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For Sustainable Farming Fpos Should Become Self Reliant By Giving Up The Greed For Subsidies
FPO: टिकाऊ खेती और किसानों की तरक्की के लिए सब्सिडी का लालच छोड़कर एफपीओ बनें आत्मनिर्भर
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 16 May 2025 04:42 PM IST
सार
Farmer Producer Organisations: देश में पंजीकृत एफपीओ से करीब 30 लाख किसान जुड़े हैं, जिनमें 40% महिलाएं शामिल हैं। छोटे एवं सीमांत किसानों को एफपीओ से जुड़कर नई ताकत मिल रही है। लेकिन, बाजार उन्मुख होने के बजाय सब्सिडी पर केंद्रित दृष्टिकोण इनके टिकाऊ विकास में बाधा बन सकता है।
10 हजार एफपीओ और 30 लाख किसान कृषि में ला रहे बड़ा बदलाव।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत में छोटे और सीमांत किसान कुल कृषक समुदाय का क्रमशः लगभग 67% और 18% हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि 0.40 हेक्टेयर से कम भूमि वाले 9.2 करोड़ सीमांत किसान और 1.42 हेक्टेयर की औसत भूमि वाले 2.4 करोड़ छोटे किसान हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, उत्तर बंगा कृषि विश्वविद्यालय और विश्वभारती, शांति निकेतन के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन पाया है कि छोटे किसानों को संसाधनों की कमी और बाजार से जुड़ी चुनौतियों का अधिक सामना करना पड़ता है।
किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन ने इस समस्या को आंशिक रूप से संबोधित किया है। नए एफपीओ को उभरते कृषि व्यवसाय पारिस्थितिकी तंत्र में स्थिरता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एफपीओ की सीमित संख्या, कम पूंजी, सदस्यों का कम जुड़ाव और बाजार उन्मुख होने के बजाय सब्सिडी पर केन्द्रित दृष्टिकोण इनके टिकाऊ भविष्य की राह में बाधा बन सकता है।
एफपीओ क्या हैं?
एफपीओ कंपनी अधिनियम के १४वें भाग के खंड-ए के तहत सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत किसान-उत्पादक संगठन हैं। खेती-किसानी और उससे जुड़ी गतिविधियों और उत्पादन के साथ ही विपणन से फायदा उठाने की कोशिश के तहत इन्हें खड़ा किया गया है। एफपीओ के सदस्य किसान होते हैं। इस लिहाज से कह सकते है कि एफपीओ एक तरह से किसान-सदस्यों द्वारा नियंत्रित उनके अपने स्वैच्छिक संगठन हैं। इसके सदस्य इसकी नीतियों के निर्माण और उन पर फैसला लेने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। एफपीओ के संचालक अपने किसान-सदस्यों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, प्रबंधकों एवं कर्मचारियों को जरूरी शिक्षा और प्रशिक्षण मुहैया कराते हैं, ताकि वे अपने संगठन के विकास में प्रभावी भूमिका निभा सकें।
किसानों को मिली नई ताकत
भारतीय किसान मेहनत तो खूब करता है, लेकिन आधुनिकीकरण की कमी, मांग एवं स्थान के लिहाज से व्यवस्थित आपूर्ति प्रबंधन के अभाव और छोटी कृषि जोत के चलते उसे उसके परिश्रम का वाजिब फल नहीं मिल पाता। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने किसान उत्पादक संगठन की परिकल्पना की। इस परिकल्पना को प्रधानमंत्री मोदी ने 29 फरवरी 2020 को मूर्त रूप दिया। योजना की सफलता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसके लागू होने के ठीक पांच साल बाद, यानी 24 फरवरी 2025 को बिहार के भागलपुर में प्रधानमंत्री ने 10 हजारवें एफपीओ की शुरूआत की। बिहार के खगड़िया जिले में पंजीकृत इस एफपीओ का फोकस मक्का, केला और धान की फसल के उत्पादन और विपणन पर है। 10 हजार एफपीओ का जो लक्ष्य रखा गया था, वह समय से पहले पूरा हो चुका है।
30 लाख किसान सीधे जुड़े
एफपीओ योजना के तहत साल 2027-28 तक के लिए सरकार ने 6,865 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसकी मदद से एफपीओ को वित्तीय संसाधन मुहैया कराए जा रहे हैं। आज एफपीओ किसानों के ऐेसे संगठन बनकर उभरे हैं, जो उनकी आय बढ़ाने और छोटे किसानों को मोल-भाव करने की ताकत देने के साथ बाजार तक उनकी पहुंच में सुधार कर रहे हैं। देश के पंजीकृत एफपीओ में करीब 30 लाख किसान सीधे जुड़े हैं। इनमें करीब 40 प्रतिशत महिलाएं हैं। सरकारी समर्थन, बाजार तक पहुंच और सहकारी प्रयास की वजह से ये एफपीओ कृषि क्षेत्र में अब हजारों करोड़ रुपये का न सिर्फ कारोबार कर रहे हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक बने हुए हैं।
810 एफपीओ में सिर्फ महिला सदस्य
शुरू में ही दस हजार संगठनों के गठन का असल मकसद, स्थाई आमदनी पर केंद्रित खेती-किसानी और उत्पादन को बढ़ावा देना और किसानों की आय बढ़ाना है। सहकारी आंदोलन का बेहतर प्रभाव देखने वाले राज्यों - मसलन, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में इन्होंने बेहद उत्साहजनक नतीजे दिखाए हैं। इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी जबरदस्त तरीके से बढ़ रही है। साल 2024 के आंकड़े के अनुसार, इस साल तक रजिस्टर्ड हुए 810 एफपीओ ऐसे रहे, जिनकी प्रत्येक सदस्य सिर्फ महिलाएं हैं। राजस्थान के पाली जिले की आदिवासी महिलाओं ने एक एफपीआे का गठन किया और जिससे शरीफा का उच्च मूल्य प्राप्त हो रहा है।
पांच साल तक देखरेख
इस योजना के तहत गठित हर नए एफपीओ को पांच साल तक हैंडहोल्डिंग समर्थन के साथ ही उन्हें तीन साल तक प्रबंधन खर्च के लिए 18 लाख रुपये की वित्तीय सहायता दी जा रही है। साथ ही, एफपीओ के प्रत्येक सदस्य किसान को दो हजार रुपये का प्रतिभूति अनुदान दिया जाएगा। जिसकी सीमा प्रति एफपीओ 15 लाख रुपये होगी। उन्हें संस्थागत ऋण सुनिश्चित करने के लिए हर एफपीओ को दो करोड़ रुपये तक के परियोजना ऋण की गारंटी सुविधा दी जा रही है।
छोटे किसानों को समर्थन
भारतीय किसानों की सबसे बड़ी समस्या उनकी पैदावार को सही जगह और खरीदार तक पहुंचाने के लिए व्यवस्थित प्रबंधन की कमी है। साथ ही, भारतीय खेती की जोत लगातार कम होती चली गई है। देश में औसत जोत का आकार साल 1970-71 में जहां 2.3 हेक्टेयर था, वह साल 2015-16 में घटकर महज 1.08 हेक्टेयर रह गया। इसी तरह, खेती में छोटे और सीमांत किसानों की हिस्सेदारी साल 1980-81 के 70 प्रतिशत की तुलना में बढ़कर साल 2015-16 में 86 फीसदी हो गई। घटती जोत और बढ़ती किसान हिस्सेदारी के चलते किसानों की आय या तो बढ़ नहीं रही या फिर घट रही है। ऐसे में, एफपीओ किसानों के लिए वरदान बन कर सामने आए हैं।
एफपीओ के जरिये जहां खेती की उपज बढ़ रही है, वहीं किसान वैकल्पिक फसलों के सहारे अपनी आय को बढ़ा रहे हैं। एफपीओ छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसानों को खेती के दौरान प्रौद्योगिकी, गुणवत्ता युक्त बीज, खाद और कीटनाशकों की पहुंच सुनिश्चित करा रहे हैं। जहां जरूरत होती है, वहां के लिए जरूरी वित्तीय सहयोग भी एफपीओ किसानों को मुहैया करा रहे हैं। इसके जरिए, छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान सामूहिक रूप से संगठित हो रहे हैं। एफपीओ खेती की उपज के प्रबंधन, उसमें तकनीक को बढ़ावा देने में सहयोगी और प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं।
ओएनडीसी पर जुड़े 5000 एफपीओ
भारतीय कृषि क्षेत्र में एफपीओ किस तरह अहम भूमिका निभा रहे हैं, यह समझने के लिए इन्हंे मिलने वाली सहूलियतों की तरफ देखना होगा। एफपीओ को इनपुट जुटाने के लिए कार्यशील पूंजी, विपणन और अपने सदस्य किसानों को बेहतर सेवाएं मुहैया कराने के लिए अनुदान और ऋण दोनों तरह की आर्थिक सहायता दी जा रही है। एफपीओ को जरूरत पर धन मिल सके, इसके लिए वित्तीय संस्थानों से ऋण की मद में केंद्रीय योजना के तहत ऋण गारंटी निधि का प्रावधान किया गया है। साथ ही, देश भर के उपभोक्ताओं को ऑनलाइन उपज बेचने के लिए आठ हजार से अिधक पंजीकृत किसान उत्पादक संगठनों में से लगभग पांच हजार एफपीओ को ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स यानी ओएनडीसी पोर्टल पर पंजीकृत किया गया है।
एफपीओ के जरिये, वित्तीय सहायता से लेकर उन्हें वक्त पर तकनीकी सहयोग, जरूरी खाद और कीटनाशक मिल रहा है। इसके साथ ही, उन्हें अपनी उपज को खरीदारों तक सीधे पहुंचाने की भी ताकत दी है। इस ताकत के चलते किसानों की समृद्धि बढ़ रही है। एफपीओ का यह कारवां बढ़ता रहे, इसके लिए इनके दृष्टिकोण को टिकाऊ बनाने की जरूरत है, ताकि सब्सिडी पर केंद्रित न रहकर ये किसान समूह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ें और ग्रामीण तरक्की के वाहक बन सकें।
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