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Weak Monsoon Signals Preparedness Will Ensure Balance Stabilize Farming And Boost Farmers Ajay Kedia
कमजोर मानसून की आहट : खेत पहले रोएंगे, फिर रोएगा बाजार, सही तैयारी से सधेगी खेती और बढ़ेंगे किसान
अजय केडिया, बाजार विशेषज्ञ
Published by: Umashankar Mishra
Updated Mon, 18 May 2026 08:56 AM IST
सार
सही रणनीति, समय पर हस्तक्षेप और संसाधनों के सही प्रबंधन से फसल उत्पादन और बाजार पर कमजोर मानसून के असर को काफी हद तक कम कर सकते हैं। समय रहते तैयारी और सतत निगरानी जरूरी है।
भारत की करीब 45 से 50 फीसदी खेती आज भी बारिश के भरोसे है।
- फोटो : AI
हर साल जून की पहली बारिश भारत के लिए नई उम्मीद लेकर आती है। इस बार भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने वर्ष 2026 के मानसून के दीर्घकालिक औसत का 92 फीसदी और निजी एजेंसी स्काईमेट ने 94 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। इसका अर्थ है कि इस बार बारिश सामान्य से कम रहेगी। इसके पीछे अल नीनो की स्थिति को जिम्मेदार माना जा रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से भारत में वर्षा को कमजोर करती है। लेकिन, सवाल यह नहीं कि मानसून कमजोर होगा, बल्कि यह है कि हम इसके लिए कितने तैयार हैं।
मानसून तय करता है थाली की कीमत
भारत की करीब 45 से 50 फीसदी खेती आज भी बारिश के भरोसे है, इसलिए मानसून के लड़खड़ाते ही सबसे पहला धक्का किसान को लगता है। खरीफ सीजन में धान, मक्का, कपास, सोयाबीन और दालों की बुआई जून-जुलाई में होती है, जो पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। बारिश समय पर न आए या असमान हो, तो बुआई क्षेत्र सिकुड़ता है और उत्पादन गिरता है। ऐसे में, बहुत से किसान कम पानी या कम अवधि की फसलों की ओर रुख करते हैं। इससे जोखिम तो घट जाता है, लेकिन कुल उत्पादन और किसान की आय कम हो जाती है। सबसे बड़ी मार छोटे व सीमांत किसानों पर पड़ती है।
बारिश न होने पर डीजल पंप चलाने की मजबूरी लागत बढ़ाती है और मुनाफा घटाती है। ये वही किसान हैं, जिनके पास न बड़े जलाशय हैं, न गहरे कुएं, जो को आसमान को ताकते रहते हैं। खेत में कम उपज की तरंगें पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक फैल जाती हैं। जब किसानों की जेब खाली होती है, तो ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन, उर्वरक, बीज और रोजमर्रा के उत्पादों की मांग एक साथ गिरती है। भारत में ग्रामीण क्षेत्र उपभोग का सबसे बड़ा आधार है, जहां मांग में गिरावट की लहर देर-सबेर शहरी बाजारों और कॉरपोरेट बैलेंस शीट तक पहुंचती है।
मानसून सीधे आपकी थाली की कीमत भी तय करता है। यदि दालों, तिलहन और मोटे अनाज का उत्पादन घटता है, तो उनके दाम बढ़ते हैं। खाद्य पदार्थों का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में बड़ा हिस्सा होता है, इसलिए खाद्य महंगाई बढ़ने से कुल महंगाई दर पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में, भारतीय रिजर्व बैंक के लिए महंगाई को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती बन जाती है। सरकार को भी कठिन विकल्पों के बीच चुनाव करना पड़ता है। कीमतें काबू में रखने के लिए निर्यात प्रतिबंध या सीमाएं तय करनी पड़ती हैं। ऐसे कदमों से घरेलू बाजार को राहत तो मिलती है, लेकिन वैश्विक बाजार में भारत की साख व हिस्सेदारी दांव पर लग जाती है।
आयात की जरूरत और रुपये पर दबाव
कमजोर मानसून के कारण अगर घरेलू उत्पादन में गिरावट होती है, तो खाद्य तेल और दालों का आयात बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। भारत पहले से ही खाद्य तेलों के दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में से एक है। आयात बढ़ने से चालू खाता और घाटा चौड़ा होगा और इसका सीधा असर रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ेगा। यह एक ऐसी शृंखला है, जो खेत से शुरू होकर विदेशी मुद्रा बाजार तक जाती है।
कीमतों में हो सकता है उतार-चढ़ाव
मानसून के अनुमान आते ही कमोडिटी बाजारों में हलचल मच जाती है। व्यापारी और निवेशक मौसम की हर नई जानकारी के आधार पर दांव लगाते हैं। वायदा बाजार में सट्टा गतिविधियां बढ़ती हैं और कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। यह अस्थिरता न केवल बाजार को प्रभावित करती है, बल्कि उन किसानों को भी नुकसान पहुंचाती है जो सही दाम के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
वएक जरूरी बात ये है कि कम मानसून का मतलब हमेशा तबाही नहीं होता। कई बार क्षेत्रीय स्तर पर अच्छी बारिश हो जाती है, जिससे कुल प्रभाव कम हो जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मानसून के दूसरे हिस्से में पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल विकसित हो सकता है, जो बारिश बढ़ाने में मदद करता है और अल नीनो के असर को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। देश में सिंचाई सुविधाओं में हुए सुधार, जलाशयों का बेहतर स्तर और ड्रिप तथा स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का बढ़ता उपयोग भी किसानों को राहत दे सकता है।
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