शर्तों में उलझी एमएसपी पर फसल खरीद: दलहन-तिलहन खरीद में बड़ा पेंच, नियमों के जाल ने बढ़ाई किसानों की मुश्किल
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 23 May 2026 01:21 PM IST
सार
धान-गेहूं के बाद सरकारी खरीद का फोकस अरहर, उड़द और मसूर की ओर बढ़ा है। इसके साथ ही, आयात निर्भरता कम करने के लिए मूंग, चना और तिलहन उत्पादकों को भी प्रोत्साहन की जरूरत है। लेकिन, इन फसलों की सरकारी खरीद एक दशक से नीतिगत पेंच में फंसी हुई है और किसान सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
मूंग, चना और तिलहन को भी फसल खरीद के दायरे में लाने की मांग की जा रही है।
- फोटो : गांव जंक्शन
केंद्र सरकार ने अरहर, उड़द और मसूर की 100 फीसदी खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर करने का एलान किया है। वर्ष 2024-25 में मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत इन दलहनी फसलों की पूरी उपज खरीदने की मंजूरी दी गई है और बजट 2025-26 में इसे 2028-29 तक जारी रखने की बात कही गई है। 7 अप्रैल को जयपुर में आयोजित क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन के दौरान कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इच्छुक किसानों से इन फसलों की पूरी खरीद की बात दोहराई है। लेकिन इस घोषणा में ‘इच्छुक’ शब्द ने किसान संगठनों और नीति विशेषज्ञों की भौंहें चढ़ा दी हैं।
किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, ‘यह शब्द सरकार को तिलहन और दलहनी फसलों की खरीद से पीछे हटने का एक रास्ता देता है।’ रामपाल जाट आगे बताते हैं कि गेहूं और धान की खरीद में 'इच्छुक' जैसी कोई शर्त कभी नहीं रही है। इन फसलों की उपज को किसान खरीद केंद्र पर लाते हैं और सरकार खरीदती है। लेकिन, दलहन में यह शर्त नीति की मंशा पर सवाल खड़े करती है।
दलहन और खाद्य तेल की आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं अभी भी निरंतर बनी हुई हैं। वर्ष 2022-23 में दलहनों की आयात निर्भरता 8 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई। खाद्य तेल में भारत की आयात निर्भरता अभी भी करीब 55 प्रतिशत है। किसान नेता रामपाल जाट देसी कहावत का हवाला देते हुए कहते हैं, यह स्थिति कुछ ऐसी ही कि 'घर का पूत कुंवारा डोले और पड़ोसी का फेरा'। आगे वह कहते हैं कि हम अपने किसानों को बेहतर दाम देने के बजाय आयात पर भारी खर्च कर रहे हैं।
फसल खरीद पर राइडर की ऐसे पड़ी नींव
रामपाल जाट बताते हैं, मूंग, चना और तिलहन अभी भी सरकारी खरीद के दायरे से बाहर बने हुए हैं। वह बताते हैं, यह मामला कोई नया नहीं है। दलहन-तिलहन की सरकारी खरीद पर पाबंदी का सिलसिला करीब एक दशक पुराना है, जो तीन सरकारों और तीन कृषि मंत्रियों के कार्यकाल से होकर गुजरने के बाद भी बना हुआ है।
वर्ष 2014 में आम चुनाव से पहले पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने मूल्य समर्थन योजना के अंतर्गत नई नीति लागू की थी। इसके तहत एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध जोड़ा गया कि कोई भी राज्य अपने कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत से अधिक दलहन-तिलहन की खरीद नहीं कर सकेगा। इस नीति में एकमात्र राहत यह थी कि यदि किसी राज्य को इस सीमा से अधिक खरीद करनी हो, तो कृषि मंत्रालय अकेले छूट दे सकता था। लेकिन, यह राइडर, यूपीए सरकार के जाने के बाद भी नीति का हिस्सा बना रहा। किसान संगठनों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई सरकार इस प्रतिबंध को हटाकर किसानों को राहत देगी। लेकिन, यह उम्मीद अभी तक पूरी नहीं हुई है।
'आशा' का नाम, निराशा का काम
वर्ष 2018 में, केंद्र सरकार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) नामक एक छत्रक योजना लाई। उम्मीदों से भरे अपने नाम के अनुरूप इसे किसानों की आय की रक्षा करने वाली योजना बताया गया। नीति के उद्देश्य में स्पष्ट था कि दलहन-तिलहन में आत्मनिर्भरता के लिए किसानों को लाभकारी मूल्य दिए जाएंगे। लेकिन, रामपाल जाट बताते हैं, इसके ठीक उलट रास्ता अपनाया गया। 25 प्रतिशत खरीद सीमा का राइडर न केवल बरकरार रहा, बल्कि और अधिक कठोर हो गया। वर्ष 2014 की गाइडलाइन में कृषि मंत्रालय अकेले छूट दे सकता था। लेकिन, वर्ष 2018 की नई गाइडलाइन में यह अधिकार कृषि, वित्त और वाणिज्य मंत्रालय की संयुक्त सहमति पर निर्भर कर दिया गया। रामपाल जाट कहते हैं, नौकरशाही की ऐसी जटिलता व्यावहारिक रूप में छूट को लगभग असंभव बना देती है।
किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट राजस्थान के प्रमुख किसान नेता हैं। वह कृषि मुद्दों, एमएसपी और बजट पर अपनी टिप्पणियों के जरिये मुखर रहे हैं। जाट बताते हैं कि किसान संगठनों ने वर्ष 2019 से इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाना शुरू किया। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्री अमित शाह और कृषि मंत्रालय को लगातार ज्ञापन भेजे गए। पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री रहे राधामोहन सिंह व नरेंद्र सिंह तोमर; और मौजूदा केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से समय-समय पर वार्ताएं और पत्राचार हुआ। सरकार की ओर से इस खामी को स्वीकार भी किया गया, लेकिन परिणाम सीमित रहे।
अग्रणी उत्पादक राज्यों पर ज्यादा असर
लगातार प्रयासों के बाद, इस मामले में किसान संगठनों को पहली सफलता 31 अगस्त 2022 को मिली, जब तीन चुनिंदा फसलों पर खरीद सीमा 25 फीसदी से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई। फिर, 31 मार्च 2024 को इन तीनों फसलों पर राइडर यानी शर्तों को पूरी तरह हटा लिया गया और 100 प्रतिशत खरीद का वादा भी किया गया। लेकिन, इन दोनों निर्णयों में मूंग, चना और तिलहन को अभी भी बाहर रखा गया। सरकार का तर्क था कि मूंग और चना का आयात निर्भरता पहले अधिक थी जो अब कम हो गई है, इसलिए इन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत नहीं है।
किसान संगठनों ने इस तर्क को सिरे से खारिज किया है। रामपाल जाट कहते हैं कि जो फसल आयात की निर्भरता कम कर चुकी है, वह किसानों की मेहनत का परिणाम है। ऐसे में, उस फसल को सहायता योजना से बाहर करना, प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण विद्यार्थी को दंडित करने जैसा है। उनकी दलील से स्पष्ट है कि गेहूं और धान की सरकारी खरीद पर कोई सीमा नहीं है, जबकि दालों और खाद्य तेलों में भारत सबसे अधिक आयात पर निर्भर है। जिन फसलों में देश को सबसे अधिक आत्मनिर्भरता की जरूरत है, उन्हीं पर खरीद की पाबंदी विरोधाभास को दर्शाता है। इससे उन राज्यों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है, जो दलहन उत्पादन में अग्रणी हैं।
रामपाल जाट कहते हैं, राजस्थान देश में मूंग उत्पादन में पहले स्थान पर है और देश की करीब 49 प्रतिशत मूंग इसी राज्य में पैदा होती है। चना उत्पादन में मध्य प्रदेश शीर्ष पर है, जबकि राजस्थान और महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर रहते हैं। आगे वह कहते हैं, मौजूदा कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी का लोकसभा क्षेत्र अजमेर है, जो पूरे राजस्थान में दलहन उत्पादन में अग्रणी है। किसान संगठनों ने उनके घर जाकर ज्ञापन सौंपा, हालांकि मंत्री उस दिन उपलब्ध नहीं थे। लेकिन, कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
नीति और वास्तविकता के बीच अंतर
आंदोलन जारी हैं। पत्र लिखे जा रहे हैं। वार्ताएं हो रही हैं। एक तरफ सरकार कहती है कि दलहन-तिलहन में भारत आत्मनिर्भर बनेगा। दूसरी तरफ नीतियों में सरकारी खरीद सीमित दिखाई देती है। किसान संगठनों का कहना है कि यही अंतर्विरोध असली समस्या है। जब तक मूंग, चना और तिलहन को बिना शर्तों के समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी नहीं मिलती, तब तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल कागजों पर ही सिमटा रहेगा।
किसानों को प्रोत्साहन और सही दाम की जरूरत
भारतीय किसान दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने में पूरी तरह सक्षम हैं। लेकिन, उनकी उपज को सही दाम और उचित प्रोत्साहन की जरूरत है। वर्तमान समय में, खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता 55 प्रतिशत तक बनी हुई है, जबकि दलहनों के आयात पर निर्भरता 2022-23 के 8 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 21 प्रतिशत पर पहुंच गई। भारत में फसल उत्पादन वर्ष 1950-51 के 5.08 करोड़ टन से बढ़कर आज करीब 33 करोड़ टन पहुंच गया है। इसके बावजूद, दलहन और तिलहन में आयात पर निर्भरता खत्म नहीं हुई है। इसके साथ ही, पोषण संबंधी चुनौतियां भी बनी हुई हैं, जबकि उत्पादकता के मामले में भारत अभी कई देशों से पीछे है।
किसान आईडी, क्षेत्रवार रोडमैप से दलहन-तिलहन में छलांग
कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुसार, राज्यवार कृषि रोडमैप के साथ ही फार्मर आईडी से खाद, बीज, बीमा व मुआवजे की पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। खाद्य तेल मिशन–तिलहन के अंतर्गत 2024–25 में 429.89 लाख टन रिकॉर्ड उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी को आगे बढ़ाते हुए, तिलहन क्षेत्र 2.9 करोड़ हेक्टेयर से 3.3 करोड़ हेक्टेयर और उत्पादन 3.92 करोड़ टन से 6.97 करोड़ टन तक ले जाने का लक्ष्य है। दलहन मिशन के तहत बीज उत्पादन, दाल मिलों की स्थापना, नई बीज किस्मों को सीड चेन में लाने तथा इच्छुक किसानों से 100 प्रतिशत खरीद के माध्यम से देश को दालों में भी मजबूत आत्मनिर्भरता की ओर ले जाया जाएगा। -शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री
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