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Khadi And Village Industries Weaving Inclusive Sustainable Livelihoods For A New India
डेनिम के दौर में गांव कात रहे सूत : 5 लाख ग्रामीण परिवारों की रोजी का सहारा बनी खादी, 80 फीसदी कारीगर महिलाएं
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Fri, 09 Oct 2026 07:38 PM IST
सार
हाथ की कताई से गांवों में रोजगार, महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता और पर्यावरण को राहत देने वाली खादी की विरासत दिखाती है कि बेहतर कल की बुनावट परंपरा के धागे से भी हो सकती है। कभी स्वदेशी आंदोलन की पहचान रही खादी अब डेनिम, डिजाइनर साड़ियों और वेलनेस वियर के जरिये नए दौर के फैशन तक पहुंच चुकी है। जानिए, विस्तार से...
हाथ से काती और बुनी जाने वाली खादी प्राकृतिक रेशों और स्थानीय उत्पादन प्रणालियों पर टिकी रही है।
- फोटो : Ai
खादी और ग्राम उद्योग (केवीआई) ग्रामीण आजीविका को सहारा देने, गांवों में रोजगार पैदा करने और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी खादी पारंपरिक शिल्प-कौशल को टिकाऊ उत्पादन पद्धतियों से जोड़ती है और ग्रामीण इलाकों में आजीविका के अवसर देती है।
हाथ की कताई, खादी की पहचान
हाथ से काती और बुनी जाने वाली खादी प्राकृतिक रेशों और स्थानीय उत्पादन प्रणालियों पर टिकी रही है। श्रम-प्रधान और विकेंद्रीकृत होने के कारण यह कई कौशल स्तरों पर काम देती है। यह क्षेत्र गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास के उद्देश्यों को भी बल देता रहा है। हाथ की कताई ही खादी और हथकरघा के बीच का मुख्य अंतर है।
कारीगर की कमाई को सहारा
खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) ने कौशल विकास, क्षमता निर्माण और कौशल उन्नयन के जरिये खादी संस्थानों को सहयोग दिया है। अप्रैल 2025 से कताई-बुनाई की मजदूरी में वृद्धि, बेहतर उपकरण, अवसंरचना के लिए समर्थन और मजबूत विपणन उपायों ने कारीगरों की आय सुधारने और परंपरागत आजीविका को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने में योगदान दिया है।
योजनाओं की छतरी
सरकार खादी विकास योजना, ग्रामोद्योग विकास योजना और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) जैसी योजनाओं से रोज़गार को बढ़ावा दे रही है। वित्तीय सहायता, कार्यशील पूंजी, गुणवत्तापूर्ण कच्चा माल, प्रशिक्षण, टूलकिट, मजदूरी सहायता, विपणन, डिजिटल भुगतान और सामाजिक सुरक्षा उपायों से मदद दी जाती है। अहमदाबाद के ईडीआईआई के मूल्यांकन अध्ययन के अनुसार, इन योजनाओं से जुड़े 75 प्रतिशत से अधिक कारीगरों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
नई पीढ़ी की पसंद
खादी आधुनिक फैशन और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन गई है। खादी डेनिम, डिज़ाइनर साड़ियां, ब्राइडल वियर, आधुनिक शर्ट और ट्राउज़र जैसी नई श्रेणियों ने इसे युवाओं के बीच और लोकप्रिय बनाया है। दिल्ली स्थित एनआईएफटी के खादी उत्कृष्टता केंद्र ने 2,129 खादी डिज़ाइन संग्रह विकसित किए हैं। 710 नए उत्पादों वाली 'नवयुग खादी' और वेलनेस व योगा वियर संग्रह 'स्वधा' के लॉन्च ने इसकी आधुनिक छवि को और पुख्ता किया है।
महिलाओं के हाथ में खादी की डोर
खादी महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। लगभग पांच लाख खादी कारीगरों में करीब 80 प्रतिशत महिलाएं हैं। अगरबत्ती, हस्तनिर्मित कागज, शहद उद्योग और सेवा उद्योगों में उनकी भागीदारी खास तौर पर महत्वपूर्ण रही है, जिससे उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता और स्थायी आजीविका के अधिक अवसर मिले हैं।
सरहद पार खादी की पहचान
हस्तनिर्मित, प्रमाणित, प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की वैश्विक मांग के साथ खादी के निर्यात की अपार संभावनाएं हैं। खादी और ग्राम उद्योग ने न्यूयॉर्क स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के व्यापार पोर्टल पर निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसी) के रूप में पंजीकरण कराया है।
ब्रांडिंग को मजबूती देने के लिए पोंडुरु खादी को जीआई टैग मिला है। आगरा में पहले ब्रिक्स एमएसएमई फोरम में पोंडुरु खादी, भारत कस्तूरी कपास, बंगाल मलमल और प्राकृतिक रंगों से रंगे सूती उत्पाद प्रदर्शित किए गए।
परंपरा में तकनीक की बुनावट
परंपरा के संरक्षण के साथ तकनीकी उन्नयन और गुणवत्ता संवर्धन के प्रयास जारी हैं। केवीआईसी के सेंट्रल स्लीवर प्लांट का आधुनिकीकरण हो रहा है। कर्नाटक के चित्रदुर्ग और केरल के कुत्तूर के संयंत्र आधुनिक होकर परिचालन में आ चुके हैं।
चित्रदुर्ग संयंत्र अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरत सौर ऊर्जा से पूरी करता है और पवन ऊर्जा पर भी विचार हो रहा है। ग्राम उद्योग समूहों को मजबूत करने के लिए खादी संस्थानों के तकनीकी उन्नयन और प्रौद्योगिकी-आधारित साझा सुविधा केंद्रों का प्रस्ताव है।
हरित भविष्य की बुनाई
प्राकृतिक रेशों और रंगों पर आधारित, ऊर्जा और जल की कम खपत वाली खादी जलवायु परिवर्तन और जिम्मेदार उपभोग के दौर में और प्रासंगिक हो जाती है।
केवीआईसी, आईसीएआर-सीआईआरसीओटी के सहयोग से प्राकृतिक रूप से रंगीन कपास की किस्में विकसित करने की पहल कर रहा है, ताकि रंगाई से जुड़े जल-उपयोग, रासायनिक प्रदूषण और ऊर्जा खपत में कमी आए।
हाथ से की जाने वाली कताई से पुनर्चक्रण और अपचक्रण की भी अपार संभावनाएं हैं, जिनमें मशीनी कताई के अनुपयुक्त रेशों का रूपांतरण शामिल है। इससे अतिरिक्त रोज़गार के साथ सतत विकास लक्ष्य 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) और लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) में योगदान की क्षमता है।
स्वदेशी के प्रतीक से जीवनशैली तक
स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक से लेकर समकालीन फैशन के विकल्प तक का खादी का सफर बदलती उपभोक्ता पसंद के अनुरूप ढलने और अपनी पारंपरिक पहचान बचाए रखने की क्षमता दिखाता है।
यह विरासत और नवाचार, रोज़गार और उद्यमिता, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समावेश, तथा आर्थिक गतिविधि और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ जोड़ती है। खादी का यह विकास बताता है कि टिकाऊ समाधान केवल आधुनिक तकनीक से नहीं, पीढ़ियों से संजोई परंपराओं से भी मिल सकते हैं।
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