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बागवानी : हरित क्रांति की तर्ज पर भारत के बाग-बगीचों में फूट रहे हैं एक नई क्रांति के अंकुर

उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 17 Jun 2025 03:01 PM IST
सार

हरित क्रांति की तर्ज पर भारत के बाग-बगीचों में नई क्रांति के अंकुर फूट रहे हैं। बागवानी उत्पादन में बढ़ोतरी, विशेषकर फल-सब्जियों की उपज में वृद्धि के जरिए यह क्रांति उभर रही है, जिससे पोषण, किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण भारत की समृद्धि की नई राह प्रशस्त हो रही है।

बागवानी क्षेत्र का लाभ उठाने के लिए भंडारण, आपूर्ति और मौसमी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयारी जरूरी
बागवानी क्षेत्र का लाभ उठाने के लिए भंडारण, आपूर्ति और मौसमी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयारी जरूरी - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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भारत में खेती-किसानी का अर्थ केवल अनाज उगाना नहीं, बल्कि पशुपालन और बागवानी का समन्वय रहा है। सदियों से ये तीनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। देशभर में बाग-बगीचों में अब एक नई क्रांति उभर रही है, जिसे भारत की दूसरी हरित क्रांति कहा जा रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और वैज्ञानिकों के प्रयासों से भारत फल-सब्जी उत्पादन में विश्व में अग्रणी बना हुआ है। वर्ष 2024-25 में 3620.9 करोड़ टन की अनुमानित पैदावार और मसालों की बढ़ती खेती के साथ बागवानी भारतीय अर्थव्यवस्था का एक-तिहाई हिस्सा बन चुकी है। भंडारण और निर्यात की चुनौतियां दूर हो जाएं तो बागवानी भारत को वैश्विक खाद्य आपूर्ति का केंद्र बना सकती है। यह क्रांति पोषण, मजबूत अर्थव्यवस्था और ग्रामीण भारत की समृद्धि की नई राह प्रशस्त कर सकती है। 

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पहली हरित क्रांति से स्वर्ण क्रांति की ओर बढ़ता भारत 

वर्ष 1966-67 में शुरू हुई पहली हरित क्रांति खाद्यान्न उत्पादन पर केंद्रित थी। उच्च उपज वाली फसलों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और आधुनिक सिंचाई तकनीकों ने भारत को खाद्य आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। अब बागवानी क्रांति, जिसे ‘स्वर्ण क्रांति’ कहा जाता रहा है, फल और सब्जियों की पैदावार में वृद्धि के साथ नया दौर ला रही है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन और डॉ. के.एल. चड्ढा जैसे वैज्ञानिकों के प्रयासों से इसे नई गति मिली। कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन की हरित क्रांति और वर्गीस कुरियन की दुग्ध क्रांति में जो भूमिका रही, बागवानी क्रांति लाने में कुछ वैसी ही अहम भूमिका के.एल. चड्ढा की रही है।

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आहार आदतों में बदलाव से बढ़ी बागवानी उत्पादों की मांग

बागवानी क्रांति की एक बड़ी वजह हाल में भारतीयों की आहार आदतों और जरूरतों में आया बदलाव भी है। कैलोरी और पोषण-केंद्रित भोजन की मांग ने फल और सब्जियों की खपत को बढ़ाया है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन ने मौसमी फल-सब्जियों के उत्पादन को अधिक व्यवस्थित और उत्पादक बनाने में भूमिका निभाई है। नतीजतन, आम, केला, चीकू, नींबू और फूलगोभी का भारत दुनिया में अग्रणी उत्पादक है, जबकि प्याज में दूसरा और गोभी में तीसरा स्थान रखता है। बागवानी की हिस्सेदारी भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में एक-तिहाई है। 256.6 करोड़ हेक्टेयर में बागवानी से 3204.8 करोड़ टन फल-सब्जियां पैदा हो रही हैं, जबकि 1276 करोड़ हेक्टेयर में खेती से 3322.98 लाख टन खाद्यान्न पैदा हो रहा है। बागवानी की उत्पादकता 12.49 टन प्रति हेक्टेयर है, जो खाद्यान्न की 2.23 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता से कहीं अधिक है।

वर्ष 2004-05 से 2021-22 तक बागवानी उत्पादकता में 38.5% की वृद्धि हुई है। भारत में 70 प्रकार की सब्जियों का उत्पादन होता है और फल-सब्जियों के कुल उत्पादन में हमारा देश विश्व में दूसरे स्थान पर है। अदरक, भिंडी, केला, आम और पपीता में भारत विश्व में शीर्ष पर है। ज्यादातर खपत भी भारत में ही हो रही है, जिसका मतलब है कि भारतीय पोषण में बागवानी बड़ा योगदान दे रही है।

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2024-25 में बागवानी उत्पादन अनुमान

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 2024-25 में बागवानी से 3620.9 करोड़ टन उत्पादन का अनुमान है, जो 2023-24 से 73.42 लाख टन अधिक है। फलों का उत्पादन 2.48 लाख टन बढ़कर 1132.26 लाख टन होने का अनुमान है। आम, अंगूर और केले की ज्यादा पैदावार होने के चलते यह संभव हुआ है। सब्जियों का उत्पादन 2072.08 लाख टन से बढ़कर 2145.63 लाख टन होने का अनुमान है। इस साल प्याज, आलू, टमाटर, हरी मिर्च, फूलगोभी और मटर की पैदावार में बढ़ोतरी की उम्मीद है। प्याज (242.67 से 288.77 लाख टन), आलू (570.53 से 595.72 लाख टन) और टमाटर (213.23 से 215.49 लाख टन) में वृद्धि की उम्मीद है। इस साल मसालों का उत्पादन करीब 119. 96 लाख टन होने जा रहा है। हल्दी और लहसुन उत्पादन में भी बढ़ोतरी दिख रही है। कुल बागवानी फसलों का उत्पादन 1.5% बढ़कर 176.66 लाख टन होने का अनुमान है। 

बागवानी उत्पादों का निर्यात 

भारत का सब्जी निर्यात में 14वां और फल निर्यात में 23वां स्थान है, लेकिन वैश्विक बागवानी बाजार में हिस्सेदारी केवल 1% है। इसका कारण उत्पादन की कमी नहीं, बल्कि भंडारण और आपूर्ति व्यवस्था की कमियां हैं। लगभग 15-20% फल-सब्जियां आपूर्ति के दौरान बर्बाद हो जाती हैं। मौसम की मार भी एक बड़ी चुनौती है। इन समस्याओं का समाधान भारत को वैश्विक बागवानी बाजार में अग्रणी बना सकता है।

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बागवानी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी योजनाएं 

बागवानी को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। एकीकृत बागवानी विकास मिशन फल, सब्जी, मसाले, मशरूम, काजू, कोको, बांस, सगंध फसलें, फूल और नारियल जैसी फसलों को प्रोत्साहित करता है। इसके साथ ही, हरित क्रांति-कृषोन्नति योजना भी चलाई जा रही है, जिसे एकीकृत बागवानी विकास मिशन साल 2014-15 से ही चला रहा है। इस योजना के तहत भारत सरकार पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में बागवानी विकास कार्यक्रमों के कुल खर्च का 60% हिस्सा देती है, जबकि बाकी 40% हिस्सा राज्यों की ओर से दिया जाता है।

बागवानी विकास के लिए इस योजना के तहत पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों - उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर में केंद्र सरकार 90% योगदान देती है, जबकि राज्यों की हिस्सेदारी 10% है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन 18 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है। केंद्र सरकार ने साल 2006 में केंद्रीय बागवानी संस्थान की स्थापना नागालैंड के मेगी जिप हिमा में की थी, जिसके जरिए पूर्वोत्तर के किसानों और खेतिहर मजदूरों को बागवानी के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी दी जा रही है। बागवानी क्लस्टर विकास कार्यक्रम और कृषि अवसंरचना कोष भी किसानों को सशक्त बना रहे हैं। बागवानी क्लस्टर विकास कार्यक्रम के तहत किसान समूहों का चयन करके उन्हें विकसित करते हुए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश हो रही है। कृषि अवसंरचना कोष के जरिए भी किसानों को सहायता दी जा रही है। 

इन योजनाओं से मिल रहा समर्थन

  •     राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम)
  •     पीएमएफबीवाई के तहत समर्थन
  •     फसल उपरांत बुनियादी ढांचा विकास योजना
  •     बागवानी क्लस्टर विकास कार्यक्रम 
  •     मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
  •     पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए बागवानी मिशन 

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एकीकृत बागवानी विकास मिशन से बदलाव की तैयारी 

  • वृक्षारोपण अवसंरचना विकास : गुणवत्तापूर्ण बीज व रोपण सामग्री उत्पादन के लिए नर्सरी और ऊतक संवर्धन इकाइयों की स्थापना।
  • क्षेत्र विस्तार : ड्रिप सिंचाई जैसे हस्तक्षेपों के एकीकरण के साथ या उसके बिना विभिन्न फसलों के लिए नए बाग और उद्यान बनाना।
  • बागों का कायाकल्प : पुराने और अनुत्पादक बागों को पुनर्जीवित करना।
  • संरक्षित खेती : सूक्ष्म सिंचाई सुविधाओं के साथ पॉलीहाउस, ग्रीनहाउस, शेड नेट हाउस और वॉक-इन टनल की स्थापना।
  • जैविक खेती को बढ़ावा : जैविक प्रथाओं को प्रोत्साहित करना, प्रमाणन और वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा। 
  • जल संरक्षण : सामुदायिक टैंक, खेत पर तालाब व जल संचयन प्रणाली विकसित करना।
  • मधुमक्खी पालन : मधुमक्खी कॉलोनियों, छत्ते और संबंधित उपकरणों का उत्पादन।
  • बागवानी मशीनीकरण : पावर टिलर, ट्रैक्टर और पौध संरक्षण उपकरण उपलब्ध कराना। 
  • मानव संसाधन विकास : जागरूकता कार्यक्रम, किसान प्रशिक्षण, एक्सपोजर विजिट और अध्ययन के लिए दौरे आयोजित करना। 
  • फसल उपरात प्रबंधन : पूर्वोत्तर राज्यों में कोल्ड स्टोरेज, पैक हाउस, राइपनिंग चैम्बर, रीफर वाहन, प्रसंस्करण इकाइयां और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाएं स्थापित करना। 
  • विपणन ढांचा : उत्पादों के विपणन के लिए स्थिर और मोबाइल वेंडिंग गाड़ियां, खुदरा दुकानें, ग्रामीण बाजारा, थोक बाजार और प्रत्यक्ष बाजार प्लेटफॉर्म विकसित करना।

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स्वच्छ पौध कार्यक्रम से जगी नई उम्मीद 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वच्छ पौध कार्यक्रम (सीपीपी) को मंजूरी दी है। 1,765.67 करोड़ रुपये के निवेश से समर्थित सीपीपी का उद्देश्य बागवानी फसलों, विशेष रूप से फलों के उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार करना है। इसके कई फायदे मिलने की उम्मीद है: 

उपज में वृद्धि : वायरस मुक्त व बेहतर रोपण सामग्री प्रदान करके गुणवत्तापूर्ण उपज बढ़ेगी।
अधिक आय : उच्च गुणवत्ता के उत्पादन से किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा।
नर्सरियों को फायदा : सुव्यवस्थित प्रमाणन और बुनियादी ढांचे के लिए समर्थन नर्सरियों को स्वच्छ रोपण सामग्री का उत्पादन करने में मदद करेगा। साथ ही, बेहतर नर्सरी सुविधाएं भी सुनिश्चित की जा सकेंगी। 
उपभोक्ताओं को लाभ : वायरस-मुक्त फल मिलेंगे, जो पोषण मूल्य में भी बेहतर होंगे। 
निर्यात को बढ़ावा : उच्च गुणवत्ता वाले फलों के साथ भारत अग्रणी निर्यातक के रूप में उभरेगा।

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कैसी हो आगे की राह? 

भारतीय बागवानी क्षेत्र में संभावनाएं अपार हैं, लेकिन भंडारण, आपूर्ति और मौसमी चुनौतियों से निपटने के लिए प्रबंधन में सुधार जरूरी है। यदि ये चुनौतियां दूर हो जाएं, तो बागवानी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकती है, जिससे वैश्विक बाजार में भारत का दबदबा बढ़ेगा। हमारी अमराइयां तब न केवल संस्कृति की वाहक होंगी, बल्कि आर्थिक समृद्धि की पतवार भी थामेंगी।



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