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खांडसारी बनाम चीनी उद्योग : गन्ने की मीठी फसल से उभरे कड़वे अनुभव

उमेश चतुर्वेदी, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 20 Jun 2026 05:15 PM IST
सार

गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 के प्रस्ताव को वापस लिया जाना दर्शाता है कि बड़े नीतिगत बदलावों के लिए व्यापक सहमति और हितधारकों का विश्वास जरूरी है। किसान संगठनों की आपत्तियों पर नए सिरे से विचार गन्ना क्षेत्र के लिए अधिक संतुलित व व्यावहारिक नीति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 का प्रस्ताव वापस लिए जाने के बावजूद किसान संगठनों की आशंकाएं बनी हुई हैं।
गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 का प्रस्ताव वापस लिए जाने के बावजूद किसान संगठनों की आशंकाएं बनी हुई हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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गन्ने की तासीर मीठी होती है, लेकिन हालिया दिनों में उसमें कुछ कड़वाहट भर गई थी। केंद्र सरकार का प्रस्तावित गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 इसकी वजह बना था, जिसे किसानों संगठनों के तीखे विरोध के बाद अब वापस ले लिया गया है।

किसान संगठनों का कहना है कि यह संशोधित गन्ना नियंत्रण आदेश लागू होने से किसानों की बजाय चीनी मिल मालिकों को फायदा होने की संभावना अधिक थी। इस प्रस्तावित मसौदे को अन्नदाता के मुनाफे पर पाबंदी तक कहा गया।

आरोप यह भी लगे कि आदेश का मसौदा तैयार करते समय चीनी मिलों की राय तो ली गई, लेकिन किसान संगठनों को अंधेरे में रखा गया। 

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किसान संगठन इसलिए हुए नाराज
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अवर सचिव जयवीर सिंह के दफ्तर से 20 अप्रैल को छह दशक पुराने गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 में संशोधन का मसौदा जारी किया गया था। किसान संगठनों को इसके प्रावधानों पर तो आपत्ति है ही, अपनी राय न मांगे जाने को लेकर भी वे खफा हैं। हितधारकों से 20 मई तक राय मांगी गई थी।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक और पीलीभीत के पूर्व विधायक वी.एम. सिंह बताते हैं, देशभर में करीब 600 चीनी मिलें हैं और कई किसान संगठन भी हैं, लेकिन किसी भी किसान संगठन को यह प्रस्ताव आधिकारिक तौर पर नहीं भेजा गया था। 

वी.एम. सिंह कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ और भाजपा के किसान मोर्चा से भी शायद ही राय ली गई होगी। किसान संगठनों का कहना है कि इस आदेश को अंतिम रूप देने से पहले किसान संगठनों की राय ली जानी चाहिए थी।

इस तरह की आपत्तियों को देखते हुए फिलहाल केंद्र सरकार ने प्रस्तावित मसौदे को वापस ले लिया है। 

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किसानों की आपत्ति और विवाद की जड़
प्रस्तावित गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 को लेकर किसान संगठनों की बड़ी आपत्ति एक विशेष प्रावधान को लेकर भी थी। प्रस्तावित कानून में गुड़ और खांडसारी इकाइयों द्वारा सरकार द्वारा तय उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से अधिक कीमत पर किसानों से गन्ना खरीदने पर रोक लगाने का प्रस्ताव शामिल था।

इस बात को लेकर भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक ने सवाल उठाया कि ‘बाजार में मांग बढ़ने पर कृषि उत्पादों को एफआरपी से अधिक कीमत मिलती है, यह बात स्वाभाविक है। सरकार किसानों को ज्यादा दाम मिलने से भला क्यों रोकना चाहती है?’

असल में उत्तर प्रदेश की कई गुड़ और खांडसारी इकाइयां किसानों को गन्ने के लिए 425 रुपये प्रति क्विंटल तक कीमत दे रही हैं। यह कीमत चीनी मिलों से दिए जाने वाले गन्ना मूल्य से ज्यादा है, इसलिए किसान स्वाभाविक रूप से खांडसारी इकाइयों को गन्ना बेचना अधिक पसंद करते हैं।

किसान संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित प्रावधान किसानों को लाभ दिलाने वाले इस विकल्प को बंद कर देता, जिससे चीनी मिलों पर निर्भर रहने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ता।  

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खांडसारी उद्योग की परिभाषा बदलने का खेल
प्रस्तावित गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 में खांडसारी इकाइयों की परिभाषा भी बदली जा रही थी। मौजूदा नियमों के अनुसार, 20 या अधिक श्रमिकों वाली इकाइयां खांडसारी उद्योग के तहत आती हैं और पेराई क्षमता की कोई सीमा नहीं है।

नए मसौदे में 10 से अधिक श्रमिकों और 500 टन प्रतिदिन से अधिक की पेराई क्षमता वाली इकाइयों को खांडसारी के रूप में परिभाषित किया जा रहा था। इससे कई छोटी और श्रम-प्रधान इकाइयां नियामक दायरे में आ जातीं और उनके हाथ बंध जाते।

एक मई 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, गन्ना किसानों को बेहतर कीमत दे रही खांडसारी इकाइयों की संख्या देश भर में 373 है, जिनमें से 66 इकाइयों की रोजाना 500 टन तक पेराई क्षमता है। जबकि, इन सभी खांडसारी इकाइयों की कुल पेराई क्षमता करीब 95,000 टन प्रतिदिन है।

गन्ने के रस से तैयार गैर-प्रसंस्कृत चीनी को खांडसारी (देसी खांड या बूरा) कहते हैं। आज सफेद यानी प्रसंस्कृत चीनी को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाने लगा है, इसलिए खांड की मांग और खांडसारी इकाइयों का कारोबार दोनों बढ़े हैं। यही चीनी मिलों की परेशानी की मुख्य वजह भी है।

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25 किलोमीटर के दायरे की शर्त 
नए कानून में एक और बदलाव प्रस्तावित था, जिस पर किसान संगठनों की आपत्ति थी। मौजूदा नियम के अनुसार, चीनी मिल के 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले किसानों को अपना गन्ना उसी मिल को देना होता है। नए आदेश में यह दायरा बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव था। इससे और अधिक किसान एक ही चीनी मिल पर निर्भर होने को मजबूर हो जाते, जिससे उनके पास विकल्प और भी सिमट जाते।

इसके अलावा, नई चीनी मिलों के लिए बैंक गारंटी बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव भी था। किसान संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित आदेश में 14 दिनों में भुगतान का पुराना नियम तो बनाए रखा गया, जबकि मिलों पर वर्षों का बकाया है और उस पर कोई वाजिब ब्याज नहीं मिलता। ईथेनॉल उत्पादन को कानूनी दर्जा देने के प्रावधान पर भी यही कहा गया कि इसका फायदा किसानों की बजाय मिल मालिकों को मिलेगा।

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60 साल पुराने कानून की पृष्ठभूमि
देश में गन्ना मूल्य को नियंत्रित करने का पहला प्रयास ब्रिटिश काल में गन्ना अधिनियम, 1934 के जरिये हुआ, जिसका उद्देश्य चीनी मिलों के एकाधिकार से किसानों का शोषण रोकना था। आजादी के बाद 1955 में आवश्यक वस्तु अधिनियम आया और इसी के तहत 1966 में केंद्र सरकार ने वह आदेश जारी किया, जो आज तक लागू है। इसके तहत किसानों को गन्ने का गारंटीशुदा न्यूनतम मूल्य यानी एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) का प्रावधान किया गया।

14 दिनों में भुगतान न होने पर 15 प्रतिशत सालाना ब्याज का नियम भी इसी आदेश की देन है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य एफआरपी से भी अधिक राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) घोषित करते हैं, जो हमेशा एफआरपी से ज्यादा होता है।

सरकार ने मसौदा वापस लिया
किसान संगठनों और अन्य हितधारकों की आपत्तियों के बाद केंद्र सरकार द्वारा गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 का मसौदा वापस लेना इस बात का संकेत है कि कृषि क्षेत्र में बड़े नीतिगत बदलाव व्यापक संवाद और सहमति के आधार पर ही टिकाऊ साबित हो सकते हैं। खाद्य मंत्रालय का पुनर्विचार का फैसला सभी पक्षों की चिंताओं को समाहित करने का अवसर भी प्रदान करता है। यह भी सच है कि वर्ष 1966 के गन्ना नियंत्रण आदेश को बदलते समय के अनुरूप अद्यतन करने की आवश्यकता है।

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ईथेनॉल उद्योग के विस्तार, डिजिटल प्रणालियों के बढ़ते उपयोग और चीनी क्षेत्र की नई चुनौतियों को देखते हुए नियामक ढांचे में सुधार अपरिहार्य है। लेकिन, किसी भी सुधार का अंतिम उद्देश्य किसानों की आय सुरक्षा, पारदर्शी खरीद व्यवस्था और समय पर भुगतान सुनिश्चित करना होना चाहिए।

अब आगे की राह यही होगी कि सरकार, किसान संगठन, राज्य सरकारें और उद्योग जगत मिलकर ऐसा संतुलित ढांचा तैयार करें, जो एक ओर चीनी एवं ईथेनॉल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाए और दूसरी ओर गन्ना किसानों के हितों को पूरी मजबूती से संरक्षित करे। यदि यह संतुलन स्थापित हो जाता है, तो नया आदेश गन्ना क्षेत्र को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और किसान-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

(यह स्टोरी मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)
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