में भारत से ज्यादा है, पर विविधता में भारतीय आमों के आगे कोई नहीं है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में आम के लिए अंबा शब्द प्रयुक्त हुआ है। इसका अंग्रेजी नाम मैंगो मूल रूप से मलयाली मंगा से पुर्तगालियों ने लिया। 

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देश में 1000 से अधिक किस्में 
आम का वैज्ञानिक नाम मैंगीफेरा इंडिका है। इसकी उत्पत्ति भारत में मानी जाती है। दुनिया की 1365 आम की किस्मों में से 1000 किस्में भारत में हैं। 300 किस्में उत्तर और उत्तर-पूर्व में पाई जाती हैं, और आम की 700 किस्में पश्चिम व दक्षिण भारत में मिलती हैं। कुछ अध्ययनों में आमों की 1565 किस्मों का उल्लेख भी मिलता है। लेकिन, समय के साथ देसी आम की प्रजातियों का हमारा अनूठा खजाना खतरे में है। हालांकि, सामुदायिक स्तर पर देसी आम की प्रजातियों के संरक्षण की मुहिम भी जारी है। वर्ष 2020 में कन्नूर जिले (केरल) की आम की 102 प्रजातियों वाले कन्नपुरम गांव को देसी आम विरासत क्षेत्र घोषित किया गया है। 

लोकजीवन में आम की हैसियत
आम न केवल स्वादिष्ट फल है, बल्कि हमारी संस्कृति में इसका विशेष स्थान है। आम की छाल, जड़ और लकड़ी उपयोगी हैं। पंच-पल्लव और वंदनवार में आम के पत्ते शुभता का प्रतीक माने जाते हैं। पिछले साल अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा में पुणे से भेजे गए 11 हजार आम भोग में चढ़ाए गए। शुभ अवसरों पर आम का पेड़ लगाना भी हमारी परंपरा है।

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4000 साल पुराना इतिहास  
भारतीय आमों का इतिहास 4000 साल पुराना है। सबसे पहले बौद्ध धर्म के प्रचारक इसे पूर्वी एशियाई देशों में ले गए। ह्वेनसांग और इब्नबतूता ने भी इसकी ख्याति पूर्वी एशिया और विश्व में फैलाई। भगवान बुद्ध का भी यह प्रिय फल बताया जाता है। सांची, भरहुत औऱ अजंता के भित्तिचित्रों में आम का चित्रण है। अशोक ने अपने राज में सड़कों के किनारे आम के पेड़ लगवाए। सिंकदर इसकी कलमें यूरोप और पुर्तगाली ब्राजील ले गए। अमेरिका में आम 1861 में पहली बार उगाया गया। भारत में विभिन्न कालखंडों में राजाओं, नवाबों और बादशाहों ने आम की खेती को प्रोत्साहन दिया। बादशाह अकबर ने बिहार में लक्खी बाग लगवाया, जिसमें एक लाख आम के पेड़ लगाए गए। आधुनिक दौर में गुजरात में जामनगर में मुकेश अंबानी ने 1.30 लाख से अधिक पेड़ों का बाग लगवाया है, जिसमें 200 से अधिक किस्मों के आम हैं।

आम की व्यावसायिक खेती 
आम के बाजार में अल्फांसों से लेकर दशहरी और दूसरी कई प्रजातियों के कद्रदान हैं। आम की 15 से 25 प्रजातियों की व्यावसायिक खेती हो रही है। उत्तर भारत में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, रटोल, बॉम्बे ग्रीन और लखनऊ सफेदा प्रचलित हैं। दक्षिण में बंगलोरा, बंगनपल्ली, नीलम, सुवर्णलेखा, तोतापुरी का जलवा अधिक है। वहीं, पूर्वी भारत में फजली, किशनभोग, लंगड़ा, हिमसागर की मिठास बिखरी है। पश्चिमी भारत में अलफांसो, केसर, वनराज, पैरी लोकप्रिय हैं, तो मध्य भारत की सुंदरेजा किस्म प्रमुख है।

हाईब्रिड आमों में आम्रपाली, मल्लिका, अंबिका, रत्ना का जलवा है और कुछ अन्य बौनी किस्में भी व्यावसायिक खेती में धीरे-धीरे जोर पकड़ रही हैं। ऑनलाइन बिक्री में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, सफेदा, बंगनपल्ली, इमामपसंद, मलगोवा, अल्फांसो रत्नागिरी काफी लोकप्रिय हैं। अल्फांसो, जिसे हापुस भी कहते हैं, के समंदर किनारे बसे उत्पादक किसान सबसे संपन्न हैं। वर्ष 2011 में ही उन्होंने ई-कॉमर्स के सहारे अपने उत्पादों की बिक्री आरंभ कर दी थी। निर्यात में तो वे अग्रणी हैं ही, संगठित भी हैं।

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छह राज्यों की 70% हिस्सेदारी 
यूपी का आम उत्पादन में एक-चौथाई योगदान है, जबकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक और गुजरात में एक से एक अच्छी प्रजातियां हैं। देश में आम उत्पादन में 6 राज्यों की हिस्सेदारी 70% है। यूपी में कई जिलों में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, रामकेला, रटौल, लखनऊ सफेदा, गौरजीत, आम्रपाली और मल्लिका होता है। चार दशक पहले मलिहाबाद के आसपास तक ही दशहरी सीमित था, पर अब इसका दायरा बहुत विस्तृत है।

पश्चिमी यूपी के मेरठ जिले का शाहजहांपुर गांव आम उत्पादन में अग्रणी है। 25 हजार की आबादी वाले इस गांव की 96% भूमि पर 400 प्रजातियों के आम होते हैं। लेकिन, आम किसानों की स्थिति ठीक नहीं है। मुगल फौज में मनसबदार दीवान अब्बास खां ने 1632 में यह गांव बसाकर बाग लगाया। गन्ना किसानों की तुलना में एक बीघे में आम किसान एक चौथाई आय प्राप्त करता है। कई कारणों से आम की खेती की लागत बढ़ रही है।

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एक गांव में 700 प्रजातियां  
यूपी में कई इलाकों में आम की बागवानी में पठानों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। दिल्ली के करीब बागपत जिले के रटौल गांव में आम की 700 प्रजातियां है। रटौल आम को जीआई टैंग मिलने के बाद, वर्ष 2022 से विदेशी बाजार में भी इसकी जगह बनी। मूल रूप से यहीं की अनवर रटौल किस्म से पाकिस्तान भारी विदेशी मुद्रा कमा रहा है। रटौल गांव की तीस हजार की आबादी में 70% लोगों का भरण पोषण आम ही करता है। 1975 में रटौल को फल पट्टी में शामिल किया गया, पर सुविधाओं का अभाव बना रहा। आज रटौल में बागों से कई प्रजातियां समाप्त हो रही हैं।

बढ़ रहा आम का निर्यात 
भारत सेे मार्च में अल्फांसो, मई-जून में केसर और बेगनपल्ली, तथा जून-जुलाई में दशहरी, लंगड़ा, चौसा, मल्लिका और मालदा आमों का निर्यात होता है। भारी उत्पादन के बावजूद, भारत निर्यात में मैक्सिको से पीछे है। जीआई टैग वाली आम की 14 प्रजातियों का एपीडा की मदद से निर्यात बढ़ रहा है। वर्ष 2023-24 में यूएई ने 15,336 टन (अधिकतर अल्फांसो और केसर) और अमेरिका ने 2,113.4 टन आम खरीदे। इस साल दशहरी पहली बार दुबई 211 रुपये/किलो के रेट पर भेजा गया, पर मात्रा कम थी। वहीं, अमेरिका में कड़े नियमों के कारण एक बड़ी खेप खारिज हो गई।

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अनुसंधान की धीमी गति
आम की नई प्रजातियों के अनुसंधान और खेती की लागत कम करने की दिशा में सीमित काम हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर आम के प्रोत्साहन के लिए विशिष्ट संस्था नहीं बनी है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के अनुसंधानों की बात करें तो प्रयोगशाला से बागों के बीच काफी दूरी है। किसानों के किए गए प्रयोग भी सीमित असर वाले हैं। फिर भी कोटा के किसान श्रीकृष्ण सुमन की आम की एक सदाबहार प्रजाति निकली, जो चर्चा में है। मलिहाबाद के पदमश्री कलीममुल्लाह खान तो हर साल सुर्खियों में रहते हैं। मैंगो-मैन के नाम से मशहूर पद्मश्री सम्मानित बागवानी विशेषज्ञ कलीमुल्लाह ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद आम की नई विकसित किस्म का नाम देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के नाम पर रखा है। 

वाजिब दाम का सवाल
उचित दाम न मिलने के साथ आम किसानों के सामने कई तरह के संकट हैं। हाल में, तेलंगाना के वारंगल जिले के किसान सतीश सुर्खियों में रहे। उनके बाग से निकले सात क्विंटल आमों का रेट बिचौलियों ने केवल 500 रुपये लगाया तो उन्होंने अपने आम लोगों को फ्री में बांट दिए। कर्नाटक में भी व्य़थित आम किसान आंदोलित रहे। 

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देश में आम के 35-40% बाग पुराने हैं। आमों में अनियमित फलन के अलावा तापमान में उतार-चढाव, बैमौसमी बारिश और आंधी से उत्पादकता प्रभावित होती है। कीट एवं व्याधियों के कारण भी काफी नुकसान होता है। आम किसान असंगठित हैं और सहकारिता आंदोलन का असर भी उन पर चंद इलाकों तक ही सीमित है। अधिकतर इलाकों में बिचौलियों का ही आम बागानों पर कब्जा है। कई राज्य सरकारें आम महोत्सव जरूर मनाती हैं, पर आम किसानों तक मदद पहुंचाने के लिए मजबूत तंत्र और रियायतों की अधिक जरूरत है। 


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