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थाली में लौट रहे पौष्टिक अनाज: वैज्ञानिकों की मेहनत से बढ़ेगी श्री अन्न की पैदावार और किसानों की कमाई
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 12 Jan 2026 01:39 PM IST
सार
प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के सेवन से उभरी स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच वैज्ञानिक अब श्री अन्न की नई किस्में लेकर आ रहे हैं। कम पानी एवं कम खाद में अधिक उपज देने वाली ये फसलें सूखा सहने में सक्षम होने के साथ ही पोषक तत्वों से भरपूर होंगी और किसानों की आय बढ़ाने में भी योगदान देंगी।
मोटे अनाजों की नई किस्में लाएंगी पोषण क्रांति और किसानों की समृद्धि।
- फोटो : गांव जंक्शन
भागदौड़ भरी जिंदगी में बेहतर स्वास्थ्य और स्वस्थ जीवन हर व्यक्ति के लिए चुनौती बन चुका है। भौतिक विकास की दौड़ में हमने अपने पारंपरिक पोषण-युक्त भोजन और खानपान की पुरानी व्यवस्था को भुला दिया है। विकास की इस कथित आंधी में हमारी थाली से कई पौष्टिक अनाज समय के साथ गायब होते चले गए। इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि कुछ दशकों पहले तक हमारे घरों में इन अनाजों की अपरिहार्य उपस्थिति हुआ करती थी। लेकिन, बढ़ते शहरीकरण और जीवन में पश्चिमी नजरिये की बढ़ती घुसपैठ ने हमारी भोजन शैली को भी बुरी तरह प्रभावित किया। नतीजा यह हुआ कि खानपान के नाम पर जंक फूड और बाजारी प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ता गया, जो धीरे-धीरे हमारा स्टेटस सिंबल भी बन गया। इससे हमारा खानपान असंतुलित हुआ और जीवनशैली जनित बीमारियों ने जिंदगी में जगह बना ली। इन सबका जवाब अब हमारे वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने खोज लिया है। मोटे अनाज या कदन्न ही इसका समाधान हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांस्कृतिक गौरव के साथ श्री अन्न का नाम दिया है।
थाली से गायब होते पौष्टिक अनाज
श्री अन्न पोषण से भरपूर है, मगर धान-गेहूं की तुलना में इनका उत्पादन कम होता है। हालांकि, इनकी पैदावार के लिए धान-गेहूं की फसलों की तरह कीटनाटकों, रासायनिक खाद और पानी की कम ही जरूरत होती है। चूंकि इनकी पैदावार कम होती है, लिहाजा इनकी खेती से किसान हिचकते हैं। लेकिन, सरकार मोटे अनाजों के स्वास्थ्य संबंधी फायदों और किसानों की आय बढ़ाने में इनकी भूमिका को देखते हुए श्री अन्न की खेती को प्रोत्साहन दे ही रही है। किसान उत्साहित हों, इसके लिए मोटे अनाजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी घोषित किया जा रहा है। अब सरकार की कोशिश मोटे अनाजों पर शोध और नवाचार को बढ़ावा देना है, ताकि इनकी भी पैदावार बढ़ाई जा सके और किसान इनकी खेती के लिए ज्यादा उत्साहित और आकर्षित हो सकें। इन्हीं तथ्यों और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि वैज्ञानिकों से मोटे अनाजों की बेहतर किस्में विकसित करनी उनकी खेती के लिए मुनाफे का मॉडल बनाने के लिए अपील की है।
पोषक गुणों से भरपूर अनाज श्रीअन्न
मोटे अनाजों में तमाम तरह के खनिज पाए जाते हैं, लेकिन खासतौर पर विकसित की जा रही इन किस्मों में जिंक, आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम और एंटी-ऑक्सिडेंट जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होंगे, जिनसे मानवीय पोषण में सहायता मिलेगी। चूंकि इन फसलों की पैदावार बढ़ेगी, लिहाजा बेहतर उपज और और अधिक मांग की वजह से इन फसलों के चलते किसानों की आय बढ़ेगी और उनकी जिंदगी पहले की तुलना में बेहतर हो सकेगी। यहां यह बताना जरूरी है कि मोटे अनाजों की कुछ बेहतर किस्में बाजार में आ चुकी हैं। उनका असर भी दिख रहा है। पहले ओडिशा जैसे राज्य में प्रति हेक्टेयर रागी की पैदावार जहां 6 क्विंटल होती थी, वहीं अब नई किस्मों के उपयोग से इसकी उपज बढ़कर 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर को पार कर गई है।
कम पैदावार की खामी हो रही दूर
मोटे अनाजों को लेकर भुवनेश्वर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में शिवराज सिंह चौहान ने स्वीकार किया कि मोटे अनाज की पैदावार बढ़ाने की दिशा में वैज्ञानिक उन्नत किस्मों पर काम कर रहे हैं। इसका असर ठीक वैसे ही जल्द दिख सकता है, जैसे पिछली सदी के साठ के दशक में धान और गेहूं की पैदावार को बढ़ते हुए देखा गया था, जब वैज्ञानिकों ने इन प्रमुख खाद्यान्न फसलों की उन्नत प्रजातियां विकसित की थीं। श्री अन्न यानी मोटे अनाजों की उन्नत किस्में आने से पैदावार बढ़ेगी, तो किसानों की कमाई बढ़ेगी और रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के इस्तेमाल की वजह से मिट्टी की सेहत में जो गड़बड़ी हुई है, उसमें भी सुधार आएगा।
जब से श्री अन्न की ओर सरकार का ध्यान गया है, जब से आधुनिक परिवारों में भी मोटे अनाजों की मांग बढ़ी है, सरकारी प्रोत्साहन और चाहत के अलावा वैज्ञानिक खुद भी मोटे अनाजों की नई और बेहतर किस्में विकसित करने को लेकर काम कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की कोशिश ऐसी फसलें विकसित करना है, जिनमें सूखे से निबटने की सामर्थ्य हो, जो पोषक तत्वों से भरपूर हों, और जो बेहतर उपज देने की क्षमता से युक्त हों। इन्हें विकसित करने को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर आनुवंशिक सुधार, संकर किस्मों का विकास और उन्नत कृषि पद्धतियों का उपयोग किया जा रहा है। इस दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से सम्बद्ध संस्थान और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालय लगातार जुटे हुए हैं।
मोटे अनाजों की बेहतर किस्में
मोटे अनाजों की बेहतर एवं नई किस्में विकसित करने के लिए वैज्ञानिक आनुवंशिक डाटा का उपयोग कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की कोशिश रोग प्रतिरोधी किस्मों के साथ ही कम पानी में उगने वाली किस्में तैयार करने की है। इसके तहत बाजरा और ज्वार जैसी फसलों की संकर यानी हाइब्रिड और संकुल यानी कंपोजिट किस्में विकसित करने पर गंभीरता से काम चल रहा है। इनसे जहां बेहतर उपज हासिल होगी, वहीं पशुओं के लिए पहले की तुलना में ज्यादा चारा भी मिलेगा। पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों को मिलाकर मोटे अनाजों की ऐसी किस्में लाने की कोशिश की जा रही हैं, जिन पर जलवायु परिवर्तन का असर न हो और जो कई तरह की मिट्टी में उग सकती हों। इस लक्ष्य के साथ विशेष तौर पर ज्वार, बाजरा, रागी, कंगनी, कुटकी और सांवा जैसे नौ प्रमुख मोटे अनाजों पर अनुसंधान जारी है।
वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिये बेहतर फसल हासिल करने के लिए राजस्थान कृषि अनुसंधान केंद्र जैसे संस्थान जौ की नई किस्में विकसित कर रहे हैं। इन फसलों में ग्लूकोज की मात्रा कम है, जिसकी वजह से ये फसल विशेष तौर पर मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद साबित होगी। वैसे भी जौ में ग्लूटेन की मात्रा कम होती है, इसी तरह बाजरे में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स जैसी विशेषताएं होती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है।
किसानों को मिलेगा फायदा
वैसे तो मोटे अनाज बुनियादी रूप से सूखा को झेल सकते हैं। इन फसलों के लिए पानी की भी कम ही जरूरत पड़ती है। इसकी वजह से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का उन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता। वैज्ञानिक श्री अन्न की ऐसी किस्में विकसित करने में जुटे हैं, जो न सिर्फ जलवायु परिवर्तन का सामना करने में सक्षम होंगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने के सहभागी भी बनेंगी।
मोटे अनाजों की खेती के कई फायदे दिखे भी हैं। आंध्र प्रदेश में वैज्ञानिकों ने पाया है कि धान उगाने वाले खेतों या परती खेतों में ज्वार जैसे मोटे अनाजों की खेती से किसानों की आर्थिक सुरक्षा बढ़ती है। वैसे मोटे अनाजों की विकास प्रक्रिया में तीन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा। इसके तहत इन फसलों की वैज्ञानिक खेती, उनमें निवेश के साथ ही अनुसंधान एवं विकास संस्थानों का समर्थन और उनकी क्षमता का विस्तार किया जाना होगा। ऐसा होने पर ही ये संस्थान पूरी ऊर्जा के साथ नई किस्मों के विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकेंगे।
दूसरा काम, इन फसलों की कीमतों को बढ़ावा देना है। बाजार में इन फसलों की मांग को भी बढ़ावा देना होगा। साथ ही, इन उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाकर उनकी खरीद की व्यवस्था करने के साथ ही किसानों को फसल बीमा देना होगा। श्री अन्न को स्कूलों के मध्याह्न भोजन और सार्वजनिक वितरण प्राणाली में शामिल किया जाए तो पोषण को बढ़ावा मिलने के साथ इन अनाजों की खपत भी बढ़ेगी। लेकिन, सबसे पहले श्री अन्न फसलों के लिए बेहतर भंडारण व्यस्था मुहैया कराने, नए गोदाम बनाने और प्रसंस्करण उद्योग के लिए नीतिगत और सरकारी संरक्षण देना होगा। तभी इन बढ़ी हुई फसलों की नई किस्मों का फायदा किसानों को मिल सकेगा।
इसमें दो राय नहीं है कि श्री अन्न की खेती का मतलब है पानी की बचत। निश्चित तौर पर प्रोत्साहन मिलने के बाद किसान श्री अन्न को अपनाएंगे। इससे जहां लोगों पौष्टिक आहार मिलेगा, वहीं सिंचाई से जुड़ी चुनौतियों से भी छुटकारा मिलेगा। इससे भूजल स्तर में भी तेजी से बढ़ोतरी होगी। इसमें दो राय नहीं है कि किसानों को जिस खेती में ज्यादा फायदा होता है, किसान उसी फसल को उगाते हैं। अगर किसानों को मोटे अनाज की खेती में लाभ दिखेगा, तो वे इसकी खेती को खुशी से अपनाएंगे।
मोटे अनाजों की खेती बंजर जमीन पर भी हो सकती है, क्योंकि इसके लिए खाद की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मोटे अनाजों की खेती की लागत घटती है और कमाई बढ़ती है। अगर श्री अन्न की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की अच्छी व्यवस्था की जाए, तो इसमें महिलाओं को भी रोजगार के अवसर मिल सकते हैं।
(यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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