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Beyond Grain Security Why India S Pds Needs To Shift Towards Nutrition Efficiency And Choice
खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर बढ़े पीडीएस: अनाज संग दाल, श्रीअन्न और दूसरे पोषक खाद्य विकल्प भी जरूरी
प्रो. अंजनी कुमार \ वंशिका पाहवा, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 15 Sep 2026 05:09 PM IST
सार
भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) ने भूख से लड़ने में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन बदलते समय के साथ अब खाद्य नीति को कैलोरी से आगे बढ़कर पोषण, दक्षता और उपभोक्ता विकल्पों पर ध्यान देना होगा।
थाली भरी है, मगर पोषण अधूरा। अनाज के साथ पोषण सुरक्षा भी जरूरी।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) उचित मूल्य की दुकानों के जरिए गरीब परिवारों को सस्ता चावल-गेहूं उपलब्ध कराकर खाद्य सुरक्षा की मजबूत आधारशिला रही है। कोविड-19 के दौरान भी यह करोड़ों लोगों के लिए संकटमोचक बनी। आज 80 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचने वाली यह दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा व्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन बदलते भारत के साथ इसे और बेहतर बनाना जरूरी है।
अनाज-केंद्रित सब्सिडी में बदलाव जरूरी
पीडीएस उस दौर में बनाया गया था, जब मुख्य चुनौती कैलोरी की कमी थी, इसलिए सस्ता अनाज सही नीतिगत औजार था। भारत की आर्थिक तरक्की ने अब आय, खानपान की पसंद और उपभोग के पैटर्न को बदल दिया है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के हालिया घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) के अनुसार, घरेलू खर्च में भोजन की हिस्सेदारी 2011-12 के करीब 49 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 44 प्रतिशत रह गई है। इसी दौरान अनाज की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत से घटकर 4.5 प्रतिशत रह गई।
प्रति व्यक्ति अनाज खपत भी 2011-12 के करीब 130 किलो सालाना से घटकर वर्ष 2023-24 में 109 किलो रह गई है। वहीं, दूध, फल, अंडे, मछली-मांस और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर खर्च बढ़ रहा है। इससे स्पष्ट है कि भारत अनाज-प्रधान भोजन से आगे बढ़ रहा है, लेकिन खाद्य सब्सिडी की संरचना अब भी काफी हद तक अनाज-केंद्रित बनी हुई है।
खरीद, भंडारण और वितरण में चावल-गेहूं का ही दबदबा है। लोगों का खानपान बदल रहा है, मगर सरकार उसी चीज पर सब्सिडी अधिक दे रही है जिसकी हिस्सेदारी आहार में सिमट रही है।
पीडीएस आय सहायता का जरिया
सब्सिडी वाला अनाज अब भी कमजोर परिवारों को अहम आय सहायता दे रहा है। मुख्य अनाज पर खर्च कम होने से परिवारों के पास बेहतर भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन जैसी जरूरतों के लिए आवश्यक संसाधनों की बचत में मदद मिलती है। पीडीएस अब खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ आय हस्तांतरण कार्यक्रम की तरह भी काम कर रहा है।
आंकड़े भी यही बताते हैं। वर्ष 2011-12 से 2023-24 के बीच पीडीएस से मिलने वाला वास्तविक वार्षिक प्रति व्यक्ति लाभ 341 रुपये से बढ़कर 803 रुपये हो गया, ग्रामीण भारत में यह 864 रुपये तक पहुंच गया। पीडीएस से अनाज पाने वाले परिवारों का हिस्सा भी 45.7 प्रतिशत से बढ़कर 72.2 प्रतिशत (ग्रामीण क्षेत्रों में 83 प्रतिशत) हो गया है।
आज कुल अनाज खपत में पीडीएस की हिस्सेदारी करीब 35 प्रतिशत है, जो एक दशक पहले 20 प्रतिशत से भी कम थी। पीडीएस ने गरीबी घटाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है। इस योजना के बिना वर्ष 2023-24 में भारत की गरीबी दर 2.5 प्रतिशत की बजाय करीब 3.6 प्रतिशत होती, यानी करीब 1.4 करोड़ लोग इसकी वजह से गरीबी रेखा से ऊपर आ पाए।
एक ट्रेड-ऑफ भी है कि वित्तीय दक्षता तेजी से घट रही है। गरीबी से बाहर निकाले गए प्रति व्यक्ति पर आने वाली अनुमानित लागत वर्ष 2011-12 के 16,424 रुपये से बढ़कर 2023-24 में 62,743 रुपये हो गई है। गरीबी घटने और कवरेज बड़ा बने रहने के बावजूद, लगभग सार्वभौमिक अनाज हस्तांतरण को जारी रखना अब काफी महंगा साबित हो रहा है।
पोषण, दक्षता और विकल्प केंद्रित बने नीति
भारत को दूसरी पीढ़ी की खाद्य सुरक्षा रणनीति की जरूरत है, जो पीडीएस की ताकत बनाए रखते हुए इसे आधुनिक बनाए। सबसे गरीब और खाद्य-असुरक्षित परिवारों के लिए अनाज का हक सुरक्षित रहना चाहिए। यहां सुधार का मतलब कटौती नहीं होना चाहिए।
इसके साथ ही, समर्थन का स्वरूप धीरे-धीरे कैलोरी सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर बढ़ना चाहिए, जिसमें राज्य स्थानीय खानपान और वित्तीय क्षमता के हिसाब से दालें, मोटे अनाज, फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ या खाद्य तेल शामिल कर सकें।
शहरी भारत के लिए अलग रणनीति की जरूरत है। बाजार तक बेहतर पहुंच और उपभोग के बदलते पैटर्न को देखते हुए सिर्फ अनाज वितरित करने की बजाय सीधा लाभ हस्तांतरण या विकल्प-आधारित प्रणाली ज्यादा उपयुक्त हो सकती है।
खरीद नीति में भी बदलाव जरूरी है, क्योंकि चावल-गेहूं पर मौजूदा एकाग्रता ने खेती के पैटर्न को बिगाड़ा है, भूजल पर दबाव बढ़ाया है और फसल विविधता को सीमित किया है। पोर्टेबिलिटी, डिजिटलीकरण और आपूर्ति शृंखला की बेहतर निगरानी जैसे तकनीकी सुधार भी जारी रहने चाहिए, ताकि दक्षता बढ़े और लाभार्थियों को ज्यादा विकल्प मिल सकें।
(लेखक इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के दक्षिण एशिया कार्यालय, नई दिल्ली में कृषि अर्थशास्त्री हैं। ये उनके निजी विचार हैं। लेख में मौद्रिक मूल्य 2011-12 की स्थिर कीमतों पर दर्शाए गए हैं। यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के सितंबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है)
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