नकली बीज और कमजोर कानून : टिकाऊ खेती पर मंडराता संकट
अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ कृषि पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sun, 15 Jun 2025 12:18 PM IST
सार
बीज खेती की नींव हैं, लेकिन नकली बीज, मुनाफाखोरी और कमजोर कानूनी ढांचा टिकाऊ खेती को चुनौती दे रहे हैं। वर्ष 1966 का बीज अधिनियम पुराना पड़ चुका है, नया कानून वर्षों से लंबित है, जिससे किसानों का शोषण और कमजोर गुणवत्ता के बीजों की समस्या बढ़ रही है।
नकली, अप्रमाणिक और अनाधिकृत बीजों की बिक्री ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
- फोटो : गांव जंक्शन
कृषि के छह स्तंभों - मिट्टी, बीज, जल, जलवायु, किसान और औजार - में बीज सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। एक पुरानी कहावत है - 'जैसा बीज बोओगे, वैसी ही फसल काटोगे।’ बीजों के महत्व को देखते हुए, यह कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और हमेशा बनी रहेगी। एक समय था, जब परंपरागत रूप से किसान अपनी फसल का एक हिस्सा बीज के रूप में अगली बुवाई के लिए सुरक्षित रख लेते थे। लोग आपस में बीजों का आदान-प्रदान भी करते थे। कोई व्यावसायिक लेनदेन नहीं था। लेकिन, हरित क्रांति के बाद खेती का स्वरूप बदल गया और हाईब्रिड एवं उन्नत बीजों ने पारंपरिक बीजों की जगह ले ली।
भारत का बीज बाजार
हाईब्रिड एवं उन्नत बीजों से कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन बीज विशालकाय कारोबार का हिस्सा बन गए और उन पर समुदायों का अधिकार कमजोर होता चला गया। आज भारत का बीज बाजार 15,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें बाजरा, सरसों, धान, मक्का और सब्जियों के हाईब्रिड बीजों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। फिर भी, प्रमुख फसलों में बीज बदलने की दर केवल 10-12% है और कई किसान अब भी परंपरागत या फार्म-रक्षित बीजों पर निर्भर हैं। सब्जियों के उन्नत बीजों की मांग में भारी वृद्धि हुई है, लेकिन नकली बीजों और मनमानी कीमतों ने किसानों को संकट में डाला है।
नकली बीजों का कहर
वर्तमान में बीजों की गुणवत्ता और बिक्री को नियंत्रित करने के लिए बीज अधिनियम, 1966, बीज नियम, 1968, और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 के साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू हैं। 1988 की बीज विकास नीति ने आयातित बीजों के लिए उदार नीतियां शुरू कीं और गैट समझौते के बाद बीज संरक्षण की दिशा में कुछ कदम उठे। लेकिन, ये कानून अब पुराने पड़ चुके हैं। राज्यों में बने बीज नियंत्रण तंत्र ध्वस्त हो चुके हैं और नकली, अप्रमाणिक और अनाधिकृत बीजों की बिक्री ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। वर्ष 2023-24 में 1,33,588 बीज नमूनों में से 3,630 घटिया पाए गए, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। बीज कंपनियों की मुनाफाखोरी और अनियंत्रित कीमतों ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। राष्ट्रीय बीज निगम और सरकारी तंत्र ही कुछ हद तक उचित दाम पर बीज उपलब्ध करा पाते हैं, लेकिन यह मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
नए बीज कानून की जरूरत
बीज नीति में सुधार की जरूरत को समझते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक डॉ. एम.वी. राव की अध्यक्षता में 1997 में गठित समिति ने व्यापक सिफारिशें दी थीं। इनमें पादप प्रजनक अधिकार, बीज उत्पादन और वितरण, गुणवत्ता नियंत्रण, आयात-निर्यात और बीज क्षेत्र में विदेशी निवेश शामिल थे। वर्ष 2004 में कृषि मंत्रालय ने राज्यसभा में बीज विधेयक पेश किया, जिसमें बिना पंजीकरण के बीज बिक्री पर रोक और किसान हितैषी उपाय शामिल थे। संसद की स्थायी समिति ने 2006 में इसकी छानबीन कर सुझाव दिए, लेकिन यह विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।
वर्ष 2005 में पादप किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना हुई, लेकिन बीज विधेयक ठंडे बस्ते में ही रहा। वर्ष 2019 में मोदी सरकार ने नए सिरे से प्रयास किया, जिसमें खराब बीज बेचने वाली कंपनियों पर 5 लाख रुपये का जुर्माना और एक साल की कैद का प्रावधान था। अनिवार्य पंजीकरण, मुआवजा, मूल्य नियंत्रण और विकेंद्रित कार्यान्वयन जैसे प्रावधान शामिल थे, लेकिन यह विधेयक भी न किसानों को सुहाया, न बीज कंपनियों को, और अंततः अटक गया।
बीज कंपनियों की मुनाफाखोरी
बीज कारोबार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है, जो सार्वजनिक बीज कंपनियों पर प्रतिकूल असर डाल रहा है। बिना वैधानिक मूल्य नियंत्रण के ये कंपनियां बेहिसाब मुनाफा कमा रही हैं। कुछ मामलों में इनकी कृषि तंत्र के साथ सांठगांठ भी देखी गई है। नकली बीजों की बिक्री ने कई इलाकों में किसानों की फसलों को बर्बाद किया है। उदाहरण के लिए, पेप्सिको द्वारा गुजरात के 9 किसानों के खिलाफ अपनी पंजीकृत आलू किस्म उगाने और बेचने के लिए मुकदमा दर्ज करना इस समस्या को उजागर करता है। मौजूदा कानूनों में बीज विक्रेताओं के लिए वैध लाइसेंस, डिस्प्ले बोर्ड, स्टॉक रजिस्टर और बिक्री रसीद में पूरी जानकारी अनिवार्य है, लेकिन इनका पालन शायद ही होता है।
किसानों के अधिकार और मुआवजा
नए बीज विधेयक में किसानों के अधिकारों का संरक्षण, फसल नुकसान पर मुआवजा और टर्मिनेटर तकनीक पर रोक जैसे प्रावधान प्रस्तावित थे। बीज नीति 1988 और राष्ट्रीय बीज नीति 2002 में भी संशोधन की जरूरत स्वीकार की गई थी। अगर कोई बीज अंकुरण में विफल रहता है, तो कंपनी को जिम्मेदार ठहराने और मुआवजे का प्रावधान जरूरी है। लेकिन, कीमतों और रॉयल्टी को नियंत्रित करने के लिए कोई आधिकारिक निकाय स्थापित नहीं किया गया। कुछ राज्यों ने अपने बीज कानून बनाने की कोशिश की, लेकिन केंद्र ने इसे अस्वीकार कर दिया, यह कहते हुए कि बीज अधिनियम, 1966 में संशोधन की तैयारी है। हरियाणा ने एक कानून बनाया, लेकिन इसका विरोध हुआ। भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों ने बीजों को किसानों का अधिकार बताते हुए मजबूत कानून की मांग को बार-बार उठाया है।
कानूनी सुधारों में बाधाएं और संभावनाएं
वर्ष 2023-24 में 1,33,588 बीज नमूनों में से 3,630 नमूने; 1,81,153 उर्वरक नमूनों में से 8,988 नमूने और 80,789 कीटनाशक नमूनों में से 2,222 नमूने घटिया पाए गए। यह दर्शाता है कि गुणवत्ता नियंत्रण के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत है।
संसद में कई कानून जटिल प्रक्रियाओं से गुजरते हैं, लेकिन सरकार की इच्छाशक्ति हो तो कोई भी कानून बन सकता है। कोविड के दौरान तीन विवादास्पद कृषि कानून और मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज संशोधन विधेयक जैसे कानून विपक्ष के विरोध के बावजूद पारित हुए। बीज विधेयक को भी ऐसी ही दृढ़ता के साथ लागू किया जा सकता था, लेकिन ताकतवर बीज कंपनियों और नीतिगत जटिलताओं ने इसे रोके रखा। बीज, जीएमओ, जैविक खेती, और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में कानूनी संरक्षण की जरूरत बढ़ रही है। मौजूदा कानूनों में बदलाव और नए बीज कानून की अनुपस्थिति टिकाऊ खेती के सपने को अधूरा छोड़ रही है।
अनुसंधान में प्रगति, बीज कानून में ठहराव
आईसीएआर ने वर्ष 2014-2024 के बीच 2,900 विशिष्ट संकर किस्में विकसित कीं, जिनमें अनाज (1,380), तिलहन (412), और दलहन (437) शामिल हैं। अगले पांच वर्षों में 1,500 नई किस्में विकसित करने का लक्ष्य है। वर्ष 2023-24 में 462.31 लाख क्विंटल बीजों की मांग के मुकाबले 508.60 लाख क्विंटल बीज उपलब्ध थे, जो मांग से अधिक है। लेकिन, गुणवत्ता की जांच में कमी साफ दिखती है।
किसानों की पुकार और भविष्य की राह
किसानों के लिए बीज न केवल खेती का आधार है, बल्कि उनकी आजीविका और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है। नकली बीजों और मुनाफाखोरी ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है। नए बीज कानून में किसानों को मुआवजा, गुणवत्तापूर्ण बीज और उचित कीमतों की गारंटी मिलनी चाहिए। देसी बीजों का संरक्षण और टर्मिनेटर तकनीक पर रोक जैसे कदम टिकाऊ खेती को बढ़ावा देंगे। सरकार को चाहिए कि वह बीज कंपनियों के दबाव से ऊपर उठकर किसान हितैषी नीतियां बनाए। भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों की मांग और पेप्सिको जैसे मामलों ने इस जरूरत को और रेखांकित किया है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि बीज खेती की नींव हैं, लेकिन नकली बीज, मुनाफाखोरी और कमजोर कानूनी ढांचे ने टिकाऊ खेती की कहानी को अधूरा छोड़ दिया है। नया बीज कानून किसानों के अधिकारों, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, और उचित कीमतों की गारंटी के बिना अधूरा है। दशकों से लटका यह कानून अब केवल मांग नहीं, बल्कि किसानों के हक की लड़ाई है। मजबूत इच्छाशक्ति और किसान-केंद्रित नीतियों के साथ ही यह अधूरी कहानी पूरी हो सकती है, जो भारत की टिकाऊ खेती और आत्मनिर्भरता के सपने को साकार करेगी।
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