Home›Lokrang›
Ramlila Marhara Memories Tree Used Become Ashok Vatika Platform Used Become Ayodhya Entire Village Used Watch
रामलीला की यादें: पेड़ बनता था अशोक वाटिका, चबूतरा बनता था अयोध्या… बोरों पर बैठकर पूरा गांव देखता था मंचन
मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 12 Oct 2026 07:57 PM IST
सार
एक चबूतरा, जो शाम होते ही मंच बन जाता है। सामने खड़ा एक पेड़, जो अशोक वाटिका हो जाता है, और गांव के लोग, जो राम, सीता, हनुमान और रावण के किरदारों में रम जाते हैं। कहानी राम की होती है, पर बोली, गीत और रंग गांव के अपने होते हैं। कुमाऊं से बुंदेलखंड और ओडिशा तक रामकथा हर अंचल में वहां की भाषा और परंपरा पहनकर सामने आती है।
गांव की रामलीला, चबूतरे पर उतरे राम
- फोटो : गांव जंक्शन
मेरे गांव मारहरा (एटा) का रामलीला मैदान छोटा-सा है, लेकिन उन दिनों वही पूरे गांव की सबसे बड़ी दुनिया होता था। कभी वहां एक चबूतरा था, जो मंच बन जाता था और ठीक सामने खड़ा एक पेड़ अशोक वाटिका। इसी पेड़ के नीचे मैंने हनुमान का रूप धरे कलाकार को सीता जी तक राम की अंगूठी पहुंचाते देखा है। मंच छोटा था, साधन सीमित थे, लेकिन कल्पना का संसार बहुत बड़ा।
शाम ढलने से पहले ही मैदान में चहल-पहल शुरू हो जाती। बच्चे दौड़ते-भागते, बड़े अपनी जगह तलाशते और जो पहले पहुंचता, बोरा बिछाकर अपनी जगह घेर लेता। धीरे-धीरे मैदान भरता जाता और आसपास के घरों से भी लोग निकलकर पहुंचने लगते। कोई मंच की तैयारी में जुटा होता, कोई कलाकारों की पोशाक संभालता तो कोई ढोल-नगाड़े तैयार करता। और फिर आती थी लखपत जी की आवाज। स्थानीय कलाकार लखपत जी रामलीला शुरू होने से पहले गीत गाते- “अच्छा अब लीला होती है, भारतवासी आंखें खोलो...”
उनकी आवाज के साथ पूरा मैदान जैसे शांत होकर सुनने लगता। लखपत जी के लोकगीत सिर्फ रामलीला की भूमिका नहीं थे। उनके गीतों में सामाजिक संदेश होते थे। वे गांव के लोगों को अपने आसपास की समस्याओं और सामाजिक सरोकारों पर सोचने का मौका देते। उस दौर में लोकगीत सूचना, मनोरंजन और जन-जागरण का सहज माध्यम थे। इसलिए रामलीला में लखपत जी की भूमिका केवल गायक की नहीं, बल्कि लोक चेतना की आवाज की भी थी।
इसके बाद ढोल-नगाड़ों की थाप पड़ती और चबूतरे पर रामलीला शुरू हो जाती। राम के रूप में अमित सक्सेना, लक्ष्मण के किरदार में योगेश मुद्गल और सीता की भूमिका में हितेंद्र गुप्ता दर्शकों को बांधे रखते। सीता विवाह के दौरान धनुष टूटने पर नवल पालीवाल परशुराम बनकर मंच पर आते और तीखे लेकिन मर्यादित संवादों से माहौल रोमांचक कर देते। रावण के रूप में लालजीत सक्सेना का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार रहता। उनकी कर्कश आवाज मंच पर गूंजती तो माहौल बदल जाता। कुंभकर्ण का किरदार भी खास आकर्षण होता था। लाला सुधीर गोयल इसे बखूबी निभाते। कुंभकर्ण को जगाने के लिए जब ढोल-ताशे बजते, तो दर्शकों के बीच खूब उत्साह होता।
सबसे रोमांचकारी दृश्यों में से एक था संजीवनी बूटी लेकर हनुमान का आना।
- फोटो : AI Image
सबसे रोमांचकारी दृश्यों में से एक था संजीवनी बूटी लेकर हनुमान का आना। मैदान के सामने खड़ी पीली दो मंजिला इमारत उस समय बहुत ऊंची लगती थी। उसकी छत से मंच तक मोटी रस्सी बांधी जाती और हनुमान का रूप धरे लिटिल भारद्वाज संजीवनी बूटी का पहाड़ लेकर रस्सी के सहारे नीचे उतरते। दृश्य शुरू होते ही दर्शक खड़े हो जाते और पूरा मैदान ‘जय श्रीराम’ के नारों से गूंज उठता।
खास बात यह थी कि रामलीला में मुस्लिम कलाकार भी होते थे। उनके बिना रामलीला का मंचन अधूरा रहता था। राम-सीता विवाह से लेकर रावण के दरबार तक जोकर के भेष में शरीफ (टिल्लू) की हास्य प्रस्तुति श्रोताओं को बांधे रखती थी। कलाकारों के संवाद और मंच के पर्दे के पीछे सबसे कड़ी मेहनत मुस्लिम कलाकार मंगा की रहती थी।
साथ ही सभी कलाकार स्थानीय होते थे। मंचन की तैयारी करीब दो महीने पहले से शुरू हो जाती। कलाकार अपने रोजमर्रा के काम के साथ रिहर्सल करते और गांव के लोग पर्दे के पीछे से लेकर मंच तक अपनी भूमिका निभाते। मारहरा की रामलीला की पहचान गांव की सीमाओं से बाहर तक थी। आसपास के गांवों से महिलाएं और बच्चे ट्रैक्टरों में भरकर पहुंचते। हाथरस, एटा और कासगंज जैसे शहरों से भी लोग कमांडर जीप और कारों से रामलीला देखने आते थे। उन दिनों यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे इलाके का सामुदायिक उत्सव था।
मंचन के बीच सड़क किनारे लगे चना-मुरमुरा, भेलपुरी और मूंगफली के ठेले भी अपना अलग आकर्षण रखते। रामलीला का मौसम यानी गुलाबी सर्दी की दस्तक। ठंडी हवा में भुनी मूंगफली की भीनी खुशबू दर्शकों को अपनी ओर खींचती। बच्चे लीला देखते और साथ में कुछ खाने की जिद करते। मैदान के बाहर की यह छोटी-सी दुनिया भी रामलीला की यादों का हिस्सा बन जाती।
वही पेड़ अशोक वाटिका बन जाता, वही मैदान अयोध्या और वही गांव के कलाकार राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और रावण। दर्शक और कलाकार के बीच की दूरी जैसे मिट जाती थी। यही रामलीला का लोक रंग था- मंच छोटा, साधन सीमित, लेकिन उसमें पूरा गांव समाया हुआ। कहानी राम की थी, आवाज गांव की और हर दृश्य में स्थानीय जीवन की अपनी छाप। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी रामकथा स्थानीय बोली, गीत, संगीत, वेशभूषा और लोक परंपराओं के रंग में सामने आती है। इसलिए रामलीला केवल रामायण का मंचन नहीं, बल्कि गांव की साझी स्मृति और जीवंत लोक संस्कृति का उत्सव भी है।
रामचरितमानस से लोकमंच तक
- फोटो : AI Image
रामचरितमानस से लोकमंच तक
रामलीला का अर्थ है ‘राम का नाटक’। इसमें गीत, कथा वाचन, संवाद और अभिनय के जरिए रामायण के प्रसंग प्रस्तुत किए जाते हैं। इसका आयोजन आमतौर पर शारदीय नवरात्र और दशहरे के आसपास होता है। अयोध्या, रामनगर, वाराणसी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी की रामलीलाएं अपनी अलग पहचान रखती हैं। देश के कई हिस्सों में रामलीला की कथावस्तु रामचरितमानस पर आधारित होती है।
गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में अवधी में इसकी रचना की। आमतौर पर रामलीला दस से बारह दिनों तक चलती है, जबकि वाराणसी के रामनगर की रामलीला कई प्रसंगों के साथ करीब एक महीने तक चलने के लिए प्रसिद्ध है। दशहरे पर राम-रावण युद्ध और रावण दहन के साथ इसका चरम आता है। हालांकि, असली रंग उन दिनों में दिखाई देता है जब पूरा समुदाय मंच, पोशाक, मुखौटे, पुतले, रोशनी और संगीत की तैयारियों में जुटा रहता है।
कुमाऊं में गीत-संगीत के साथ रामकथा
उत्तराखंड की कुमाऊंनी रामलीला में लोक संगीत और गायन की खास भूमिका है। रामकथा के प्रसंग स्थानीय बोली और संगीत शैली के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। अल्मोड़ा और आसपास के क्षेत्रों में चली आ रही इस परंपरा में कलाकारों के साथ स्थानीय गायक और वादक भी प्रस्तुति का हिस्सा होते हैं। इस तरह मंच पर रामकथा के साथ कुमाऊं की अपनी सांस्कृतिक पहचान भी दिखाई देती है।
उत्तर-पूर्व में स्थानीय रंग
उत्तर-पूर्व के कई हिस्सों में रामकथा स्थानीय भाषाओं, लोकगीतों और क्षेत्रीय परंपराओं के साथ प्रस्तुत की जाती है। यहां वेशभूषा, संगीत और मंच सज्जा में स्थानीय संस्कृति की छाप दिखाई देती है। यानी कहानी वही रहती है, लेकिन उसे कहने का अंदाज क्षेत्र के साथ बदल जाता है।
बुंदेली से भीली और मेवाती तक
- फोटो : AI Image
बुंदेली से भीली और मेवाती तक
मध्य भारत की बुंदेली रामकथा में लोकभाषा, गीत और किस्सागोई का रंग मिलता है। वहीं भीली रामकथा में आदिवासी लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है। स्थानीय बोली और संगीत के जरिए रामायण के प्रसंग समुदाय की अपनी सांस्कृतिक दुनिया से जुड़ते हैं। राजस्थान और हरियाणा के कुछ इलाकों में मेवाती रामकथा भी लोक अभिव्यक्ति का हिस्सा है। यहां मौखिक कथावाचन और स्थानीय लोक परंपराओं के जरिए रामकथा पीढ़ियों तक पहुंचती रही है।
ओडिशा से खेरिया तक
ओडिशा में रामलीला स्थानीय नाट्य शैलियों, संगीत और धार्मिक परंपराओं के साथ सामने आती है। वहीं खेरिया क्षेत्र की लीला समेत कई लोक रूप बताते हैं कि रामकथा किसी एक मंचीय शैली तक सीमित नहीं रही। देश के अलग-अलग अंचलों में इसके रूप बदलते हैं, लेकिन हर जगह स्थानीय भाषा और संस्कृति इसे अपना बना लेती है।
डिजिटल दौर में नई चुनौती
- फोटो : AI Image
डिजिटल दौर में नई चुनौती
टेलीविजन, फिल्मों और डिजिटल माध्यमों ने मनोरंजन के तौर-तरीके बदल दिए हैं। इसका असर पारंपरिक रामलीलाओं पर भी पड़ा है। कई जगह दर्शकों की संख्या और नई पीढ़ी की भागीदारी पहले जैसी नहीं रही। इसके बावजूद रामलीला की खासियत कायम है, यह सिर्फ देखने की चीज नहीं, मिलकर निभाने वाली लोक परंपरा है। कुमाऊंनी, बुंदेली, भीली, मेवाती, ओडिशा या किसी अन्य क्षेत्रीय शैली में जब रामकथा मंच पर आती है, तो उसके साथ उस इलाके की भाषा, संगीत, कला और जीवन भी दिखाई देता है। यही वजह है कि देश की रामलीलाएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की विविध लोक संस्कृति का जीवंत मंच भी हैं।
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।