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Fertilizer Subsidy: किसानों के खाते में सीधे सब्सिडी भेजकर उर्वरक वितरण व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी

उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sun, 20 Jul 2025 11:36 AM IST
सार

किसानों के बैंक खाते में सीधे सब्सिडी भेजकर उर्वरक वितरण की व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी की जा रही है। इससे खाद की कालाबाजारी पर नकेल कसी जा सकेगी। उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग पर लगाम लगेगी और सब्सिडी पर होने वाले खर्च को भी कम कर सकते हैं। 

खाद वितरण व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है सरकार।
खाद वितरण व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है सरकार। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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फसल सीजन में किसानों की अक्सर शिकायत रहती है कि उन्हें डीएपी और यूरिया जैसे उर्वरक समय पर नहीं मिल पाते। किसानों को किफायती दर पर खाद उपलब्ध कराने के लिए सहकारी समितियों के जरिए राज्य सरकारें इसके वितरण की व्यवस्था करती हैं। लेकिन, कई बार मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। राज्य सरकारों को किसानों के रोष का सामना भी करना पड़ता है। दूसरी ओर, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार उर्वरकों पर हर औसतन 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक सब्सिडी देती है।

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वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 1.68 लाख करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी का अनुमान है, जिसमें यूरिया के लिए 1.19 लाख करोड़ और फॉस्फेटिक-पोटाश उर्वरकों के लिए करीब 49000 करोड़ रुपये शामिल हैं। इससे सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। दूसरी ओर, अधिक उपज के लालच में किसान अंधाधुंध रियायती रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी और फसलों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इन खामियों को दूर करने के लिए अब खाद वितरण के नियमों में बदलाव की तैयारी हो रही है। 

एलपीजी की तर्ज पर खाद सब्सिडी
किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने की बजाय अब उन्हें लागत मूल्य पर खाद मुहैया कराने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए, खाद निर्माता कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी को सीधे कैश ट्रांसफर के रूप में किसानों के खाते में देने की योजना है। इससे खाद की खरीद-बिक्री रसोई गैस की तरह बाजार के हवाले हो जाएगी। किसानों को रसोई गैस की तरह बाजार मूल्य पर खाद खरीदनी होगी। जिस तरह एलपीजी गैस सब्सिडी उपभोक्ता के खाते में सीधे ट्रांसफर कर दी जाती है, ठीक उसी तरह खाद सब्सिडी भी किसानों के बैंक खाते में देने की तैयारी की जा रही है। 

भारत में 85% से ज्यादा जोत लघु और सीमांत किसानों की है। इन किसानों की माली हालत ठीक नहीं है। फसल सीजन में उन्हें किफायती दर पर उर्वरकों की जरूरत होती है। सहकारी समितियों के जरिए सबसे ज्यादा खाद इन्हीं किसानों तक पहुंचाने की कोशिश होती है। लेकिन, सब्सिडी वाले उर्वरकों का आधे से अधिक हिस्सा उद्योगों में गैर-कानूनी रूप से उपयोग हो रहा है, जिससे किसानों को सब्सिडी का लाभ नहीं मिलता। 

बदलती तकनीक और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के चलते खाद की कीमतें बढ़ गई हैं। किसानों को खाद सस्ती कीमतों पर मिल सके, इसके लिए सरकार खाद निर्माता कंपनियों और सहकारी समितियों सब्सिडी देती है। उदाहरण के लिए अगर खाद कंपनियों को एक किलोग्राम खाद की उत्पादन लागत 30 रुपये आती है और सरकार चाहती है कि वह खाद किसानों को 20 रूपये में मिले तो प्रति किलो खाद पर निर्माता कंपनियों को 10 रुपये की सब्सिडी सरकार सीधे मुहैया करा देती है। लेकिन, अब ऐसा नहीं होगा। अब खाद कंपनियों की बजाय यह सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से देने की तैयारी है। 

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आपूर्ति शृंखला में सुधार की उम्मीद 
इस बदलाव का मकसद, किसानों को समय और उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराना बताया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि इस बदलाव से उर्वरक उत्पादन से अंतिम उपयोगकर्ता यानी किसान तक आपूर्ति शृंखला में सुधार होगा। इससे किसान अपनी जरूरत के मुताबिक उर्वरक खरीद सकेंगे, वहीं युक्तिसंगत तरीके से उर्वरकों का उपयोग करने के लिए भी प्रेरित होंगे।

खाद उत्पादन केंद्रों से किसानों तक उर्वरकों की आवाजाही की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, सरकार उन्नत तकनीकों का उपयोग करके वितरण प्रणाली की निगरानी करने की भी तैयारी में है। किसान सम्मान निधि और किसान क्रेडिट कार्ड योजना के बाद किसानों के हित में यह बड़ी योजना मानी जा रही है। इस योजना का लक्ष्य खेती में बेहतरी के साथ ही किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी है।

धान-गेहूं फसल चक्र में उर्वरक खपत अधिक 
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कुछ स्थानों पर गेहूं एवं धान की सालाना पैदावार करीब 10 टन से कुछ ज्यादा है। जबकि, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल जैसे राज्यों में भी दो-तीन चक्र की पैदावार के चलते धान की उत्पादकता दर 10 टन से ज्यादा है। इन राज्यों में देश के बाकी हिस्सों की तुलना में करीब दोगुना यानी प्रति हेक्टेयर 250 किलो नाइट्रोजन, 120 किलो फॉस्फोरस और 200 किलो पोटेशियम की खपत होती है।

यहां यह ध्यान रखना होगा कि बारिश आधारित फसलों, जैसे- ज्वार, बाजरा, दलहन आदि की खेती वाले इलाकों में उर्वरक की खपत कम है। गन्ना और सब्जियों की खेती में भी कीटनाशकों और उर्वरकों की खपत ज्यादा है।

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बढ़ता रहा है सब्सिडी का बिल 
1960 के दशक में हरित क्रांति के दौरान देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उर्वरक सब्सिडी नीति शुरू की गई। तब से यह नीति लागू है। पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार, सस्ते दामों पर खाद उपलब्ध कराने का सरकारी खर्च 6% घटकर करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2023-24 में 1.88 लाख करोड़ रुपये था। इस कमी का श्रेय यूरिया और डीएपी के आयात में कमी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट को दिया जाता है। फिर भी, सब्सिडी पिछले साल (1.71 लाख करोड़ रुपये) की तुलना में 3.4% अधिक रही।

यूरिया खाद पूरी तरह सब्सिडी पर आधारित है। पिछले कई साल से इसकी कीमत 267 रुपये प्रति बोरी है। एक बोरी में 45 किग्रा यूरिया होता है। जबकि, वास्तविक लागत मूल्य देखा जाए तो इसकी कीमत करीब 1750 रुपये हो सकती है। इसी तरह, डीएपी का खुदरा मूल्य 1350 रुपये प्रति बोरी है। इस पर अगर सब्सिडी न मिले तो यह बाजार में करीब 3500 रुपये प्रति बोरी के हिसाब से बिकेगा। 

किसानों को सीधे नहीं मिलती सब्सिडी 
खेती के लिए खाद सब्सिडी का फायदा सीधे किसानों को न मिलकर अभी खाद का उत्पादन और विपणन करने वाली कंपनियों को मिलता है। लेकिन, किसानों तक खाद पहुंचने से पहले ही यह कालाबाजारी की भेंट चढ़ जाती है। इसके चलते सब्सिडी का फायदा कायदे से किसानों को मिल नहीं पाता और उन्हें महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ती है। लेकिन, कई बार ऊंची कीमत के चलते वे खाद खरीदने की स्थिति में नहीं होते। इसका असर फसलों की पैदावार पर भी पड़ता है।

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सरकारी नीतियों के हिसाब से खाद सब्सिडी के मौजूदा नियमों के लिहाज से सिंचित भूमि के लिए प्रति एकड़ 7000 और वर्षा आधारित फसलों के लिए प्रति एकड़ 4000 रुपये मिलने चाहिए। इससे कृषि उत्पादन बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है। कृषि उत्पादन बढ़ेगा तो देश की अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। इससे किसान भी सशक्त होंगे।

उर्वरकों का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकार कई वर्षों से प्रयासरत है। सबसे प्रभावी समाधान उर्वरक सब्सिडी का प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (डीबीटी) है।  डीबीटी से पारदर्शिता बढ़ेगी, भ्रष्टाचार कम होगा और उर्वरक की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित होगी। यह किसानों को उर्वरकों का युक्तिसंगत उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा। 

आयात पर बढ़ी निर्भरता  
उर्वरक मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, साल 2022 में देश में खाद की औसत खपत 193 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी। इस साल करीब 30 करोड़ मीट्रिक टन खाद का पूरे देश में इस्तेमाल किया गया। देश में सबसे ज्यादा खपत यूरिया की होती है। जिस तरह खेती में पैदावार का दबाव बढ़ रहा है, खाद की खपत भी बढ़ रही है। साल 2022 में, देश में करीब 65.1 लाख मीट्रिक टन नाइट्रोजन उर्वरक, 37.4 लाख मीट्रिक टन फॉस्फेट और 18.6 लाख मीट्रिक टन पोटाश का आयात किया गया। हालांकि, हाल के कुछ वर्षों में यूरिया का आयात करीब 48 प्रतिशत घटकर सिर्फ 1.56 लाख टन रह गया है। जबकि, कुल उर्वरक आयात 156.6 फीसदी बढ़कर 3.13 लाख टन हो गया है। 


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