विज्ञापन
Home› Lokrang› Kalpvriksh› Folk Festival Sanjhi Dreams And Prayers Bloom On The Walls During Pitru Paksha

पितृपक्ष की सांझ, बेटियों का लोकपर्व : पीहर आईं सांझी माई, कच्ची दीवारें भी मुस्काई

डॉ. पारुल तोमर, लोक-संस्कृति की जानकार एवं चित्रकार, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 01 Oct 2026 04:53 PM IST
सार

सांझी के कई रूप हैं। गोबर-सांझी, पुष्प-सांझी, रंग-सांझी, गुलाल-सांझी और जल-सांझी आदि। हर रूप लोक की कल्पनाशक्ति का प्रमाण है। लेकिन, यह पर्व केवल लोककला और संस्कृति का उत्सव नहीं, बल्कि लोकगीतों के माध्यम से किशोरियों को जीवन के अनुभवों, सामाजिक व्यवहार और भावी दाम्पत्य के संकेतों से परिचित कराने की सहज लोक-परंपरा भी है।

घर आईं सांझी माई, दीवारों ने ली अंगड़ाई
घर आईं सांझी माई, दीवारों ने ली अंगड़ाई - फोटो : गांव जंक्शन
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

हमारे लोकपर्व प्रसंग ऋतुओं से जुड़े होते हैं। ऋतुओं में उल्लास के पड़ाव होते हैं ये पर्व। वे पर्व इसीलिए हैं, क्योंकि वे काल के पौर या पड़ाव जैसे होते हैं। पर्वों के साथ सामाजिक मंगल की कामनाएं जुड़ी होती हैं। ये मनाएं संस्कृति को उजास देती हैं। ऊर्जा देती हैं। उछाह देती हैं। वर्षभर में अयनों के बीच ऋतुओं का जो संचरण होता है, वे उपज और निपज, बनावट और सृजन के आधार पर मानवीय मन के उल्लास के लिए पर्वों को चक्रित करती हैं।

भारत की छह प्रमुख ऋतुओं में शरद ऋतु का सौंदर्य अद्भुत होता है। भाद्रपद की पूर्णिमा के अगले दिन ही अश्विन माह से इस ऋतु की शुरुआत हो जाती है। लोकजीवन में अश्विन माह को असोज, कुआर या क्वार के नाम से भी जाना जाता है। वर्षा की विदाई और शरद का आगमन वह संधिकाल है, जब प्रकृति का कण-कण एक नवीन आभा से दीप्त हो उठता है। शरद का यही मोहक रूप तुलसीदासजी के शब्दों में साकार हो उठता है-

“वर्षा विगत शरद ऋतु आई,
लक्ष्मण देखहु परम सुहाई।”


यह ऋतु न जाने कितने ही लोकपर्वों की खान है। सांझी इसी ऋतु का लोकपर्व है। सांझी, संझा, सांझुली, संजाफूली और सांझ्य आदि नाम से जानी जाती है। यह एक लोक देवी है। यह पर्व मुख्यतः उत्तर भारत, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली के कुछ हिस्सों में और विशेषकर ब्रज क्षेत्र में बड़े अनुराग के साथ मनाया जाता है।

सांझी : पितरों की स्मृति और कन्याओं का उत्सव
सांझी का प्रमुख संबंध भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक आने वाले पितृपक्ष (कनागत) से जोड़ा जाता है। अनेक स्थानों पर यह परंपरा कनागत में पूरे पंद्रह-सोलह दिनों तक निरंतर चलती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में नवराात्रि के नौ दिनों के साथ भी इसका रूप जुड़ जाता है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के दस्तावेजों में भी उत्तर और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में पितृपक्ष के दौरान अविवाहित कन्याओं द्वारा सांझी बनाए जाने का प्रामाणिक उल्लेख मिलता है।

सांझी के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। गोबर-सांझी, पुष्प-सांझी, रंग-सांझी, गुलाल-सांझी और जल-सांझी आदि। हर रूप लोक की कल्पनाशक्ति का प्रमाण है। लेकिन यह पर्व केवल लोककला और संस्कृति का उत्सव नहीं, बल्कि लोकगीतों के माध्यम से किशोरियों को जीवन के अनुभवों, सामाजिक व्यवहार और भावी दाम्पत्य के संकेतों से परिचित कराने की एक सहज लोकपरंपरा भी है।

पितृपक्ष के दिनों में गांव की भोर खीर, मालपुए और नैवेद्य की मीठी सुगंध से महक उठती है तो वहीं सांझ ढलते ही घर-आंगन और दीवारें लोककला के रंगों से सजने लगती हैं। प्रातः पितरों को स्मरण और भोजन-तर्पण, संध्या को प्रकृति और भावी जीवन की पूजा। कन्या की कला, कन्या का सूर्य, कन्या की सांझ और उसके साथ गूंजते लोकगीत, सब कुछ मिलकर सांझी की देह-सौंदर्य का आकार लेते हैं। श्राद्ध, श्रद्धा और सृजन का यह अनुपम अवसर होता है।

गांव में यह दृढ़ विश्वास है कि जो परिवार श्रद्धा से कनागतों में सांझी रचते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि, अन्न-धन, खुशियों और संतति का आगमन होता है। पितरों को स्मरण करते हुए भी घर की बेटियां अपने भविष्य के मंगल का स्वप्न देखती हैं। बीती पीढ़ी को प्रणाम करते हुए अगली पीढ़ी अपने जीवन के लिए आशीष मांगती है। कनागतों की इन सुरमई सांझों में गांव के गलियारे कन्याओं के इन मधुर लोकगीतों से गूंज उठते हैं-

संझा सांझण ऐ कनागत करले पार,
देखन चालो री महारी संझा का लनिहार,
कै देखयोगी ऐ यो खोङो राम जङाम,
बैठो टिबङिये चलावै तिरकबान…।


स्मृतियों में सांझी…
यह बात उस समय की है, जब मैं बहुत छोटी थी। इतनी छोटी कि ऋतुओं के नाम भी नहीं जानती थी, लेकिन इतना जरूर समझती थी कि भादो की पूरनमासी की सांझ बाकी सांझ जैसी तो बिल्कुल नहीं होती है। उस दिन सांझ ढलने से पहले दादी ने मुझे आवाज दी और कहा कि पड़ोस वाली दादी चाची से बोलकर आओ कि मिट्टी लेने चलना है। मैंने दादी से पूछा कि मिट्टी क्यों लानी है। दादी ने कहा, “सांझी बनानी है।” मैंने पूछा, “सांझी क्या होती है?” दादी हंसकर बोलीं, “अभी क्या बताएं? पहले दीवार लीपो, मिट्टी गलाओ, फिर बताऊंगी।”

मुझे तब कहां ज्ञात था कि वह दीवार केवल मिट्टी और गोबर से लीपी जाने वाली दीवार नहीं थी। वह आने वाली कई पीढ़ियों की स्मृति संभालने वाली दीवार थी। वह गांव की बेटियों की पाठशाला थी, उनकी चित्रशाला थी, उनके गीतों का आँगन थी और उन इच्छाओं की जगह थी, जिन्हें वे किसी कागज पर लिखना नहीं जानती थीं।

उस दिन घर की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं, बहुएं और बेटियां सब साथ में गीत गाते हुए गांव के तालाब पर गईं और वहां से सांझी बनाने के लिए चिकनी मिट्टी खोदकर लाईं। टोकरियों में भरकर लाई गई मिट्टी में पानी डालकर भिगोकर रखा गया, ताकि वह अच्छी तरह गलकर मुलायम हो जाए। फिर उसमें थोड़ा-सा गोबर मिलाकर उसे खूब साना गया, गूंधा गया। और फिर तैयार की गई इसी माटी से कनागत के 15 दिनों में सांझी में प्रयुक्त होने वाली समस्त आकृतियां स्त्रियों ने मिलकर धीरे-धीरे तैयार कर लीं।

सांझी के साथ-साथ उनकी बहन फूहड़, खोड़िया, काना बामन और उल्टा चोर की प्रतिमाएं भी विशेष रूप से गढ़ी गईं। हर दिन सांझी के लिए कुछ न कुछ नया गढ़ा जाता। अधिकतर आकृतियां सीधे प्रकृति और लोकजीवन से संबंधित थीं। फलों-फूलों से लदे वृक्ष, मोर, चिड़िया, गाय-बछड़ा, सूरज-चांद-सितारे, स्वास्तिक और मंगल-कलश आदि।

घर और पड़ोस की सभी स्त्रियां मिलकर सांझी का शरीर, घाघरे जैसी आकृति, चांद, सितारे, आभूषण और अन्य मंगल चिह्न बड़े मनोयोग से गढ़तीं। सिर पर चांद-सा जूड़ा, कानों में झुमके, हाथों में चूड़ियां और पैरों में जूती भी बनाई जाती। कहीं चेहरा गोल होता, तो कहीं चौकोर। सांझी के सोलह शृंगार की आकृतियां भी बनाई गईं। सितारों की कोई गिनती नहीं होती थी। जितने बन पड़ें, उतने ही प्रेम और श्रद्धा से गढ़े गए। मिट्टी की इन आकृतियों को रोज धूप में सुखाने के लिए रख दिया जाता था।

पितृपक्ष के अंतिम दिनों और नवरात्र के आरंभ के आसपास सांझी की सजावट का अगला चरण शुरू हुआ। सूख चुकी आकृतियों पर सफेदी या मुल्तानी मिट्टी के घोल से रंगा गया। इस कार्य के लिए हम बच्चे बहुत उल्लासित रहते। सारे के सारे चित्रकार कलाकार बन जाते। मुल्तानी मिट्टी और पिंडोल से रंगी वे आकृतियाँ उजली दिखाई देने लगतीं। इसके सूख जाने पर गेरू और दूसरे रंगों से उनका शृंगार किया जाता। होंठों पर रंग लगाया जाता, आंखों में काजल भरा जाता और जूती, घाघरे तथा सितारों को रंगों से सजाया जाता। साधारण मिट्टी धीरे-धीरे एक सुंदर लोक-आकृति में बदलने लगती। हर आकृति में बनाने वाली स्त्रियों की कल्पना, कुशलता और श्रद्धा का रंग घुला रहता था।

अश्विन अमावस्या के दिन घर या पड़ोस की उपयुक्त दीवार चुनकर उसे गोबर से लीपा जाता। लीपी हुई दीवार पर गोबर से उभारदार अंकन के सहारे सांझी की मुख्य आकृति बनाई जाती और सर्वपितृ-विदाई, पूजन-अर्चन की गोधूलि बेला में सांझी को अंतिम और सबसे भव्य रूप देते हुए महल और कोट बनाकर भरा जाता। फिर फूलों, पत्तियों, रंगों, चमकीली पन्नियों और माटी के आभूषणों से इसे पूरी निष्ठा से सजाया जाता।

अंतिम दिन बनाया जाने वाला यह कोट केवल आकार में बड़ा नहीं होता, बल्कि उसमें पिछले पंद्रह दिनों की समस्त आकृतियां और स्मृतियां जैसे एक साथ आकार ले लेती थीं। गांव का पूरा जीवन घर-गृहस्थी के बर्तन, चक्की, बिलौनी, शुभ प्रतीक, पशु-पक्षी, सूरज-चांद और मानव आकृतियां सब मिलकर उस कच्ची दीवार पर लोकजीवन का एक संपूर्ण संसार रच देते। सांझी को चुनरी ओढ़ाई जाती, सिर पर घूंघट सजाया जाता और उसके सामने भोग रखकर पूजा की जाती। नवरात्र की प्रत्येक संध्या और प्रातःकाल में गांव की स्त्रियां और कन्याएं एकत्र होकर सांझी के आगे माटी का दीपक जलातीं, आरती करतीं और गातीं-

आरता री आरता मेरी सांझी माई आरता
काहे का दिवला काहे की बाती
सोने का दिवला रूई की बाती
सरसों का तेल जले सारी सारी राती।


और फिर मिष्ठान का भोग अर्पित करते हुए गातीं-

संझा माई जीमले
ना धापी तो ओर ले
धाप गी तो छोड़ दे...


फिर भावपूर्ण भोग लगाकर घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए यह पारंपरिक लोकगीत गातीं-

संझा के ओरे-धोरे फूलै रे चौलाई,
मै तन्नै बूझू री संझा कै तेरे भाई,
फेर संझा बतावैगी,
पांच-पच्चीस भतीजा, नौ-दस भाई,
भाई यारो ब्याह करो, भतीजा री सगाई।


कोरा करवा शीतल पानी,
राज करे महलो की रानी।


संझा माई की पूजा के लिए भोग-प्रसाद आसपास के सभी घरों में बारी-बारी बनकर आता। सभी मिलकर उसे ग्रहण करते। रात के भोजन के बाद महिलाएं सांझी के पास जुटतीं। लोकगीत गातीं, नाचतीं और हम सारे बच्चे खेलकूद में मगन रहते। हंसी, गीत और उल्लास से भरी वे शामें कब रात में ढल जातीं, पता ही नहीं चलता था।

सांझी का यह उत्सव सामूहिकता की अनूठी मिसाल था। सबकी आस्था और सहभागिता से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती थी। पड़ोस की स्त्रियां और लड़कियां बेझिझक एक-दूसरे के घर आती-जाती थीं। इस पूरे लोक-आयोजन में पुरुषों की भूमिका पूरी तरह अनुपस्थित रहती थी। यह अनुपस्थिति अपने आप में बहुत अर्थपूर्ण थी। सांझी के बहाने स्त्रियों को अपना एक ऐसा मुक्त, सामुदायिक संसार मिलता, जहां घर-गृहस्थी की चौखट और रोजमर्रा के चूल्हे-चौके की जिम्मेदारियों के बीच वे कुछ पल केवल अपने लिए, अपने सृजन, गीत और सुख-दुख बाँटने के लिए निकालती थीं।

कहीं नवरात्र की नवमी की संध्या बेला में, तो कहीं विजयादशमी (दशहरा) की सांझ को सांझी को दीवार से सावधानीपूर्वक उतार कर एक कलश/मटके में रखा जाता। तत्पश्चात शुद्ध देसी घी का माटी का दीपक जलाकर, स्त्रियां और बालिकाएं मधुर लोकगीत गुनगुनाती हुई, सामूहिक भाव से सर्वमंगल की कामना करते हुए सांझी माई को बिल्कुल वैसे ही विदा करती हैं, जैसे अपने घर आई लाडली बेटी या आत्मीय अतिथि को स्नेहभरी विदाई दी जाती है।

गांव के पोखर, तालाब, नदी या नहर के बहते जल में उस कलश/मटके को प्रवाहित (विसर्जित) कर, मंगल गीत गाते हुए सब अपने-अपने घर लौट आते। जिस मिट्टी को तालाब के भीटे से लाया गया था, वही अंततः तालाब के जल में घुल जाती। सांझी का विसर्जन इसलिए केवल किसी प्रतिमा का जल-प्रवाह नहीं है। यह लोक का प्रकृति के साथ एक संवाद है ‘माँ! तुमसे जो लिया था, वह तुम्हें ही निष्काम भाव से लौटा दिया।’

पुराने ग्रामीण जीवन में यह चक्र बहुत सहज था। इसमें उपभोग या विनाश का भाव नहीं, बल्कि सहभागिता और कृतज्ञता का भाव था। आज जब हमारे त्योहारों में प्लास्टिक, थर्माकोल और घातक रासायनिक रंगों का जहर घुल रहा है, तब सांझी की यह पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल और प्रकृति-संगत परंपरा हमें अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देती है।

लोकविश्वास है कि सोलह दिनों के लिए संझा माई अपने पीहर आती हैं। उनके आगमन से घर-आंगन उल्लास से भर उठता है। सहेलियां लोकगीतों और हंसी-ठिठोली के बीच उनके रूप, अनुराग और दाम्पत्य जीवन के प्रसंगों को जीवंत करती हैं। सांझी में बेटी के पीहर लौटने की वही आत्मीय कल्पना साकार होती है, जो पूर्वी भारत में माँ दुर्गा के मायके आगमन के लोकगीतों में दिखाई देती है।

सांझी की उत्पत्ति को लेकर अनेक पौराणिक व्याख्याएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। जनश्रुतियों में संजा का संबंध ब्रह्मा जी की पुत्री संध्या से भी जोड़ा जाता है। शिवपुराण में वर्णित है कि संध्या ने चंद्रभाग पर्वत पर शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। तो कहीं इसका संबंध सूर्य की पत्नी संज्ञा और संध्या देवी से जोड़ा जाता है। कहीं इसे माता पार्वती या गौरी का लोकस्वरूप मानकर पूजा जाता है। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों में इसे रामायण काल की कथा से भी जोड़ते हैं। ब्रज की मधुर परंपरा इसे श्रीराधा और श्रीकृष्ण के पुष्प-विनोद तथा शरदकालीन लीलाओं से जोड़ती है।

सांझी से जुड़ी प्रचलित लोक कथाएं
बचपन में दादी को सांझी बनाते देखा और मां से सांझी की कथा सुनी। कथा कुछ इस तरह थी कि जब रामजी अपनी वानर सेना के साथ लंका के सुबेल पर्वत पर जा पहुंचे, तब युद्ध आरंभ करने से पहले उन्होंने विजय की कामना से मां शक्ति की पूजा करने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने बछिया के गोबर से पर्वत पर मां शक्ति की प्रतिमा बनाई। प्रतिमा के साथ सभी मंगल चिह्न भी अंकित किए। प्रतिदिन संध्या समय फल-फूलों से मां शक्ति की पूजा-अर्चना करते रहे।

पूजा के पश्चात प्रतिमा को पर्वत से उतारकर एक कलश में स्थापित किया। हनुमान जी उस कलश को विसर्जन के लिए समुद्र की ओर लेकर चले। उनके रास्ते में कई असुरों ने उत्पात मचाया। लेकिन हनुमान जी ने मां शक्ति का विधिवत विसर्जन किया। राम विजयी हुए। सीता संग अयोध्या लौटे। आज भी गांव में जब सांझी को चित्रित किया जाता है, तब सांझी के साथ उनके भाई को भी अवश्य बनाया जाता है। मां बताती थी कि सांझी के भाई के रूप में हनुमान जी को उनके साथ बनाया जाता है।

हरियाणवी लोककथा
एक बार वर्षा ऋतु बिना बरसे ही बीत गई थी। एक बूंद जल भी नहीं बरसा था। चारों ओर सूखे का साम्राज्य फैला था। कनागत चल रहे थे, किंतु धरती पर हरियाली का कहीं कोई नामोनिशान न था। खेत-खलिहान, नदी-तालाब सब सूखे पड़े थे। जन-जीवन अस्त-व्यस्त था। पशु-पक्षी और मनुष्य, सभी पानी और अन्न के अभाव में बेहाल थे। चहुंओर निराशा और अभाव के बादल छाए हुए थे।

धरती की यह दारुण दशा देखकर मां पार्वती का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने भगवान शिव से इस संकट के निवारण का उपाय पूछा। भगवान शिव ने बताया कि धरती माता ही सबकी साझी माता है, उसकी देखभाल, सेवा और आराधना ही इस विपदा से मुक्ति का मार्ग है। शिव का संदेश पाकर मां पार्वती गोधूलि बेला में एक साधारण स्त्री का रूप धारण कर गांव पहुंचीं। वहां उन्होंने स्त्रियों और कन्याओं के साथ मिलकर गोबर और मिट्टी से घर की दीवार पर साझी माता का स्वरूप उकेरा। उसमें भाई-बहन सहित मंगल के सभी चिह्न बनाए और हल्दी, रोली, अक्षत, पुष्प तथा दूब से उनका सुंदर श्रृंगार किया।

फिर सभी स्त्रियों और कन्याओं ने एकत्र होकर धरती की हरियाली, वर्षा, अन्न-समृद्धि और लोकमंगल की कामना से मंगलगीत गाते हुए सांझी माता की आराधना की। लोकमान्यता है कि उनकी इस सामूहिक प्रार्थना के फलस्वरूप अगले ही दिन आकाश में बादल घिर आए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। प्यासी धरती की प्यास बुझी, सूखे खेतों में हरियाली लौट आई और जन-जीवन में सुख, आशा तथा उल्लास का संचार हो गया।

ब्रज सांझी की लोककथा
ब्रज की लोकपरंपरा में सांझी को राधा-कृष्ण के प्रेम और लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है। लोकमान्यता है कि एक बार राधारानी श्रीकृष्ण से रूठ गईं। सांझ ढलने लगी, यमुना के तट पर गोधूलि उतर आई, किंतु राधा का मान नहीं पिघला। श्रीकृष्ण ने उन्हें मनाने के लिए एक अनूठी लीला रची।

उन्होंने गोबर से लिपी दीवार पर रंग-बिरंगे फूलों, पत्तियों और प्राकृतिक रंगों से मनोहारी आकृतियां बनाईं। कहीं चंद्रमा और सूरज की छवि उकेरी, तो कहीं फूलों की बेलें और मंगलकारी चिह्न सजाए। उनकी इस सृजनलीला में ऐसी मोहक छटा बिखरी कि राधारानी स्वयं को रोक न सकीं। वे अपना मान भूलकर उस कलाकृति को निहारने लगीं और फिर स्वयं श्रीकृष्ण के साथ मिलकर उसे सजाने-संवारने लगीं। देखते ही देखते सखियां भी वहां आ जुटीं और पूरा वातावरण हंसी, उल्लास तथा प्रेम से भर उठा।

संध्या की बेला में रची गई इस सुंदर कलाकृति को सांझी कहा गया। तभी से ब्रज की गोपियां और कन्याएं गोधूलि के समय दीवारों पर गोबर और मिट्टी से सांझी के विविध रूप उकेरने लगीं। वे फूलों, पत्तियों, रंगों और दीपों से उसे सजाकर राधा-कृष्ण के प्रेम का गुणगान करतीं। इस प्रकार सांझी ब्रज में केवल एक लोककला नहीं रही, बल्कि राधा-कृष्ण की प्रेमलीला, सखियों के सामूहिक उल्लास और लोकजीवन की सौंदर्यप्रियता की जीवंत अभिव्यक्ति बन गई।

सांझी के साथ लोकगीतों की परंपरा इतनी अभिन्न है कि गीतों के बिना यह उत्सव बेजान लगता है। ब्रजभाषा के प्राचीन भक्तिकाव्य और मध्यकालीन पदों में सांझी का प्रचुर उल्लेख मिलता है। बाद में मंदिरों की सांप्रदायिक परंपरा ने भी इन पदों और गीतों को अपना अंग बना लिया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के विस्तृत अध्ययन के अनुसार, ब्रज में घरों की लोकपरंपरा और मंदिरों की कलात्मक साँझी दोनों रूप समान रूप से विकसित हुए। फूलों और रंगों की सज्जा से लेकर राधा-कृष्ण की लीलाओं तक इसके विषय विस्तृत हुए।

मालवा-निमाड़ की लोककथा
एक प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार, संजा एक सुंदर, चंचल और कोमल हृदय वाली बालिका थी, जिसका मन फूलों, पत्तियों और प्रकृति में खूब रमता था। उसका विवाह अल्पायु में ही कर दिया गया था। विवाह के बाद ससुराल जाने पर उसे अपने पीहर, माता-पिता और सखियों की बहुत याद सताती थी। ससुराल में रहते हुए उसे अपने मन की बात कहने और मायके लौटने की इच्छा भी अधूरी रह जाती थी।

कहते हैं कि संजा अपने मन की व्यथा किसी से कह नहीं पाती थी। तब उसने आकाश में चमकते चांद और सूरज को अपना भाई मान लिया। वह दीवार पर गोबर से चांद, सूरज, तारे और फूल-पत्तियों की आकृतियां बनाती और उनसे अपने मन की बातें करती। धीरे-धीरे ये आकृतियां उसके अकेलेपन की सखी बन गईं। लोकमान्यता के इस प्रसंग में संजा की दीवार मानो उसके मन का आंगन बन जाती है, जहां वह अपने बिछुड़े हुए पीहर को फिर से साकार करती है।

लोकविश्वास है कि पितृपक्ष के सोलह दिनों में संजा अब भी अपने पीहर लौटती है। उसके आगमन की खुशी में घर की कुंवारी कन्याएं गोबर से दीवारों पर सांझी के सुंदर मांडने बनाती हैं और फूल-पत्तियों से उन्हें सजाकर लोकगीत गाती हैं। सहेलियां गीतों में उससे हंसी-ठिठोली करती हैं, उसके वैवाहिक जीवन के सुख-दुःख पूछती हैं और अपने मन की भावनाएं भी साझा करती हैं।

सोलहवें दिन जब सांझी की विदाई की बेला आती है, तब सहेलियों के कंठ में विरह के स्वर उतर आते हैं। एक निमाड़ी लोकगीत में सब संजा को ससुराल जाने का संदेश देते हैं। प्रलोभन देते हैं, लेकिन बालमना संजा ससुराल जाने के लिए राजी ही नहीं है-

मालवा से आई गाड़ी इंदौर होती जाय
इसमें बैठी संझा बाई सासरे जाय।

‘संझा बाई का सासरे से, हाथी भी आया
घोड़ा भी आया, जा वो संझा बाई सासरिये।’


लेकिन संजा कहती है-

‘हूं तो नी जाऊं दादाजी सासरिये।’

तब दादाजी समझाते हैं-

‘हाथी हाथ बंधाऊं, घोड़ा पाल बंधाऊं,
गाड़ी सड़क पे खड़ी, जा हो संझा बाई सासरिये।’


यह गीत विदाई और पीहर-ससुराल के भावलोक की एक अभिव्यक्ति है।

निमाड़ के कुछ क्षेत्रों में संजा को छाबड़ी और सांझाफूली जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है। यहां गोबर की पतली रेखाओं पर फूलों की पंखुड़ियां और हरी पत्तियां सजाकर प्रतिदिन नई आकृतियां बनाई जाती हैं। मालवा में भी संजा के अलग-अलग दिनों के लिए विशिष्ट मांडने और गीत प्रचलित हैं।

सांझी प्रसंग भारतीय मिथकीय संसार में प्राचीन समय से मौजूद रहा है। लोक ने इन पौराणिक आख्यानों को अपने ढर्रे पर ढाला, उनमें अपनी आत्मीयता की मिठास मिलाई और उन्हें चित्रों, अनुष्ठानों और गीतों में पिरो दिया। समझने की बात यह है कि सांझी की कोई एक स्थिर, सर्वमान्य कथा नहीं है, बल्कि उसकी अनेक कथा-धाराएं हैं। लोकपरंपरा की मूल प्रकृति भी यही होती है कि वह किनारों में बंधी हुई एक नहर नहीं होती, बल्कि वह तो एक ऐसी विशाल नदी होती है, जिसमें भांति-भांति की छोटी-छोटी लोक-धाराएं आकर मिलती हैं और उसे समृद्ध बनाती हैं।

सांझी शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भी विद्वानों और लोक-परंपरा में अलग-अलग मत मिलते हैं। लोक के सहज मन के लिए यह व्युत्पत्ति चाहे जो हो, सांझ और सांझी का संबंध बहुत गहरा और प्राकृतिक लगता है। लोक में इसका यही अर्थ सबसे सुंदर बैठता है- जो सबका साझा है, वही सांझी है।

शक्ति, उर्वरता, करुणा, सहकार और समृद्धि की प्रतीक सांझी पूजा, लोक में अपनी जगमगाहट से पीढ़ी-दर-पीढ़ी उजास भरती आई है। अपनी विशिष्ट लोकरीति और कलात्मक वैभव के चलते साँझी पर्व भारतीय लोकजीवन की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर बन गया है। जैसा कि मां कहा करती थीं- “अपने लोक, अपनी माटी और संस्कृति से जुड़े रहना जीवन की सबसे बड़ी निधि है।”

 
विज्ञापन
विज्ञापन