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New Way Reduce Farming Costs No Electric Tractors Reduce Costs By Running These 3 Machines On Electricity
खेती में खर्च घटाने का नया रास्ता: इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर नहीं... इन 3 मशीनों को बिजली से चलाकर घटा सकते हैं लागत
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sat, 10 Oct 2026 11:49 AM IST
सार
डीजल पर निर्भरता में कमी: PPAC के अध्ययन के अनुसार, कृषि क्षेत्र की खुदरा डीजल बिक्री में हिस्सेदारी 2011-12 के करीब 14% से घटकर 2020-21 में लगभग 4.7% रह गई।
सौर पंपों का बढ़ता इस्तेमाल: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 के अंत तक करीब 9.75 लाख स्वतंत्र सौर पंप लगाए गए थे और 12 लाख से अधिक ग्रिड से जुड़े पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा गया था।
पावर टिलर से जुताई: इलेक्ट्रिक मोटर से चलने वाले टिलर में ईंधन और इंजन के रखरखाव की जरूरत कम हो सकती है।
वीडर से खरपतवार हटाना आसान: बैटरी से चलने वाली मशीनें सब्जियों, गन्ने और बागों में निराई के काम में मदद कर सकती हैं।
भारत में खेती को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ने की चर्चा होती है, तो सबसे ज्यादा ध्यान इलेक्ट्रिक ट्रैक्टरों पर जाता है। इसकी वजह भी है, क्योंकि ट्रैक्टर खेती में मशीनीकरण की रीढ़ है और कंपनियां इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर विकसित करने में निवेश कर रही हैं। लेकिन खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनें सिर्फ ट्रैक्टर तक सीमित नहीं हैं। किसानों की लागत घटाने, आमदनी बढ़ाने और ईंधन की बर्बादी रोकने के लिए पावर टिलर, वीडर और स्प्रेयर जैसी छोटी मशीनों को भी बिजली से चलाने पर जोर देना होगा।
खेती में डीजल का इस्तेमाल घटा
बिजनेस लाइन में पब्लिश नक्षत्रा लैब्स के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अभिलाष मौर्य की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि क्षेत्र में डीजल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के 2020-21 के अध्ययन के अनुसार, देश में खुदरा डीजल बिक्री में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 4.7 प्रतिशत थी। वर्ष 2011-12 के अध्ययन में यह लगभग 14 प्रतिशत थी।
2020-21 में कृषि क्षेत्र में डीजल की कुल खपत में ट्रैक्टरों की हिस्सेदारी 2.6 प्रतिशत, दूसरे कृषि उपकरणों की 1.5 प्रतिशत और डीजल पंप सेट की 0.6 प्रतिशत थी। गांवों में बिजली आपूर्ति बेहतर होने के साथ प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) जैसी योजनाओं ने भी इस बदलाव में भूमिका निभाई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 के अंत तक करीब 9.75 लाख स्वतंत्र सौर पंप लगाए जा चुके थे, जबकि 12 लाख से अधिक ग्रिड से जुड़े पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ा गया था। 2026 के मध्य तक स्वतंत्र सौर पंपों की संख्या 11 लाख से ज्यादा हो गई थी। इससे सिंचाई में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ा है। अब अगला कदम खेती के दूसरे कामों में डीजल की खपत कम करना है।
इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर के सामने बड़ी चुनौतियां
इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर खेती में लंबे समय में अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इन्हें अपनाने के लिए कुछ तकनीकी चुनौतियों का समाधान जरूरी है। 45 हॉर्सपावर (HP) का ट्रैक्टर खेत में कई घंटे तक भारी काम करता है। बुवाई और कटाई के सीमित समय में इसे लगातार चलाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में इसकी बैटरी बड़ी होनी चाहिए और चार्जिंग की व्यवस्था भी खेती के व्यस्त समय के अनुकूल होनी चाहिए।
दूसरी ओर, भारत में ज्यादातर किसानों के पास छोटी जोत है। कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, देश में करीब 86 प्रतिशत कृषि जोत दो हेक्टेयर से कम आकार की थीं। ऐसे खेतों में क्यारियां तैयार करने, कतारों के बीच खरपतवार हटाने और फसलों पर छिड़काव जैसे कई काम छोटी मशीनों या हाथों से किए जाते हैं। इसलिए इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर के साथ छोटी कृषि मशीनों को बिजली से चलाने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा सकता है।
पावर टिलर और वीडर में बिजली का इस्तेमाल फायदेमंद
पावर टिलर : इसका इस्तेमाल मिट्टी तैयार करने और जुताई जैसे कामों में होता है। इन मशीनों को कुछ घंटों तक चलाया जाता है और छोटे खेतों में इनका उपयोग किया जाता है। इलेक्ट्रिक मोटर शुरुआत से ही अच्छा टॉर्क दे सकती है, जिससे मशीन को मिट्टी पर काम करने में मदद मिलती है। इलेक्ट्रिक पावर टिलर में इंजन ऑयल, फिल्टर और पेट्रोल-डीजल भरवाने की जरूरत नहीं होती। इनका शोर भी कम होता है। खेत में पहले से सोलर पैनल लगा हो, तो उसकी मदद से बैटरी चार्ज करने का विकल्प भी मिल सकता है।
वीडर : खेत में खरपतवार हटाने का काम काफी मेहनत वाला है। सब्जियों, गन्ने और बागों में पौधों की कतारों के बीच घास हटाने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है। व्यस्त कृषि मौसम में मजदूर मिलना भी मुश्किल हो सकता है। बैटरी से चलने वाला छोटा वीडर एक व्यक्ति को कतारों के बीच खरपतवार हटाने में मदद कर सकता है। इससे काम करना आसान हो सकता है और मजदूरों पर निर्भरता कुछ हद तक घट सकती है।
इलेक्ट्रिक कृषि मशीनों से किसानों को क्या फायदे?
1. चलाने का खर्च कम हो सकता है
बिजली से चलने वाली मशीनों में पेट्रोल या डीजल खरीदने की जरूरत नहीं होती। यदि किसान के पास सौर ऊर्जा की सुविधा है, तो चार्जिंग का खर्च और कम हो सकता है। इससे मशीन चलाने की लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
2. रखरखाव आसान
इलेक्ट्रिक मोटर में छोटे ईंधन इंजन के मुकाबले चलने वाले पुर्जे कम होते हैं। इसलिए इंजन ऑयल, एयर फिल्टर, स्पार्क प्लग और कार्बोरेटर जैसे हिस्सों की नियमित देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती। इससे मरम्मत और मशीन बंद रहने का समय घट सकता है।
3. चलाना और संभालना आसान
इलेक्ट्रिक मशीनों को आमतौर पर रस्सी खींचकर स्टार्ट नहीं करना पड़ता। इनमें कंपन और शोर भी कम हो सकता है। इससे बुजुर्ग किसानों और खेती के काम में लगी महिलाओं के लिए मशीन चलाना आसान हो सकता है।
4. एक बैटरी से कई मशीनें चलाने का विकल्प
यदि अलग-अलग कृषि उपकरणों में एक जैसी बदली जा सकने वाली बैटरी का इस्तेमाल हो, तो किसान उसी बैटरी को पावर टिलर, वीडर और स्प्रेयर में जरूरत के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे हर मशीन के लिए अलग बैटरी खरीदने का खर्च कम हो सकता है।
छोटी मशीनों से शुरू हो सकता है बदलाव
खेती में स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बदलाव सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पावर टिलर, वीडर और स्प्रेयर जैसी छोटी मशीनों का विद्युतीकरण भी किसानों के ईंधन खर्च और रखरखाव की लागत घटाने में मदद कर सकता है।
हालांकि, इन मशीनों को अपनाने से पहले उनकी कीमत, बैटरी की क्षमता, चार्जिंग की सुविधा, खेत की परिस्थितियों और स्थानीय मरम्मत सेवाओं पर भी ध्यान देना होगा। सही तकनीक और किफायती विकल्प उपलब्ध होने पर इलेक्ट्रिक कृषि उपकरण छोटे किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।
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