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जतहर के जंगल की बेटी: जड़ी-बूटियों की विरासत को सहेज रहीं जमुई की पुष्पा खैरवार, फ्रांस तक पहुंची दास्तान

गांव जंक्शन डेस्क, पटना Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 08 Oct 2026 03:28 PM IST
सार

बिहार के जमुई जिले के जतहर गांव की पुष्पा खैरवार कोई पेशेवर पर्यावरणविद नहीं, पर पारंपरिक ज्ञान और लगन के बल पर वे दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों की पहरेदार बन गई हैं। उनके प्रयासों की सुगंध अब फ्रांस तक पहुंची है, जहां की शोधकर्ता रेमानी उनसे मिलने गांव आईं।
 

जमुई (बिहार) के जतहर गांव की पुष्पा खैरवार दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां सहेज रही हैं।
जमुई (बिहार) के जतहर गांव की पुष्पा खैरवार दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां सहेज रही हैं। - फोटो : Ai
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विस्तार
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बिहार के जमुई जिले की हरणी पंचायत के जतहर गांव की साधारण ग्रामीण महिला पुष्पा खैरवार के पारंपरिक जड़ी-बूटी संरक्षण कार्यों की गूंज अब विदेशों तक पहुंच गई है। फ्रांस से आईं शोधकर्ता रेमानी ने पुनर्जीवी बिहार संस्था की टीम के साथ गांव का दौरा किया और 'जंगल की बेटी' के नाम से चर्चित पुष्पा से मुलाकात की। फ्रांसीसी टीम ने प्राकृतिक वनस्पतियों, जैव विविधता और विलुप्त हो रही औषधीय जड़ी-बूटियों को बचाने के उनके अनूठे प्रयासों की जानकारी ली।

परंपरा के ज्ञान की पड़ताल
पुनर्जीवी बिहार संस्था लंबे समय से इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों, पारंपरिक वनस्पतियों और जैव विविधता के संरक्षण पर व्यापक स्तर पर काम कर रही है। इसी अभियान के सिलसिले में संस्था के प्रतिनिधियों के साथ फ्रांस की निवासी रेमानी जतहर पहुंचीं। पुष्पा खैरवार कोई पेशेवर पर्यावरणविद नहीं हैं।

अपने पारंपरिक ज्ञान और लगन के बल पर पुष्पा पर्यावरण बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं। प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन और बदलते मौसम के बीच उनका प्रयास केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है। वे जंगलों में पाई जाने वाली दुर्लभ और विलुप्त हो रही औषधीय वनस्पतियों की पहचान कर उन्हें सहेज रही हैं। उनके समर्पण से रेमानी बेहद प्रभावित हुईं।

वनस्पतियों का अनूठा बैंक
जतहर और आसपास के वन क्षेत्रों में कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां और औषधीय पेड़-पौधे हैं, जो आधुनिकता और अंधाधुंध कटाई के कारण विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। पुष्पा वर्षों से इन वनस्पतियों की पहचान कर उन्हें सहेजने और उनका अनूठा बैंक तैयार करने में जुटी हैं। मुलाकात में रेमानी ने उनके अनुभवों को विस्तार से जाना और स्थानीय स्तर पर बचाई जा रही वनस्पतियों के लाभ समझे।

आने वाली पीढ़ियों के नाम
पुष्पा का उद्देश्य केवल पेड़-पौधे बचाना नहीं है। वे इनके पारंपरिक उपयोग, गुणों और स्वास्थ्य लाभों की जानकारी भी अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहती हैं, ताकि गांव की युवा पीढ़ी अपने औषधीय खजाने का महत्व समझ सके।

मुलाकात के दौरान जल-जंगल-जमीन के संरक्षण के साथ जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। बातचीत में सामने आया कि बदलते मौसम का सबसे बुरा असर खेती-किसानी और छोटे किसानों पर पड़ रहा है। कभी सूखा, तो कभी असमय बारिश ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। धरती का तापमान बढ़ने और प्राकृतिक संसाधन घटने के इस दौर में पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों का संरक्षण सबसे मजबूत ढाल बन सकता है।

संरक्षण में ग्रामीणों की साझेदारी
विचारकों ने जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। जब तक इसमें स्थानीय ग्रामीणों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, कोई भी अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सकता। फ्रांसीसी टीम ने पुष्पा के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस अनूठे संरक्षण मॉडल को अब बड़े पैमाने पर अन्य गांवों के साथ साझा किया जाएगा, ताकि दूसरे क्षेत्रों के लोग भी प्रेरणा ले सकें।
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