उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के जसपुर गांव में रहने वाले किसान सचिन कुमार बताते हैं, सिंचाई की सबसे अधिक जरूरत वाले समय में अपनी फसलों को पानी देने के लिए अक्तूबर, 2025 तक हर दिन करीब ₹2,000 डीजल पर खर्च करने पड़ते थे। सिंचाई के बेतहाशा खर्च से न केवल खेती की लागत बढ़ जाती थी, बल्कि सिंचाई के फैसले भी नकदी की उपलब्धता पर निर्भर होते थे।
सचिन बताते हैं, सरकारी सब्सिडी 75-90% तक मिलती है, जिसकी मदद से सोलर पंप लगाने के बाद सिंचाई का खर्च लगभग खत्म हो गया है। आगे वह बताते हैं, अब खर्च सिर्फ न्यूनतम रखरखाव तक सिमट गया है। पहले रात को बिजली आपूर्ति बहाल होने पर खेतों में जाकर सिंचाई करनी पड़ती थी, मगर अब यह काम दिन में ही कर सकते हैं। सोलर पंप से पानी की आपूर्ति भी लगभग दोगुनी हुई है, जिससे कम समय में अधिक सिंचाई कर सकते हैं।
सचिन ने यह सोलर पंप सिस्टम स्थानीय डीलर के जरिये अपने खेत में लगाया था, जिसने सब्सिडी दिलाने में भी उनकी काफी मदद की। सचिन कुमार के इस अनुभव से प्रेरित होकर आसपास के दूसरे किसान भी अब सोलर पंप अपना रहे हैं; हाल के महीनों में उन्होंने तीन किसानों को सलाह दी थी, जिनमें से दो किसानों ने इसे लगा लिया है।
सिंचाई पर नियंत्रण, उत्पादन में सुधार
मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के पिपलोदा इस्माइल गांव के किसान मान सिंह परमार बताते हैं, वर्ष 2018 में उन्हें सोलर पंप के लिए करीब ₹72,000 खर्च करने पड़े थे, जबकि अब उसी तरह के पंप ₹40 हजार से 47 हजार में लग रहे हैं। यह गिरावट इसलिए संभव हुई क्योंकि सरकारी सब्सिडी और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। मान सिंह बताते हैं कि उनके इलाके में अब ज्यादा किसान सोलर पंप अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं।
स्थानीय डीलरों के जरिये ओसवाल पंप्स जैसे ब्रांड भी बाजार में दिखने लगे हैं। शाजापुर जिले के ही पोचनेर गांव के नीरज परमार ने अगस्त, 2025 में सोलर पंप लगाया। करीब ₹70,000 के निवेश में उन्हें ₹41,500 सब्सिडी के रूप में मिले। एक अन्य किसान नीरज बताते हैं, बिजली पर निर्भर रहने के बजाय अब जब जरूरत हो, तभी सिंचाई हो जाती है। इससे फसल उत्पादन में भी सुधार हुआ है।
बिजली पर निर्भरता खत्म, समय पर सिंचाई
सीहोर जिले के पीपल खेड़ा गांव के नरहर डांगी बिजली की अनियमित आपूर्ति से परेशान थे। पहले हर मोटर पर सालाना करीब ₹10,000 बिजली का खर्च आता था और सिंचाई रात के समय खेत में जाकर करनी पड़ती थी। वर्ष 2025 में उन्होंने सरकारी सब्सिडी की मदद से सोलर पंप लगवाया। अब सिंचाई के लिए बिजली ग्रिड पर उनकी निर्भरता खत्म हो गई है।
नरहर डांगी बताते हैं, अब सिंचाई का काम समय पर होता है। बिजली का इंतजार नहीं करना पड़ता। उन्होंने आसपास के 200 से ज्यादा किसानों को भी इस तकनीक को अपनाने में मदद की है।
छोटे किसानों के अधिक फायदेमंद तकनीक
राजस्थान के चुरू जिले के किसान महावीर प्रसाद भी पहले बिजली की अनियमितता से परेशान थे। नवंबर, 2025 में सरकारी सब्सिडी की मदद से सोलर पंप लगाने के बाद अब वे दिन में आसानी से सिंचाई कर रहे हैं। महावीर प्रसाद बताते हैं कि छोटे किसानों के लिए भी यह तकनीक अधिक व्यवहारिक विकल्प बनती जा रही है। वह बताते हैं, उनके इलाके में भी धीरे-धीरे सोलर पंप का चलन बढ़ रहा है।
खर्च से निवेश की ओर बढ़ते कदम
एमपी, राजस्थान और उत्तराखंड के किसानों के अनुभव बताते हैं कि सोलर सिंचाई दो बड़े बदलाव ला रही है। सबसे पहला बदलाव तो यही है कि इससे किसानों की शुरुआती लागत घट रही है। दूसरा लाभ यह है कि सोलर पंप के कारण सिंचाई के लिए अब बार-बार खर्च नहीं करना पड़ता, बस एक बार का निवेश ही काफी होता है।
चुनौतियां भी हैं, लेकिन असर बड़ा
बादल होने पर सौर पंप से पानी का प्रवाह कम होना और सब्सिडी पर निर्भरता - ये दो सीमाएं अभी भी बनी हुई हैं। लेकिन, बैटरी सपोर्ट और तकनीकी सुधार से ये समस्याएं धीरे-धीरे कम हो रही हैं। लेकिन, इससे जुड़ी एक बड़ी तस्वीर यह है कि सिंचाई की परिभाषा बदल रही है और बार-बार का खर्च अब एकमुश्त निवेश में बदल रहा है। सरकारी सब्सिडी से शुरुआती लागत घट जाती है।
किसानों का जो पैसा पहले डीजल-बिजली में जाता था, वह अब बीज, खाद और घरेलू जरूरतों पर खर्च हो रहा है। यही बदलाव करोड़ों किसानों की खेती और जिंदगी दोनों को नई दिशा दे रहा है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसान भी कुछ इसी तरह के अनुभव साझा कर रहे हैं। सोलर पंप ने उनके सिंचाई के खर्च को अब महज एक बार होने वाले निवेश में तब्दील कर दिया है।
(यह स्टोरी मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)
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