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डिजिटल कृषि मिशन 2.0 : छोटे किसानों की मंडी तक पहुंच होगी आसान, एगमार्कनेट 2.0 एप से जान सकेंगे मंडी भाव
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 23 Jan 2026 08:53 PM IST
सार
खेती को स्मार्ट बनाने के लिए डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन 2.0 शुरू किया गया है। एआई, ड्रोन, आईओटी और डेटा के जरिये पैदावार बढ़ाने, संसाधनों की बचत और किसानों की आय बढ़ाने में यह मिशन मदद करेगा और नई तकनीक एवं नीतियों को खेती से जोड़कर किसानों को सशक्त बनाएगा।
डिजिटल कृषि मिशन 2.0 ने किसान और मंडी के बीच की दूरी को काफी हद तक कम किया है।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारतीय राजनीति में खेती-किसानी लंबे समय से वादों का विषय रही है, लेकिन वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों की आय दोगुनी करने के साथ खेती को तकनीक से जोड़ने का जो संकल्प लिया, उसने बहस की दिशा मोड़ दी। कृषि संस्कृति वाला देश होने के बावजूद भारत आज भी उत्पादकता और लाभ के मामले में कई देशों से पीछे है, जबकि पड़ोसी देश चीन ने तकनीकी नवाचार के सहारे खेती को फायदे का सौदा बना लिया।
इसी चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश के तहत केंद्र सरकार ने सितंबर, 2024 में डिजिटल कृषि मिशन को मंजूरी दी। 2,817 करोड़ रुपये के इस मिशन का उद्देश्य किसानों के लिए एक मजबूत डिजिटल सार्वजनिक ढांचा खड़ा करना है, ताकि मृदा विश्लेषण, फसल अनुमान, उपज मॉडलिंग और ऋण जैसी सुविधाएं तकनीक के जरिए सीधे खेत तक पहुंच सकें। खास बात यह है कि जहां आम धारणा इसे बड़े किसानों के लिए उपयोगी मानती है, वहीं देश के 86 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह मिशन खेती के भविष्य की नई उम्मीद बनकर उभरता दिख रहा है।
किसान और मंडी के बीच घटती दूरी
डिजिटल कृषि मिशन को मंज़ूरी देते समय ही सरकार ने इसकी दिशा और लक्ष्य स्पष्ट कर दिए थे - एक ऐसा मजबूत, समावेशी और किसान-केंद्रित डिजिटल इकोसिस्टम खड़ा करने का रोडमैप तैयार किया गया, जिससे सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और कार्यकुशलता बढ़े, नीतिगत फैसलों के लिए भरोसेमंद डेटा उपलब्ध हो और कृषि क्षेत्र में डिजिटल तकनीक को नई गति मिले।
इसी सोच की अगली कड़ी के रूप में डिजिटल कृषि मिशन 2.0 सामने आया है, जिसने किसान और मंडी के बीच की दूरी को काफी हद तक कम किया है। इसके तहत लॉन्च किए गए एगमार्कनेट 2.0 एप के जरिए किसान अब घर बैठे देशभर की मंडियों में जिंसों के ताजा भाव जान सकते हैं। यह एप न केवल किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाने में मददगार होगा, बल्कि मंडी व्यवस्था में पारदर्शिता भी बढ़ाएगा।
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग वर्ष 2000 से विपणन अनुसंधान एवं सूचना नेटवर्क योजना चला रहा है और एगमार्कनेट 2.0 उसी पोर्टल का उन्नत तकनीकी संस्करण है, जिसे नवंबर 2025 में लॉन्च किया गया। फिलहाल इससे देश की करीब 4,367 मंडियां जुड़ चुकी हैं, जहां से किसानों को रियल टाइम में फसलों के दाम और आवक की जानकारी मिल रही है, जबकि नई मंडियों को जोड़ने की प्रक्रिया भी लगातार जारी है।
किसानों की मुट्ठी में मंडी का पूरा हाल
एगमार्कनेट 2.0 मोबाइल एप मंडियों में फसल से जुड़ा डेटा तुरंत दर्ज करने में सक्षम है, जिससे किसान अपने मोबाइल फोन पर ही देशभर की मंडियों के ताजा भाव और वहां आने वाली उपज की जानकारी रियल टाइम में प्राप्त कर सकते हैं। इससे उन्हें अपनी फसल की सही कीमत का अंदाजा लगाने और बेहतर दाम पर बिक्री का फैसला लेने में मदद मिलती है। इसके साथ ही पहले से लागू राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फसल की खरीद-फरोख्त और ऑनलाइन बोली की सुविधा देता है।
मांग-आधारित इस योजना के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रस्ताव पर मंडियों को जोड़ा गया है, जिनकी संख्या फिलहाल 1,522 तक पहुंच चुकी है। ई-नाम के जरिए किसानों को न केवल पारदर्शी मूल्य खोज की सुविधा मिलती है, बल्कि तत्काल ई-भुगतान का लाभ भी मिलता है। एगमार्कनेट 2.0 और ई-नाम दोनों प्लेटफॉर्म पर 247 कृषि उत्पादों के दाम बिना किसी शुल्क के उपलब्ध हैं, साथ ही यह ऐप नजदीकी ई-एनएएम मंडियों की पहचान, वहां के भाव और पहुंचने का रास्ता भी दिखाता है।
मजबूत हो रहा है डिजिटल कृषि ढांचा
इस मिशन के तहत कृषि क्षेत्र के लिए एग्रीस्टैक, कृषि निर्णय समर्थन प्रणाली (केडीएसएस) और व्यापक मृदा उर्वरता व प्रोफाइल मानचित्र जैसी डिजिटल सार्वजनिक संरचनाओं की नींव रखी गई है। एग्रीस्टैक में तीन प्रमुख रजिस्ट्रियां शामिल हैं - भू-संदर्भित ग्राम मानचित्र, फसल बुआई रजिस्ट्री और किसान रजिस्ट्री - जिन्हें तैयार करने और अद्यतन रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। किसान रजिस्ट्री किसानों के जनसांख्यिकीय विवरण, जोत की स्थिति और बोई गई फसलों से जुड़े सटीक व उपयोगी आंकड़े उपलब्ध कराती है, जिससे ऋण, बीमा और खरीद-फरोख्त के लिए उनकी डिजिटल पहचान बनाना आसान हुआ है।
इस पोर्टल और एप के माध्यम से किसान डिजिटल अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ रहे हैं और कृषि लागत व उपज की ऑनलाइन खरीद-बिक्री करने में सक्षम हो रहे हैं। उपग्रह आधारित और अद्यतन तकनीक होने के कारण यह प्रणाली किसानों को मौसम की ताजा जानकारी, मिट्टी, जलाशयों और भूजल से जुड़े आंकड़े, साथ ही सरकारी योजनाओं का विवरण भी उपलब्ध कराती है। इसके अलावा, फसल और मृदा मानचित्र, स्वचालित उपज अनुमान मॉडल तथा सूखा-बाढ़ निगरानी जैसी सुविधाएं भी इसी डिजिटल ढांचे का हिस्सा हैं।
फ्रंटियर तकनीक की राह में चुनौतियां
इस पूरी व्यवस्था को फ्रंटियर टेक्नोलॉजी यानी अग्रिम मोर्चे की तकनीक के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इसके रास्ते में कई चुनौतियां मौजूद हैं। इन्हीं अड़चनों को रेखांकित करते हुए नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब ने नवंबर में “रीइमैजिनिंग एग्रीकल्चर: ए रोडमैप फॉर फ्रंटियर टेक्नोलॉजी-लीड ट्रांसफॉर्मेशन” नामक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में कहा गया है कि अग्रणी तकनीकें कृषि की उत्पादकता बढ़ाने, उसे अधिक लचीला बनाने और किसानों की आय में इजाफा करने की क्षमता रखती हैं, बशर्ते मौजूदा कमियों को दूर किया जाए। नीति आयोग के अनुसार, भारतीय कृषि से जुड़े आंकड़े बिखरे हुए हैं, उनकी प्रमाणिकता जांचने और एकीकृत रूप में उपलब्ध कराने का कोई ठोस तंत्र नहीं है, और गुणवत्तापूर्ण डेटा की भारी कमी है।
यह सच है कि देश में मोबाइल और इंटरनेट का प्रसार तेजी से हुआ है, लेकिन किसानों तक गुणवत्तापूर्ण डिजिटल कनेक्टिविटी अब भी सीमित है, जिसे रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। इसके अलावा, कृषि का उद्योग और शिक्षा जगत से तालमेल कमजोर है, नीति निर्माण और नियामक ढांचे में समन्वय की कमी भी सामने आती है, जिससे उन्नत तकनीकों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
नीति आयोग का मानना है कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कृषि क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन अनिवार्य है, और इसमें फ्रंटियर तकनीक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि किसानों को आधुनिक तकनीक और नवाचार से लैस किया जाए, गांवों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित की जाए, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म का वास्तविक और टिकाऊ लाभ जमीनी स्तर तक पहुंच सके।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जनवरी 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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