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Water Crisis: भूजल खत्म हुआ तो कैसे बचेगी खेती? जानिए कम पानी में ज्यादा पैदावार का नया रास्ता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 11 Oct 2026 01:05 PM IST
सार

  • भारत में भूजल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल खेती में होता है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।

  • देश में प्रति व्यक्ति सालाना जल उपलब्धता 1951 के 5,177 घन मीटर से घटकर 1,500 घन मीटर से नीचे आने का दावा लेख में किया गया है।

  • कृषि में पानी की बर्बादी रोकने के लिए ड्रिप सिंचाई, नेट हाउस और जल-कुशल तकनीकों को अपनाना जरूरी है।

  • एरोपोनिक्स में पौधों की जड़ों पर पोषक तत्वों के घोल का छिड़काव किया जाता है। मूल लेख के अनुसार, इससे पारंपरिक खेती के मुकाबले 95% तक पानी बच सकता है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत दुनिया में भूजल का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाला देश है। यहां अमेरिका और चीन, दोनों के कुल भूजल इस्तेमाल से भी ज्यादा पानी निकाला जाता है। इसका बड़ा हिस्सा खेती में खर्च होता है। लंबे समय तक पानी की उपलब्धता को लेकर बनी रही धारणा के कारण खेती के तौर-तरीकों में बदलाव की जरूरत को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन अब भूजल का घटता स्तर और पानी की कमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं।

बिजनेस लाइन में पब्लिश Growize Farms के सह-संस्थापक अरविंद नारायणन के लेख के मुताबिक, भारत में प्रति व्यक्ति सालाना जल उपलब्धता 1951 में 5,177 घन मीटर थी, जो अब घटकर 1,500 घन मीटर से नीचे आ गई है। इसे जल-संकट की स्थिति माना जाता है। अनुमान है कि 2050 तक यह घटकर 1,191 घन मीटर रह सकती है। देश में उपलब्ध पानी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि में इस्तेमाल होता है। इसके बावजूद कई जगह खेतों में पानी भरकर सिंचाई करने की परंपरागत पद्धति अपनाई जाती है, जिसमें पानी का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो सकता है।

पानी की कमी से फसलों पर बढ़ता दबाव
पानी की कमी का असर खेती और किसानों की आजीविका पर दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादक इलाकों में फसलों को नुकसान, पंजाब में भूजल स्तर गिरने से खेती पर बढ़ता दबाव और विदर्भ में खरीफ फसलों की पैदावार से जुड़ी चुनौतियां इस संकट की गंभीरता को दिखाती हैं। पानी की कमी के कारण किसानों को फसल चयन, सिंचाई और खेती की लागत से जुड़े फैसलों पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है।

जल संकट से निपटने के लिए नहरों में सुधार, सिंचाई पर बेहतर प्रबंधन और भूजल के इस्तेमाल को नियंत्रित करने जैसे सरकारी उपाय जरूरी हैं। हालांकि, लेख में कहा गया है कि केवल नीतिगत बदलावों से इस चुनौती का समाधान नहीं होगा। खेत स्तर पर भी पानी बचाने वाली तकनीकों और खेती के बेहतर तरीकों को अपनाना जरूरी है।

मिट्टी के बिना खेती में पानी बचाने की संभावना
परंपरागत खेती में सिंचाई का काफी पानी वाष्पीकरण, खेत से बहने या जमीन में गहराई तक रिसने के कारण फसल की जरूरत पूरी करने में इस्तेमाल नहीं हो पाता। खरपतवार भी पानी और पोषक तत्वों के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में ड्रिप सिंचाई, नेट हाउस और नियंत्रित वातावरण में खेती जैसी तकनीकें पानी के अधिक कुशल इस्तेमाल में मदद कर सकती हैं।

इसी दिशा में एरोपोनिक्स यानी वायवीय खेती को एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इस तकनीक में पौधों को मिट्टी में उगाने के बजाय उनकी जड़ों को हवा में रखा जाता है और उन पर पानी तथा पोषक तत्वों का बारीक छिड़काव किया जाता है।

लेख के अनुसार, पारंपरिक खेती की तुलना में एरोपोनिक्स से पानी की खपत 95 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। इसमें कम जगह में अधिक उत्पादन की संभावना भी बताई गई है। हालांकि, वास्तविक बचत और उत्पादन फसल, तकनीक, ऊर्जा की उपलब्धता तथा प्रबंधन पर निर्भर करते हैं। इसे बड़े स्तर पर अपनाने से पहले इसकी लागत और किसानों के लिए व्यावहारिकता का आकलन जरूरी है।

सेंसर और ऑटोमेशन से खेती में सुधार
खेती में तकनीक का इस्तेमाल केवल ड्रोन और उपग्रहों तक सीमित नहीं है। सिंचाई, पोषक तत्वों की मात्रा, तापमान और नमी को नियंत्रित करने वाली प्रणालियां भी उत्पादन को अधिक कुशल बना सकती हैं। ऑटोमेशन और आंकड़ों के आधार पर खेती करने से पानी और पोषक तत्वों की जरूरत का बेहतर आकलन किया जा सकता है। इससे संसाधनों की बर्बादी कम करने और फसल उत्पादन को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, छोटे किसानों के लिए इन तकनीकों की शुरुआती लागत, बिजली की उपलब्धता, तकनीकी जानकारी और रखरखाव बड़ी चुनौतियां हैं। इसलिए नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और स्थानीय स्तर पर तकनीकी सहयोग भी जरूरी होगा।

खेती में बदलाव की जरूरत
भारत में पानी की उपलब्धता घटने के साथ खेती को अधिक जल-कुशल बनाने की जरूरत बढ़ रही है। ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संचयन, खेतों में नमी बनाए रखने के उपाय और स्थानीय जलवायु के अनुकूल फसलें अपनाने से इस दिशा में मदद मिल सकती है। वहीं, एरोपोनिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकता है, जहां उनकी लागत और संसाधनों की जरूरत व्यावहारिक हो। खेती का भविष्य केवल अधिक पानी उपलब्ध कराने पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल कितनी समझदारी से किया जाता है।
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