भारतीय संस्कृति की विरासत में मेले और लोकपर्व सबसे चमकदार रत्नों जैसे हैं। हमारे यहां मेला केवल धार्मिक आस्था का आयोजन नहीं होता, बल्कि यह लोकजीवन का खुला मंच होता है, जहां श्रद्धा और परंपरा के साथ व्यापार, मनोरंजन, रिश्ते और सामुदायिक स्मृति एक छत के नीचे आ बैठते हैं।
किसी देवता या लोकनायक की मान्यता से जुड़ा मेला सजता है तो आसपास के गांवों की जीवन-लय वहां उमड़ पड़ती है। मेलों में लोक की सहजता और आत्मीयता देखते ही बनती है। दूरदराज से आए लोग मिलते हैं और मेलजोल रिश्तों में बदल जाता है। कारीगर अपनी वस्तुएं सजाते हैं, लोक-कलाकार अपनी कला रचते हैं और बच्चे मेले की रंगीन दुनिया में अपना आनंद खोज लेते हैं।
सच कहें तो मेला साथ मिलकर जीने का अनुभव है।
भादों की दूज, बाबा की पुकार
उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वितीया को तीन दिन का मेला लगता है। लोकभाषा में इसे दूज, दोज, दोयज और बूढ़े बाबा का मेला कहते हैं। यह वह ऋतु है, जब बरसाती बादलों का आना-जाना लगा रहता है।
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ऐसे में दूज के दिन जनपद के कई क्षेत्रों में चहल-पहल बढ़ जाती है। किसी के हाथ में प्रसाद होता है, किसी की गोद में बच्चा और किसी के साथ पूरा परिवार। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे स्त्री-पुरुष और बच्चे, दूर के गांवों से आती पगडंडियां और बैलगाड़ियां, सब बूढ़े बाबा के मठ और मंदिरों की ओर चल पड़ते हैं।
बिजनौर शहर में यह मेला रोडवेज बस स्टैंड के निकट बूढ़े बाबा के मंदिर में लगता है। सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है और प्रसाद चढ़ाने वालों की कतार लग जाती है। खिलौनों, चाट-पकौड़ी और दूसरी छोटी-बड़ी दुकानों से मेले का रंग धीरे-धीरे गाढ़ा होता चला जाता है।
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मनौती की डोर, बच्चों की कुशल-कामना
इस मेले की जड़ें बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी एक लोकमान्यता में हैं। लोगों का विश्वास है कि बूढ़े बाबा के मठ या मंदिर में श्रद्धा से प्रसाद चढ़ाने और मनौती मानने से वर्षा से उपजे चर्मरोगों, यानी दाद, खाज और खुजली से बचाव होता है।
अनेक परिवार अपने बच्चों के नाम से विशेष चढ़ावा चढ़ाते हैं। पीढ़ियों से चली आती यह रीत केवल कर्मकांड नहीं है। उसमें बच्चों को स्वस्थ और सुखी देखने की पारिवारिक आकांक्षा भी धड़कती है।
झोली, लाठी और नीम की छांव
जनश्रुति कहती है कि बहुत समय पहले गांव-गिरांव में एक बूढ़े बाबा घूमा करते थे। एक झोली और एक लाठी ही उनकी पूंजी थी। जहां सांझ ढलती, वहीं किसी पेड़ के नीचे डेरा डाल लेते। गांव में कोई बालक बीमार पड़ता तो बाबा उसके घर जा पहुंचते, नीम के पत्तों से झाड़ा देते और कहते, 'घबराओ मत, बालक जल्दी ही ठीक हो जावेगा।'
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एक बार एक किसान के बच्चे बीमारी और दाद-खाज से बहुत दुखी थे। किसान उन्हें लेकर बाबा के पास पहुंचा। बाबा ने झाड़ा दिया, बच्चों के सिर पर हाथ रखा और कहा, 'मन में भरोसा रखो, जल्दी ही सब ठीक होगा।' कुछ ही दिनों में बच्चे भले-चंगे हो गए।
कृतज्ञ किसान बाबा को ढूंढने निकला, पर बाबा कहीं नहीं मिले। जहां वे रोज बैठा करते थे, वहां केवल उनकी लाठी गड़ी मिली। उसी रात किसान के सपने में बाबा आए और बोले, 'भादों की दोज को यहीं आना, बालकों को लेकर।' सुबह किसान ने यह बात गांव वालों को बताई और सबने मिलकर बाबा के नाम का एक चबूतरा बनवा दिया।
समय बीतता गया। चबूतरा मठ बना, मठ मंदिर में ढलता गया और दोयज का दिन बूढ़े बाबा के मेले का दिन बन गया। कहीं यह मेला केवल आस्था का रहा, कहीं सामाजिक मिलन का अवसर बना और कहीं रिश्ते जोड़ने की परंपरा भी इससे जुड़ गई। हर क्षेत्र की जनश्रुतियां और कथाएं भले अलग-अलग हों, मंगलकामना सबकी एक ही है कि बच्चे स्वस्थ रहें।
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कान-खोपड़ी और दाद-फूल की रीत
इसी लोकविश्वास से जुड़ी कान-खोपड़ी और दाद-फूल चढ़ाने की विशिष्ट परंपरा इस मेले की पहचान है। अलग-अलग स्थानों पर इसके रूप में थोड़ी भिन्नता मिलती है। हल्दौर में बूढ़े बाबा का प्राचीन मठ इस परंपरा का विशेष केंद्र है।
हल्दौर-नहटौर मार्ग के निकट नगर से बाहर बने इस मठ पर दोयज का मेला लगता है। भोर में लगभग चार बजे से श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है और दिन चढ़ते-चढ़ते परिसर भीड़ से भर उठता है। आसपास के गांवों के साथ दूसरे जनपदों से भी महिलाएं, पुरुष और बच्चे पहुंचते हैं, और देर शाम तक प्रसाद चढ़ने का क्रम चलता रहता है।
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हल्दौर की लोक-परंपरा में दाद-फूल के साथ शूकर के बाल चढ़ाने की रस्म भी जुड़ी है। बच्चों के नाम से किया जाने वाला यह चढ़ावा मनौती से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि स्थानीय रूप में शूकर के बच्चों के कान और सिर के बाल काटकर चढ़ाए जाते हैं। आज की दृष्टि से यह परंपरा भले अलग या विचित्र लगे, पर लोकजीवन के ऐसे अनुष्ठान अपने भीतर परिवार की चिंता, आशा और पीढ़ियों से चले आ रहे विश्वास को संजोए रहते हैं।
बरसात की नमी, लोक की चिंता
इस परंपरा की पृष्ठभूमि में भादों का मौसम भी झांकता है। बरसात की नमी और उमस में त्वचा की परेशानियां ग्रामीण जीवन में पुराने समय से झेली जाती रही होंगी। ऐसे अनुभवों से उपजी आशंकाएं और उनसे मुक्ति की कामना धीरे-धीरे लोकविश्वास का रूप लेती गईं।
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आज चिकित्सा सुविधाएं बढ़ी हैं और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी पहले से अधिक है, फिर भी यह परंपरा अपनी सांस्कृतिक स्मृति के बल पर जीवित है। उसमें रोग से बचाव की कामना के साथ परिवार, आस्था और पीढ़ियों की निरंतरता भी घुली हुई है।
मनौती पूरी होने की खुशी
बूढ़े बाबा को मीठे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कहीं बताशे, कहीं मीठी खील, कहीं गुड़-आटा, तो कहीं दाल, पूड़ी और पूड़े जैसे चढ़ावे भी मिलते हैं। मनौती पूरी होने की खुशी और मेले की मिठास एक-दूसरे में घुल जाती हैं। जलेबी और खिलौनों की दुकान पर ठिठका बच्चा, हाथ में प्रसाद लिए लौटता परिवार और मंदिर की चौखट पर झुका सिर, ये छोटे-छोटे दृश्य ही इस लोकपर्व को जीवन के बहुत निकट ले आते हैं।
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एक दूज, अनेक ठौर
बिजनौर जनपद में बूढ़े बाबा की दोयज किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। बिजनौर शहर, हल्दौर, राजा का ताजपुर, नहटौर क्षेत्र का फुलसंदा, नूरपुर क्षेत्र के रतनगढ़, हीमपुर बुजुर्ग और पुठ्ठा, तथा मंडावर क्षेत्र का शहबाजपुर उर्फ केलावाला, इन सहित अनेक स्थानों पर इस दिन श्रद्धालु मंदिरों और मठों में जुटते हैं। यह किसी एक मंदिर का मेला भर नहीं, पूरे जनपद में फैली लोकआस्था की साझा परंपरा है।
मंडावर क्षेत्र के शहबाजपुर उर्फ केलावाला का मेला अपनी अलग सामाजिक स्मृति संजोए हुए है। यहां बूढ़े बाबा की पूजा और मनौती के साथ रवा राजपूत समुदाय में विवाह-संबंध तय करने की परंपरा भी रही है। पुराने समय में दूर-दूर से परिवार मेले में आते, युवक-युवतियों को देखते, बातचीत करते और रिश्तों की संभावनाएं तलाशते थे। इस तरह यह मेला धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक मेल-जोल और रिश्ते गढ़ने का अवसर भी बन जाता था।
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स्मृतियों की गठरी
मेले में आने वाला हर व्यक्ति अपनी अलग मनोकामना लेकर आता है। किसी के लिए यह बच्चे के स्वास्थ्य की प्रार्थना है, किसी के लिए मनौती पूरी होने का आभार, किसी के लिए परिवार की कुशलता की कामना और किसी के लिए बचपन से चली आती परंपरा को निभाने का दिन। लौटते समय सबकी गठरी में मेले की कोई न कोई स्मृति जरूर होती है: प्रसाद की मिठास, जलेबी की खुशबू, बच्चे के हाथ का खिलौना, मंदिर की भीड़ या बाबा की चौखट पर झुका अपना ही सिर।
आज परिस्थितियां बदल गई हैं। अस्पताल और चिकित्सक उपलब्ध हैं और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है। फिर भी बूढ़े बाबा की दोयज पर उमड़ती भीड़ बताती है कि लोकविश्वास केवल रोग या उपचार की धारणा नहीं है। उसमें स्मृति, सामुदायिकता और पीढ़ियों का भावनात्मक संबंध भी शामिल है।
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समय के साथ साधन और मेले का रूप बदला है, पर भादों की दोयज आते ही लोकस्मृति फिर जाग उठती है। गांवों से आती भीड़, मंदिर की घंटियां, प्रसाद की थालियां और बच्चों के साथ चलते परिवार गवाही देते हैं कि लोकसंस्कृति केवल पुस्तकों में सुरक्षित नहीं रहती, वह लोगों के जीवन में सांस लेती है।
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भादों की दोयज केवल मेले की एक तारीख नहीं, बल्कि लोकआस्था, पारिवारिक स्नेह, सामुदायिकता और पीढ़ियों की सांस्कृतिक स्मृति का पर्व है। सबकी साझा प्रार्थना एक ही है कि 'बाबा, बच्चा निरोग रहे, घर-आंगन सुख से भरा रहे।' लोकपरंपराएं ऐसी ही छोटी-सी कामना में सदियों की स्मृति और आस्था संजोए जीवित रहती हैं।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)