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गन्ने के दाम का सवाल: एफआरपी से आगे किसान की हिस्सेदारी तय हो; लागत, रिकवरी व मुनाफे का हिसाब भी हो पारदर्शी

अरविंद कुमार सिंह (कृषि पत्रकार), नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 16 Sep 2026 08:31 PM IST
सार

नए पेराई सीजन में गन्ना किसानों को उचित दाम दिलाने के लिए एफआरपी से आगे बढ़कर लागत और मुनाफे का पारदर्शी हिसाब सुनिश्चित करना जरूरी है। गन्ना मूल्य बढ़ाने की मांग के बीच रिकवरी दर की निष्पक्ष जांच और चीनी व इथेनॉल के लाभ में किसानों की हिस्सेदारी भी तय होनी चाहिए।

1 अक्तूबर से नया पेराई सीजन शुरू से पहले गन्ने का दाम 600 रुपये/क्विंटल तक बढ़ाने की मांग उठ रही है।
1 अक्तूबर से नया पेराई सीजन शुरू से पहले गन्ने का दाम 600 रुपये/क्विंटल तक बढ़ाने की मांग उठ रही है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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चीनी के बढ़ते दामों से जहां आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ रहा है और चीनी मिलें नए पेराई सीजन की तैयारियों में जुटी हैं, वहीं इस पूरे तंत्र की नींव गन्ना किसान एक बार फिर गहरी दुविधा में खड़े नजर आ रहे हैं।

पहली अक्तूबर से नया पेराई सीजन शुरू होने ही वाला है। उससे पहले देश के कई हिस्सों से गन्ने का दाम 600 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ाने की मांग उठ खड़ी हुई है। यूपी, बिहार, हरियाणा और तमिलनाडु में यह आवाज सोशल मीडिया के जरिये भी बुलंद हो रही है और चीनी की बढ़ती कीमतों तथा 20% इथेनॉल मिश्रण को लेकर उठे विवाद ने इस मांग को और धार दे दी है।
गन्ना पेराई
गन्ना पेराई - फोटो : सोशल मीडिया
भारत में दुनिया के सबसे अधिक करीब पांच करोड़ गन्ना किसान हैं और देश की लगभग 7.5 फीसदी ग्रामीण आबादी की रोज़ी-रोटी सीधे गन्ने से जुड़ी हुई है। हर उत्पादक किसान औसतन सालाना 42 टन गन्ना पैदा कर तीन टन चीनी उत्पादन में अपना अहम योगदान देता है और यही फसल गुड़, खांडसारी और इथेनॉल जैसे कई उत्पादों की बुनियाद बनती है। लेकिन, गन्ने की खेती आसान नहीं है। 10 से 14 महीने के लंबे इंतजार और भारी श्रम के बाद ही किसान के हाथ एकमुश्त रकम आती है।

पिछले पांच वर्षों (2020-21 से 2024-25) में औसतन 54.20 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती हुई, जिससे 448.62 मिलियन टन उत्पादन हुआ और इस निरंतरता के पीछे 1912 में कोयंबटूर में स्थापित गन्ना प्रजनन संस्थान की 2,930 किस्मों की देन भी कम नहीं है।
गन्ना किसान
गन्ना किसान - फोटो : गांव जंक्शन
दाम तय करने का उलझा हुआ फॉर्मूला
गन्ने का मूल्य निर्धारण भारत में दो समानांतर व्यवस्थाओं से होता है। केंद्र सरकार का कृषि लागत और मूल्य आयोग उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करता है, जिससे कम पर कोई मिल गन्ना नहीं खरीद सकती, जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्य अपना राज्य परामर्शित मूल्य (एसएपी) घोषित करते हैं।

वर्ष 2026-27 सीजन के लिए केंद्र ने एफआरपी 365 रुपये प्रति क्विंटल तय की है, जबकि एसएपी राज्यों में अभी खामोशी बनी हुई है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में दाम 30 रुपये बढ़ाकर 400 रुपये किया गया था, वहीं पंजाब में 416, हरियाणा में 415 और उत्तराखंड में 405 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है।

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच उत्तर प्रदेश के किसानों को दाम बढ़ने की उम्मीद तो है, पर यह कब होगा, इसका कोई संकेत अभी नहीं मिला है।
चीनी मिल में गन्ना लेकर पहुंचे ट्रक और ट्रैक्टरों की कतार।
चीनी मिल में गन्ना लेकर पहुंचे ट्रक और ट्रैक्टरों की कतार। - फोटो : सोशल मीडिया
असंतोष की गूंज कई राज्यों तक
गन्ना किसानों का असंतोष अब संगठित आवाज का रूप लेने लगा है। लखीमपुर खीरी से राष्ट्रीय किसान शक्ति संगठन ने गन्ने का दाम 600 रुपये तक ले जाने की मांग उठाई है, तो बिहार के सीतामढ़ी में हुई एक महापंचायत में सांसद सुधाकर सिंह ने 750 रुपये प्रति क्विंटल की मांग रख दी। 

भारतीय किसान यूनियन हरिद्वार पंचायत में पहले ही 550 रुपये की मांग कर चुकी है, तो तमिलनाडु में 450 से 550 रुपये तक दाम देने की गुहार लगाई जा रही है। सरकार ने अपनी गणना में गन्ने की लागत 182 रुपये प्रति क्विंटल आंकते हुए 365 रुपये के दाम को लाभकारी बताया है, लेकिन किसान इस हिसाब-किताब से संतुष्ट नहीं हैं। उनका सवाल सीधा है कि जब चीनी और इथेनॉल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका लाभ आखिर उन तक क्यों नहीं पहुंचता?

लागत का असली बोझ किस पर
कृषि लागत और मूल्य आयोग की अपनी रिपोर्ट बताती है कि गन्ने की खेती में 54.9 फीसदी लागत सिर्फ मानवीय श्रम की है, जो कर्नाटक में तो 71.3 फीसदी तक पहुंच जाती है। इसके अलावा, खाद-कीटनाशकों पर 10 फीसदी, बीजों पर 8 फीसदी और सिंचाई पर 10.2 फीसदी खर्च होता है।

रोपाई से लेकर कटाई और मिल तक गन्ने की ढुलाई के हर पड़ाव पर लागत बढ़ती जा रही है। ऊपर से घटतौली और पर्ची में देरी जैसी शिकायतें अलग से किसानों को परेशान करती रहती हैं। नतीजा यह हुआ है कि वर्ष 2005 के बाद से मिलों और किसानों के बीच की खाई गहरी होती गई है, जबकि इस समय देश में 514 मिलें बेहतर स्थिति में चल रही हैं और इथेनॉल उत्पादन ने उन्हें नई ताकत भी दी है।

विडंबना यह है कि सह-उत्पादों से मिलने वाले इस अतिरिक्त मुनाफे का हिस्सा किसानों तक नहीं पहुंचता, जबकि महाजन कमेटी मूल्य तय करते समय इस पहलू को भी शामिल करने की सिफारिश काफी पहले कर चुकी है।
गन्रे की रिकवरी दर का सवाल भी इसके दाम के जितना ही उलझा हुआ है।
गन्रे की रिकवरी दर का सवाल भी इसके दाम के जितना ही उलझा हुआ है। - फोटो : गांव जंक्शन
दो प्रणालियां, असमान लाभ
देश में गन्ने के मूल्य निर्धारण की दोहरी व्यवस्था भी किसानों में असंतोष की एक बड़ी वजह बनी हुई है। दक्षिणी और पश्चिमी भारत की सहकारी मिलें अपेक्षाकृत बेहतर दाम देती हैं, जबकि निजी मिलें मनमानी करने में पीछे नहीं रहतीं और लगातार केंद्र पर दबाव बनाती हैं कि एसएपी व्यवस्था को समाप्त कर एक समान प्रणाली लागू हो।

रिकवरी दर का सवाल भी उतना ही उलझा हुआ है। सरकार आमतौर पर 10 फीसदी मूल रिकवरी दर मानती है, जो पिछले 16 वर्षों में 9.5 फीसदी से बढ़कर 2022-23 तक 10.25 फीसदी पहुंच चुकी है, लेकिन जहां आधुनिक मशीनों से जांच की गई, वहां यह आंकड़ा 12.50 फीसदी तक पाया गया।

एक वास्तविकता यही है कि गन्ने में मौजूद चीनी की सही मात्रा को लेकर मिलों ने आज तक कोई पारदर्शी प्रणाली नहीं बनने दी है, जिसका खामियाजा अंततः किसान ही भुगतता है।

समाधान की दिशा में एक पुराना सुझाव
वर्ष 2002 में जब गन्ना आंदोलन अपने चरम पर था, तब किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने एक सीधा और बिना खर्च वाला समाधान सुझाया था। उन्होंने सुझाव दिया कि बुआई से पहले ही दाम घोषित कर दिया जाए, ताकि किसान खुद तय कर सकें कि गन्ना बोना उनके लिए फायदेमंद होगा या किसी और फसल की खेती बेहतर विकल्प होगी।

दुर्भाग्य से, दो दशक बीत जाने के बाद भी एसएपी लागू करने वाले राज्यों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। नतीजा यह हुआ कि मिलें चालू हो जाती हैं, कटाई शुरू हो जाती है, पर दाम की घोषणा अब भी अटकी रह जाती है।
वर्ष 2024 में तो गन्ना संकट के चलते राज्य की कई मिलों को समय से पहले बंद तक करना पड़ा था।
वर्ष 2024 में तो गन्ना संकट के चलते राज्य की कई मिलों को समय से पहले बंद तक करना पड़ा था। - फोटो : गांव जंक्शन
राजनीति और अर्थशास्त्र का जटिल तालमेल
गन्ना और चीनी उद्योग का रिश्ता जितना अर्थशास्त्र से जुड़ा हुआ है, उतना ही यह राजनीति से भी गुंथा हुआ है। अक्सर देखा गया है कि निजी चीनी मिलें राजनेताओं पर किसानों से कहीं अधिक असरदार दबाव बनाने में सफल रहती हैं और मूल्य निर्धारण की पूरी प्रक्रिया पर नौकरशाही की पकड़ मजबूत बनी हुई है। इस असंतुलन का नतीजा यह भी रहा कि गुड़ और खांडसारी जैसी छोटी इकाइयां, जो किसानों को बेहतर दाम दे सकती थीं, बड़ी मिलों की प्रतिस्पर्धा में काफी हद तक तबाह हो गईं।

यूपी का पुराना नाता, सबसे गहरी पीड़ा
देश की सबसे पहली चीनी मिल वर्ष 1903 में देवरिया (उत्तर प्रदेश) में शुरू हुई थी। आजादी से पहले गन्ने की अधिकांश खेती उत्तर प्रदेश और बिहार में ही केंद्रित हुआ करती थी। बाद में दक्षिणी और पश्चिम भारत में यह उद्योग तेजी से फैलता गया, पर उत्तर भारत की चीनी मिलें आज भी इतनी संगठित हैं कि राज्य सरकार के फैसलों को मानने में आनाकानी करती रहती हैं। 

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल में जब गन्ना मूल्य 280 रुपये तय हुआ था, तब चीनी मिलों ने किसानों को 225 रुपये से अधिक दाम देने से इनकार कर दिया था, जिसके चलते सरकार को सख्त कदम उठाने पड़े। बीते एक दशक में उत्तर प्रदेश में गन्ने के दाम अमूमन चुनावी वर्षों में ही ठीक-ठाक बढ़ते रहे, अन्यथा औसत बढ़ोतरी सालाना 10 रुपये प्रति क्विंटल से भी कम रही।

वर्ष 2024 में तो गन्ना संकट के चलते राज्य की कई मिलों को समय से पहले बंद तक करना पड़ा था। हालांकि, यह भी सच है कि वर्ष 2017 से 2025-26 के बीच योगी सरकार में किसानों को 3.23 लाख करोड़ रुपये का भुगतान हुआ, जो अपेक्षाकृत संतोषजनक रहा।
गन्ना किसानों का संकट नया नहीं है और न ही यह किसी एक राज्य या सीजन तक सीमित नहीं है।
गन्ना किसानों का संकट नया नहीं है और न ही यह किसी एक राज्य या सीजन तक सीमित नहीं है। - फोटो : गांव जंक्शन
कैसे मिलेगा किसानों को उनका हक 
गन्ना किसानों का संकट नया नहीं है और न ही यह किसी एक राज्य या सीजन तक सीमित नहीं है। यह मामला गन्ने की उत्पादन लागत, अपारदर्शी मूल्य-निर्धारण प्रक्रिया और नीतिगत उदासीनता की परतों में उलझा एक ढांचागत सवाल से जुड़ा है।

जरूरत है कि एक उच्च स्तरीय समिति राज्यवार चुनौतियों को गंभीरता से समझे, रिकवरी दर की पारदर्शी प्रणाली बने और सह-उत्पादों के मुनाफे में किसानों की उचित हिस्सेदारी तय हो। तभी अविश्वास से भरा यह रिश्ता ऐसी साझी समझ की ओर बढ़ सकेगा, जिससे मिलों की सेहत और किसानों की खुशहाली सुनिश्चित की जा सकेगी।

(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है) 



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