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Gobardhan Scheme Rs 23 731 Cr Plan Links Rural Waste To Energy Fair Price For Farmers Still Uncertain
गोबरधन योजना: 23,731 करोड़ के खर्च से बदलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की भी होनी चाहिए वाजिब हिस्सेदारी
प्रो. एन. रघुराम, जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 22 Sep 2026 02:57 PM IST
सार
गोबरधन योजना को कचरा प्रबंधन संग ऊर्जा व ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा। सीबीजी के साथ गोबर का उचित मूल्य सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कार्बन क्रेडिट में पशुपालकों की हिस्सेदारी, सही मूल्य व्यवस्था और किसानों के हितों की सुरक्षा की जाए तो यह पहल भारत के गांवों के टिकाऊ आर्थिक विकास का बड़ा अवसर बन सकती है।
किसानों के हितों की सुरक्षा की जाए तो गोबरधन योजना गांवों के टिकाऊ आर्थिक विकास का बड़ा अवसर बन सकती
- फोटो : गांव जंक्शन
केंद्र सरकार की गोबरधन योजना ऊपर से देखने पर ग्रामीण कचरे से स्वच्छ ऊर्जा बनाने की एक सीधी-सादी कोशिश लगती है, लेकिन गहराई से देखें तो इसके पीछे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को सहेजने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने की एक ठोस रणनीति छिपी है। यह तस्वीर जितनी उत्साहजनक है, उतने ही जरूरी सवाल भी इसके साथ जुड़े हैं।
इस योजना से जुड़ा पहला सवाल तो यही है कि क्या बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाला उप-उत्पाद वाकई रासायनिक खाद की जगह ले सकता है? जब सीबीजी कारखाने गांव-गांव से गोबर खरीदेंगे, तो क्या पशुपालकों को इसका वाजिब दाम और कार्बन क्रेडिट का हिस्सा मिलेगा, या वे कॉर्पोरेट एकाधिकार के जाल में फंस जाएंगे?
योजना की रणनीति के मूल में क्या है?
ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा भंडार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सहित इस योजना से जुड़े तीन प्रमुख स्तंभों को एक साथ साधने के इरादे से केंद्र सरकार ने 23,731 करोड़ रुपये के कुल बजट के साथ गोबरधन राष्ट्रीय सर्कुलर बायोएनर्जी योजना को मंजूरी दी है।
वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक चलने वाली यह योजना सिर्फ कचरा प्रबंधन या पर्यावरण सुधार तक सीमित न रहकर भारत के आर्थिक और भू-राजनीतिक समीकरणों से गहराई से जुड़ी हुई है। कंप्रेस्ड बायोगैस उत्पादन को करीब दस गुना बढ़ाने का लक्ष्य साफ बताता है कि यह ऊर्जा-निर्भरता घटाने और ग्रामीण विकास के प्रति सरकार का एक बड़ा और सोचा-समझा कदम है।
आयात बिल और डॉलर का दबाव
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आज भी आयात पर टिका है। कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एलपीजी की आयात-निर्भरता कोई नई समस्या नहीं, बल्कि पुरानी और गहरी चुनौती है। हाल में होर्मुज जलडमरूमध्य के संकट और मध्य-पूर्व के तनावों ने यह साबित कर दिया है कि सप्लाई चेन बाधित होने पर सिर्फ डॉलर होना काफी नहीं है। जब शिपिंग और परिवहन ठप होता है, तो ऊर्जा संकट सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन जाता है।
इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। पेट्रोल-गैस खरीदने के लिए जो डॉलर खर्च होते हैं, उन्हें कमाने के लिए भारत को अक्सर सस्ते दामों और सब्सिडी के सहारे अनाज, फल, सब्जियां और डेयरी जैसे कृषि उत्पाद निर्यात करने पड़ते हैं। ऐसे में ऊंची मूल्य वाली विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हम अपने सस्ते कच्चे माल का निर्यात करने को मजबूर हो जाते हैं। यह असंतुलन गोबरधन योजना की जरूरत को और स्पष्ट करता है।
ग्रामीण ईंधन से राष्ट्रीय ऊर्जा नीति तक
बायोगैस की तकनीक और उसके सिद्धांत बीते 40-50 वर्षों से मौजूद हैं, लेकिन पहले इसे सिर्फ गांवों के लिए एक छोटे, विकेंद्रीकृत खाना पकाने के ईंधन के रूप में देखा जाता रहा। रखरखाव की दिक्कतों और बड़े उद्योगों की दिलचस्पी न होने के चलते यह तकनीक कभी बड़े पैमाने पर नहीं फैल सकी। इसके बाद उज्ज्वला योजना आई और गांवों तक एलपीजी पहुंचाने की पहल हुई, पर सिलेंडर रीफिलिंग की लागत और आयातित आपूर्ति की बाधाओं ने 100% ग्रामीण कवरेज का सपना अधूरा छोड़ दिया।
गोबरधन योजना का सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव यही है कि इसने बायोगैस को गांव की सीमा से निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की मांग से जोड़ दिया है। सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को सरकार द्वारा तय लक्ष्य के मुताबिक सीबीजी प्लांटों से गैस खरीदनी अनिवार्य होगी। वर्ष 2026-27 में 3%, 2027-28 में 4% और 2028-29 से 5% मिश्रण किया जाएगा, ठीक उसी तरह जैसे पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण अनिवार्य की गया था।
यह कदम सीबीजी को एक भरोसेमंद और तय बाजार देगा, जो इस उद्योग की स्थिरता के लिए जरूरी है। आगे चलकर भारी उद्योगों की एलएनजी-सीएनजी खपत में भी सीबीजी का मिश्रण बढ़े, तो आयात बिल में और कटौती संभव है। फिलहाल इसका दायरा परिवहन और घरेलू रसोई तक ही सीमित रखना समझदारी भरा फैसला है।
उद्योगों को प्रोत्साहन संग पैमाना भी अहम
नए ग्रीनफील्ड सीबीजी प्लांट के लिए प्रति टन प्रतिदिन क्षमता पर 2 करोड़ रुपये तक की पूंजी सहायता का प्रावधान रखा गया है, जिसके पीछे इकोनॉमी ऑफ स्केल का तर्क समझना जरूरी है। इसका मतलब है कि जितना ज्यादा उत्पादन करेंगे, प्रति इकाई लागत उतनी कम हो सकती है। अतीत में छोटे बायोगैस संयंत्र इसलिए विफल हुए क्योंकि उनका आकार बहुत छोटा था और उत्पादकता कम रही।
100 करोड़ के निवेश वाला संयंत्र यदि एक-दो टन प्रतिदिन से कम उत्पादन करे, तो वह बाजार में टिक नहीं सकता। इसलिए, न्यूनतम उत्पादन क्षमता तय करना सही दिशा में उठाया गया कदम है, जिससे सब्सिडी और ऋण का सदुपयोग सुनिश्चित हो सकेगा। उत्पादकों को 2,110 रुपये प्रति एमएमबीटीयू की स्थिर कीमत दस वर्षों तक मिलना भी निवेशकों का भरोसा जीतने वाला फैसला है।
गोबर आपूर्ति में अवसर के साथ चुनौती
भारत में पशुधन आबादी पिछले दस वर्षों में 12-13 प्रतिशत की चक्रवृद्धि दर से सालाना बढ़ी है, जो आने वाले 25-30 वर्षों तक सीबीजी संयंत्रों के लिए कच्चे माल की निरंतरता तय करती है। हरित क्रांति के बाद फसल उगाने वाले किसान और पशुपालक अलग होते चले गए। इसकी एक बानगी दिल्ली-एनसीआर जैसे पेरी-अर्बन इलाकों में देखने को मिलती है, जहां बड़ी डेयरियों से भारी मात्रा में निकला गोबर नालों में बहाया जाता है, जो जल प्रदूषण बढ़ाता है।
इस अपशिष्ट से खाद बनाकर फसल उत्पादक किसानों तक पहुंचाई जा सकती है, जो अभी तक संभव नहीं हो सका। सीबीजी उद्योग इस असंतुलन को पाटने का मौका दे सकता है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि गोबर कितनी ताजा अवस्था में और कितने वैज्ञानिक ढंग से एयर-टाइट कंटेनर या लाइन्ड पिट्स में इकट्ठा किया जाता है। खुले में छोड़ा गया गोबर न गैस के लिए उपयोगी रहेगा, न खाद के लिए।
उर्वरक-विकल्प का भ्रम टूटना जरूरी
फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर यानी सीबीजी के बाद बचे अवशेष का सही उपयोग इस योजना की सबसे संवेदनशील कड़ी है। इंडियन बायोगैस एसोसिएशन रासायनिक उर्वरकों के साथ 10% अनिवार्य मिश्रण की मांग कर रहा है, ताकि अवशेषों का ढेर न लगे। यह सुझाव व्यावहारिक और समयानुकूल है। यहां एक जरूरी स्पष्टीकरण देना बनता है।
यदि उद्योग पायरोलिसिस जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से बायोगैस पूरी तरह निकाल लेते हैं, तो बचे अवशेष में नाइट्रोजन-सल्फर जैसे मुख्य पोषक तत्व लगभग खत्म हो जाते हैं, बचता है सिर्फ कार्बन और थोड़ा फॉस्फोरस। इसलिए, इस औद्योगिक अवशेष को रासायनिक उर्वरक का विकल्प कहना उचित नहीं होगा।
ठीक से प्रबंधित ताजा गोबर भले 90-100% रासायनिक उर्वरकों की जगह ले सकता है, पर सीबीजी अवशेष का असली योगदान मिट्टी के ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाने में है। यह उर्वरक को मिट्टी में टिकाए रखने वाला 'कार्बन एनहांसर' है, न कि उर्वरक का प्रतिस्थापन। सरकार और कंपनियों को यह तथ्य किसानों के सामने पूरी पारदर्शिता से रखना चाहिए, वरना गलतफहमी किसानों को नुकसान पहुंचा सकती है।
किसानों के हक और आगे के खतरे
सर्कुलर इकॉनमी का फायदा तभी है जब यह ग्रामीण भारत और पशुपालकों तक भी पहुंचे। रिलायंस, अमूल, एनडीडीबी जैसे बड़े कॉरपोरेट्स जैसे-जैसे इस क्षेत्र में उतरेंगे, आज मुफ्त समझा जाने वाला गोबर एक कीमती कमोडिटी बन जाएगा। यहीं सबसे बड़ा खतरा छिपा है। यदि किसी इलाके में सिर्फ दो-तीन सीबीजी कंपनियां हों, तो वे प्रतिस्पर्धा के बजाय कार्टेल बनाकर गोबर का दाम एक रुपये प्रति किलो जैसी सीमा पर बांध सकती हैं, जिससे किसान के पास मोलभाव की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी।
इस शोषण को रोकने के लिए जरूरी है कि जिस तरह सरकार ने सीबीजी का दाम 2,110 रुपये तय किया, उसी तरह गोबर के लिए भी एक न्यायसंगत और पारदर्शी मूल्य प्रणाली बनाई जाए ताकि पशुपालकों को वाजिब लाभ मिल सके। इसके अलावा, मीथेन उत्सर्जन रोककर जो कार्बन क्रेडिट बनते हैं, उनमें भी सिर्फ सीबीजी कंपनियों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि कच्चा माल देने वाले किसानों और पशुपालकों तक इसका उचित हिस्सा पहुंचाने के लिए स्पष्ट फॉर्मूला बनाया जाना चाहिए।
इसके साथ ही, इथेनॉल मिश्रण से चीनी और गन्ने पर पड़े असर से सबक लेते हुए, कृषि अपशिष्टों के मामले में फूड बनाम फ्यूल की टक्कर से बचना जरूरी होगा। खेत के लिए जरूरी कंपोस्ट और सीबीजी संयंत्रों के लिए जरूरी कच्चे माल के बीच संतुलन बनाकर ही यह योजना अपने असली लक्ष्य तक पहुंच सकती है।
(देवेश सारस्वत से बातचीत पर आधारित यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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