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खेती की लागत और आय का असंतुलन : बढ़ती लागत और कम कमाई बनी भारतीय किसानों की चुनौती

उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 16 Aug 2025 08:42 PM IST
सार

आजादी के बाद से भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान 51 फीसदी से घटकर अब 16 फीसदी रहा गया है। जबकि, 46.1 फीसदी जनसंख्या आज भी खेती पर निर्भर है। वहीं, खेती की अधिक लागत और बढ़ती महंगाई के कारण किसानों का मुनाफा स्थिर या फिर कम हो रहा है।

खेती की लागत और किसानों की कमाई के अंतर को दूर करने की जरूरत है।
खेती की लागत और किसानों की कमाई के अंतर को दूर करने की जरूरत है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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आजादी के बाद देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती-किसानी का योगदान 51 फीसदी से ज्यादा था, जो अब करीब 16 फीसदी तक सिमट गया है। वहीं, आज भी कृषि क्षेत्र लगभग 46.1 प्रतिशत जनसंख्या का समर्थन करता है। अर्थव्यवस्था और रोजगार के मोर्चे पर परोक्ष योगदान को भी जोड़ दें तो कृषि की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि भारत में खेती-किसानी को मजबूत बनाने और किसानों की आय बढ़ाने को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने अपने 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था। लेकिन, हकीकत यह है कि इस बीच खेती-किसानी की लागत तो बढ़ी है, जबकि किसानों की आय तुलनात्मक रूप से या तो घट गई है या फिर स्थिर हो गई है।

लागत और मुनाफे का अंतर
लागत और मुनाफे का अंतर बढ़ा है। खेती के आंकड़ों के विश्लेषण के लिए प्रॉफिट मार्जिन इनपुट का भी प्रयोग किया जाता है। इस आंकड़े के लिहाज से देखें तो साल 2013-14 में प्रॉफिट मार्जिन इनपुट और श्रम मूल्य का खर्च खेती की कुल लागत का 58 फीसदी था। हालांकि, अब यह घटकर 49.3 फीसदी रह गया है।

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सीएसीपी इनपुट कॉस्ट यानी खेती की मूल लागत और परिवार के श्रम को कुल खर्च मानता है। इनके कुल योग और उसकी एवज में हुई पैदावार के आंकड़ों पर आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है। भारत में खरीफ की प्रमुख फसल धान है, वहीं रबी की प्रमुख फसल गेहूं है। सीएसीपी के आंकड़ों के संदर्भ में किसानों की आय और मुनाफे की एक दशक की तुलना करते हैं तो दोनों फसलों से हुई कमाई एक जैसी दिखाई देती है।

सीएसीपी के आंकड़ों के अनुसार, साल 2012-13 में गेहूं की फसल पर लागत और परिवार का श्रम मूल्य जोड़ने के बाद मुनाफा प्रति हेक्टेयर 29,442 रुपये था। साल 2022-23 में गेहूं पर किसानों का मुनाफा प्रति हेक्टेयर 53 प्रतिशत बढ़कर 45,179 रुपये हो गया, मगर एक दशक में ग्रामीण उपभोक्ता कीमतों में 71 फीसदी बढ़त हुई। इस लिहाज से, मुनाफे और उपभोक्ता कीमतों की वृद्धि के बीच 18 फीसदी की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। सीएसीपी के आंकड़ों के लिहाज से गन्ना किसानों के मुनाफे में भी कमी दिखाई देती है।

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साल 2012-13 में गन्ना किसानों का मुनाफा प्रति हेक्टेयर 96,451 रुपये था, जो साल 2022-23 में बढ़कर 1,21,668 रुपये हो गया। तुलनात्मक रूप से यह बढ़ोतरी 26 प्रतिशत की है, लेकिन इस दौरान उपभोक्ता मूल्य आधारित जो मुद्रास्फीति हुई, उसकी बढ़त की तुलना में यह मुनाफा कम है। साल 2012-13 की बात करें तो गन्ना किसानों का मुनाफा लागत के लिहाज से 151 प्रतिशत था, जो साल 2022-23 में घटकर 102 फीसदी ही रह गया। 

बढ़ती लागत और स्थिर आय का संकट
कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के आंकड़े बताते हैं कि किसानों की कमाई स्थिर हो गई है और उनका लाभ भी घट रहा है। यह ठीक है कि केंद्र सरकार की कोशिशों और योजनाओं से पिछले करीब एक दशक में किसानों की कमाई तो बढ़ी है, लेकिन बढ़ती महंगाई और लागत के मुकाबले उनकी आय नहीं बढ़ रही। इसके साथ ही, खेती पर लागत भी बढ़ी है, लेकिन लागत के अनुपात में किसानों को मुनाफा नहीं बढ़ रहा है। इससे किसानों पर एक दशक पहले की तुलना में आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। आनुपातिक रूप से फसलों से होने वाली कमाई में बढ़त नहीं होने की वजह से खेती और किसानी से एक बड़े कृषक समुदाय का मोहभंग भी हो रहा है। जिनके पास साधन और सहूलियत है, वे किसानी से इतर कमाई और रोजगार के अन्य साधन ढूंढ रहे हैं।

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फसलों के मुनाफे में दिखाई देता है अंतर 
सीएसीपी के एक अध्ययन में दस मुख्य फसलों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें खरीफ और रबी दोनों मौसमों की फसलें शामिल हैं। इस विश्लेषण से पता चलता है कि मक्का, मूंगफली और सरसों को छोड़कर बाकी फसलों में किसानों की आय पिछले एक दशक के दौरान बढ़ने वाली ग्रामीण महंगाई की तुलना में कम बढ़ी है। 

आयोग के आंकड़ों के अनुसार, साल 2013-14 में धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर 25,179 रुपये की लागत आई थी। आयोग ने इस खेती में किसान परिवार की मेहनत का मूल्य 8,452 रुपये प्रति हेक्टेयर आंका है। उस वर्ष की प्रति हेक्टेयर उपज और न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिहाज से किसानों को धान की फसल पर 53,242 रुपये प्रति हेक्टेयर की आमदनी हुई। खेती पर आने वाली लागत और श्रम मूल्य के जोड़-गणित के बाद आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पता चलता है कि उस वर्ष किसानों को धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर सिर्फ 19,611 रुपये का ही मुनाफा हुआ। 

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इसी कड़ी में अब साल 2023-24 के आंकड़ों की बात करते हैं। इस वर्ष धान की खेती पर लाभ  बढ़कर 30,216 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गया। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो यह 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी मानी जाएगी, जिसकी तुलना इस दौरान ग्रामीण उपभोक्ता कीमतों के लिहाज से देखें तो यह फायदा बहुत कम दिखाई पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013-14 से 2023-24 के बीच ग्रामीण उपभोक्ता कीमतों में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि धान किसानों का लाभ 54 प्रतिशत ही हुआ। इस आधार पर देखें तो धान की फसल के फायदे में भी कमी आई है। 

नहीं बढ़ा रहा महंगाई के अनुपात में मुनाफा 
भारत में सबसे ज्यादा उत्पादन वाली दस फसलों पर एक दशक में लागत, उन पर होने वाले मुनाफे और ग्रामीण उपभोक्ता महंगाई का सीएसीपी ने अध्ययन किया है। इनमें सिर्फ तीन फसलें मक्का, सरसों और मूंगफली ही हैं, जिनकी उपज पर लागत और उपभोक्ता महंगाई के लिहाज से मुनाफा बढ़ा है।

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सीएसीपी के आंकड़ों के अनुसार, मक्का पर पिछले एक दशक की तुलना में मुनाफा जहां 162 फीसदी बढ़ा है, वहीं सरसों पर 85.7 फीसदी और मूंगफली पर 71.4 फीसदी वृद्धि हुई है। लेकिन, बाकी फसलों की लागत के अनुपात में जो मुनाफा बढ़ा है, वह इस दौर में बढ़ी महंगाई दर से कम है।

भारत में चना का भी खूब उत्पादन होता है, लेकिन उसकी खेती पर एक दशक में मुनाफा 50 से 60 फीसदी के ही बीच रहा, जबकि सोयाबीन और कपास की मुनाफा वृद्धि 20 और 30 फीसदी के बीच रही। देश की एक और प्रमुख पैदावार अरहर की मुनाफा वृद्धि तो 20 प्रतिशत से भी कम रही है। इस लिहाज से देखें तो किसानों की आमदनी एक तरह से स्थिर ही हुई है, मक्का, मूंगफली और सरसों की पैदावार लेने वाले किसान इसके थोड़े से अपवाद माने जा सकते हैं। 

सीमांत किसानों की स्थिति
साल 2015-16 में भारत सरकार ने कृषि जनगणना कराई थी। इसके आंकड़ों के हिसाब से देश की औसत भूमि जोत का आकार 1.1 हेक्टेयर से कुछ कम ही है। भारत में करीब 68.5 प्रतिशत किसान सीमांत हैं। इसका मतलब है कि उनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है। कृषि जनगणना के अनुसार, सीमांत किसानों के पास औसतन 0.38 हेक्टेयर जमीन ही है। ज्यादातर किसानों की आय प्रति हेक्टेयर के मुनाफे से भी कम है। किसानों की स्थिति में बहुत बेहतरी कम से कम कृषि के लिहाज से नहीं हुई है। अगर उनकी स्थिति पहले से कुछ बेहतर दिखती है तो इसकी वजह सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और आय के कुछ अन्य साधन हो सकते हैं। 

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भविष्य के लिए कैसी हो नीतिगत दिशा
खेती को लाभप्रद बनाने और किसानों की आय खेती की लागत एवं महंगाई दर के लिहाज से बेहतर बनाने की दिशा में गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत है। अब भी भारत की बड़ी जनसंख्या गांवों में रहती है और उसकी रोजी-रोटी का प्रमुख आधार खेती-किसानी ही है।

हमारे यहां अमेरिका जैसी स्थिति नहीं है, जहां सकल घरेलू उत्पाद में खेती का योगदान महज 0.9 फीसदी और रोजगार में हिस्सेदारी 02 प्रतिशत ही है। चीन में भी हालात बदल रहे हैं। वहां की जीडीपी में कृषि का योगदान 6.8 प्रतिशत और रोजगार में हिस्सेदारी 22 प्रतिशत है। हमारे नीति-नियंताओं को इन संदर्भों में अपनी खेती-किसानी को देखना होगा, तभी किसानी खुशहाली का जरिया बन पाएगी और भारत का किसान भी देश के दूसरे उपभोक्ताओं के साथ कदमताल कर पाएगा। साथ ही, यह जरूर ध्यान रखना होगा कि हमारे देश में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या सबसे अधिक है। 


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