डीजल इंजन के आविष्कारक रुडोल्फ डीजल ने एक सदी पहले दिखाया था कि उनका इंजन केवल पेट्रोलियम पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि वनस्पति तेल से भी चल सकता है। उन्होंने वर्ष 1900 में पेरिस विश्व प्रदर्शनी में मूंगफली के तेल से इंजन चलाकर यह साबित कर दिखाया। उनका मानना था कि वनस्पति ईंधन भविष्य में कोयला एवं पेट्रोलियम जितने ही महत्वपूर्ण होंगे, जो किसानों को ऊर्जा उत्पादक बनाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकते हैं।
आज जब पेट्रोलियम महंगा और सीमित हो रहा है, तो डीजल का विचार किसानों को ऊर्जा उत्पादक बनाने की दिशा दिखा रहा है, जो बायोडीजल, ईथेनॉल, सीएनजी, सीबीजी और बायोगैस के रूप में हमारे सामने है। बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और सीमित जीवाश्म ईंधन संसाधनों के बीच यह सोच अधिक प्रासंगिक है, खासकर भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां किसान इस परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं।
जैव ईंधन के तीन रूपों से गांवों को ऊर्जा
ऊर्जा की चर्चा बिजली की मापक इकाई गीगावॉट तक सीमित नहीं होनी चाहिए; बल्कि सौर, पवन, जल और बायोमास जैसे स्रोतों के साथ किलोलीटर, क्यूबिक मीटर व मीट्रिक टन जैसे मापकों को भी इसमें शामिल करना होगा। तभी रुडोल्फ डीजल की सोच के अनुरूप ऊर्जा आत्मनिर्भरता का लक्ष्य व्यवहारिक बन सकेगा।
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जैव ऊर्जा बायोमास जैसे कृषि अवशेष, पशु अपशिष्ट और जैविक कचरे से प्राप्त नवीकरणीय स्रोत है, जो पर्यावरण अनुकूल होने के साथ कार्बन संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। ठोस, द्रव और गैसीय रूपों में जैव ऊर्जा विकेंद्रीकृत स्तर उत्पादित करें, तो इससे करीब 40% ऊर्जा जरूरतें पूरी हो सकती हैं। लेकिन, जागरूकता का प्रसार, नीतिगत समर्थन और स्थानीय तकनीकों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।
ठोस जैव ऊर्जा : फसल अवशेष, लकड़ी और गोबर के उपले ठोस जैव ऊर्जा में शामिल हैं, जिन्हें आधुनिक ब्रिकेट्स और पेलेट्स के रूप में अधिक कुशलता से उपयोग किया जा रहा है। बिजली उत्पादन व औद्योगिक बॉयलरों में भी इनका बढ़ रहा है। उन्नत कुक स्टोव और गैसीफिकेशन तकनीक से इसका उपयोग अधिक प्रभावी हो गया है, जिससे एलपीजी की खपत काफी घटाई जा सकती है।
द्रव जैव ऊर्जा : बायोडीजल और बायो-ईथेनॉल द्रव जैव ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। बायोडीजल जट्रोफा, करंज, महुआ, सीमारुबा जैसी गैर-खाद्य तैलीय फसलों से, जबकि बायो-ईथेनॉल गन्ना व मक्का के किण्वन से बनता है। ये ईंधन वाहनों में पेट्रोल-डीजल का विकल्प बनकर 'खाड़ी के तेल' (जीवाश्म ईंधन) पर निर्भरता घटा सकते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं। किसान इससे अपने ट्रैक्टर और सिंचाई पंप चला सकते हैं और खेती की लागत घटा सकते हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने करीब ढाई दशक पहले जट्रोफा आधारित जैव ईंधन को किसान-केंद्रित कार्यक्रम के रूप में आगे बढ़ाने की पहल की थी। अब डॉ. कलाम की उस सोच को विस्तार देने का सही समय है।
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गैसीय जैव ऊर्जा : हवा की अनुपस्थिति में मवेशियों के गोबर और कृषि अपशिष्ट के अपघटन से बनने वाली बायोगैस और बायो-सीएनजी गैसीय जैव ऊर्जा का प्रमुख रूप हंै। ये ऊर्जा स्रोत गांवों के लिए स्वच्छ और सुलभ ऊर्जा का मजबूत आधार बन सकते हैं। ये खाना पकाने से लेकर बिजली उत्पादन तक हर जगह काम आते हैं और जैविक खाद भी देते हैं। ठोस, द्रव और गैसीय जैव ऊर्जा के सभी रूप ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही, ये सभी रूप कचरा प्रबंधन, रोजगार सृजन और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
गोशाला या सामुदायिक संयंत्रों में गाय के गोबर, खाद्य अपशिष्ट, हरी घास और पेड़-पत्तियों जैसे गीले कचरे से बायोगैस बनाई जा सकती है, जिसमें 62-65% मीथेन होती है। इसका उपयोग खाना पकाने, बिजली बनाने और रोशनी के लिए कर सकते हैं। यह संयंत्र जमीन के अंदर बनता है, जिससे 95% जमीन खाली रहती है। मात्र 1.09 लाख रुपये से शुरू होकर यह संयंत्र छोटे-बड़े आकार में बन सकता है। सामान्य आकार का संयंत्र 5 गायों के गोबर से 7 लोगों का खाना पकाने के लिए ईंधन दे सकता है। करीब 8 से 12 साल में इसकी लागत वसूल हो जाती है।
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वनस्पति आधारित जैव ऊर्जा बनेगी विकल्प
रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान ने यह सिद्ध कर दिया है कि जिसके पास ऊर्जा है, उसके पास असली ताकत है। भारत दुनिया का तीसरा बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और लगभग 85% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है। इससे विदेशी मुद्रा पर बोझ पड़ता है और हर अंतरराष्ट्रीय उठापटक का असर सीधे हमारी जेब पर आता है। जनसंख्या के दबाव, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के चलते ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। जीवाश्म ईंधनों से बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन की समस्या इस चुनौती को गहरा बनाती है। ऐसे में, जरूरत है एक ऐसे विकल्प की, जो हमारी अपनी मिट्टी से पैदा हो। वनस्पति आधारित जैव ऊर्जा ठीक यही करती है।
फसल के कचरे से किसान करेंगे कमाई
फसल कटने के बाद खेतों में बची पराली को जलाना प्रदूषण की बड़ी समस्या बन चुका है। पराली का जैव ऊर्जा उत्पादन में उपयोग इस समस्या को अवसर में बदल सकता है। बायोमास की बिक्री, बायोगैस संयंत्रों का संचालन और ऊर्जा उत्पादक फसलों की खेती - ये सब किसानों के लिए अतिरिक्त आय के नए साधन बन सकते हैं। जट्रोफा और करंज जैसी वनस्पतियां बंजर भूमि पर उगाई जा सकती हैं, जिससे बंजर जमीन भी काम की बन जाती है, जो अभी खाली पड़ी है। इसके साथ ही, कार्बन क्रेडिट जैसी अंतरराष्ट्रीय योजनाओं से जोड़कर किसानों और ग्रामीण उद्यमियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जा सकता है।
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गांवों में ईथेनॉल और बायोगैस क्लस्टर
जैव ऊर्जा उत्पादन का सबसे प्रभावी मॉडल इसका विकेंद्रीकृत स्वरूप है यानी ऊर्जा का उत्पादन गांवों में स्थानीय संसाधनों से, स्थानीय स्तर पर किया जाना चाहिए। इससे परिवहन लागत घटेगी है, गांव आत्मनिर्भर बनेंगे हैं और लंबी दूरी की आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता कम होती है। स्थानीय बायोगैस संयंत्र, बायोमास गैसीफायर और बायो-सीएनजी इकाइयां गांव को ऊर्जा केे उपभोक्ता से उत्पादक बना सकती हैं। वहीं, बायोगैस संयंत्र से निकली स्लरी खेतों की उर्वरता बढ़ाती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करती है। यूपी जैसे कृषि प्रधान राज्यों में गन्ना, धान व गेहूं के अवशेषों से क्लस्टर आधारित ईथेनॉल और बायोगैस उत्पादन तेजी से शुरू किया जा सकता है।
नीतिगत पहल, प्रशिक्षण, तकनीक और निवेश
जैव ऊर्जा की इस संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने बेहद जरूरी हैं। जैव ऊर्जा इकाइयों को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) का दर्जा देने से क्रियान्वयन और निगरानी दोनों आसान हो सकते हैं।
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कृषि अवसंरचना निधि जैसे कार्यक्रमों के जरिये
छोटी इकाइयों को वित्तीय सहायता दी जा सकती है। किसानों के साथ अनुबंध आधारित खेती से कच्चे माल की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। सब्सिडी, कर में छूट और सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी से इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जा सकता है। 2जी ईथेनॉल, बायो-रिफाइनरी और पायरोलिसिस जैसी आधुनिक तकनीकें अपनाने से उत्पादन दक्षता बढ़ेगी। लेकिन, सबसे पहले गांव-गांव में प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाकर किसानों को इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनाना होगा।
भारत के खेतों से उठेगी जैव ऊर्जा की लहर
आज जब पूरी दुनिया महंगा होते जीवाश्म तेल और ऊर्जा संकट से जूझ रही है, तब भारत के गांवों के पास एक ऐसा समाधान मौजूद है, जिसे हम अब तक नजरअंदाज करते आए हैं। खेतों का पुआल, गोबर, जैविक कचरा और झाड़ियों का तेल - ये सब केवल अपशिष्ट नहीं, बल्कि ऊर्जा के बड़े स्रोत हैं।
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'खाड़ी नहीं, झाड़ी का तेल' की अवधारणा इसी सोच को आगे बढ़ाती है, जहां किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जादाता भी बन सकते हैं। इस तरह देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि 'खाड़ी नहीं, झाड़ी का तेल' केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक दिशा है - स्वदेशी वनस्पति संसाधनों से ऊर्जा पैदा करने की दिशा। जब किसान अपने खेत की झाड़ी और फसल अवशेषों से ही ईंधन तैयार करेगा, तो उसकी लागत घटेगी, आय बढ़ेगी और देश का आयात बिल कम होगा।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता का रास्ता आयातित ईंधन से नहीं, बल्कि अपने खेतों और संसाधनों से होकर गुजरता है। सरकार, उद्योग व किसान मिलकर इसे प्राथमिकता दें तो जैव ऊर्जा देश की ऊर्जा सुरक्षा का मजबूत स्तंभ बन सकती है और भारत सतत विकास की राह पर आगे बढ़ सकता है। एफपीओ नेटवर्क की सहायता से ऐसे विकेंद्रीकृत प्रयास ग्रामीण ऊर्जा आवश्यकताओं का करीब 40% हिस्सा जैव ऊर्जा संसाधनों से पूरा कर सकते हैं।
इसके साथ ही, कार्बन क्रेडिट और कार्बन अवशोषण जैसे अप्रत्यक्ष वित्तीय लाभ भी किसानों को मिल सकते हैं। यह पहल न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि प्रणाली को मजबूत करने में भी भूमिका निभाएगी।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मई 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)