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पीएम कुसुम 2.0 में एग्रीवोल्टाइक्स: सोलर पैनल संग छांव वाली फसलों को भी मिले सब्सिडी, तो बढ़ेगी आय, घटेगा आयात

प्रो. एन. रघुराम, जैव प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 15 Oct 2026 01:54 PM IST
सार

सौर ऊर्जा के विस्तार के साथ भारत को सीमित जमीन पर सोलर पैनल और खेती का संतुलन साधना होगा। एग्रीवोल्टाइक्स इसका रास्ता दिखाता है, जिसमें पैनलों के नीचे खेती होती है। पीएम-कुसुम 2.0 में इसे बढ़ावा देते हुए सब्सिडी को सोलर पैनल के साथ छांव में उगने वाली फसलों तक बढ़ाया जाए तो किसान की आय बढ़ेगी और आयात पर निर्भरता घटेगी।

एग्रीवोल्टाइक्स सुनने में आकर्षक लगता है, पर इसे धरातल पर उतारते समय विज्ञान को समझना जरूरी है।
एग्रीवोल्टाइक्स सुनने में आकर्षक लगता है, पर इसे धरातल पर उतारते समय विज्ञान को समझना जरूरी है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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आज पूरी दुनिया कोयले और पेट्रोल-डीजल जैसे पारंपरिक ईंधनों को पीछे छोड़कर सौर ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रही है। लेकिन, भारत के सामने एक दिलचस्प उलझन खड़ी हो गई है कि इतने बड़े पैमाने पर सोलर पैनल लगाने के लिए जमीन आएगी कहां से? हमारे देश में जमीन सीमित है, और खेती, उद्योग, रियल एस्टेट और खनन के बीच इसे लेकर पहले से ही खींचतान मची हुई है। ऐसे में अगर उपजाऊ कृषि भूमि पर सिर्फ सोलर पार्क बना दिए जाएं, तो देश खाएगा क्या?

भोजन और ऊर्जा की लड़ाई का हल
भोजन और ऊर्जा के बीच इसी टकराव का एक समाधान एग्रीवोल्टाइक्स को माना जा रहा है। खेतों में एक तय ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाना और उन्हीं के नीचे उसी जमीन पर खेती जारी रखना एग्रीवोल्टाइक्स का उदाहरण है। भारत सरकार पीएम कुसुम योजना के आगामी दूसरे चरण में एग्रीवोल्टाइक्स को एक अहम हिस्से के तौर पर शामिल करने जा रही है, जिसके तहत किसानों को इसे अपनाने पर सरकारी सब्सिडी मिलेगी।

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जमीन की कमी से बड़ी ग्रिड की चुनौती
एग्रीवोल्टाइक्स की जरूरत समझने के लिए पहले भारत की बिजली व्यवस्था की एक बुनियादी दिक्कत समझनी होगी। हमारा पावरग्रिड पुराने समय में कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांट के हिसाब से डिजाइन किया गया था, जो लगातार एक समान बिजली देते हैं। सौर ऊर्जा के साथ ऐसा नहीं है। सौर ऊर्जा सिर्फ दिन में बनती है, रात में इसका उत्पादन नहीं होता। अगर बादल छा जाते हैं तो सौर बिजली का उत्पादन कम हो जाता है।

जब राजस्थान या गुजरात जैसे राज्यों में हजारों एकड़ के विशाल सोलर पार्क एक साथ सैकड़ों मेगावाट बिजली ग्रिड में भेजते हैं, तो अक्सर ट्रांसमिशन लाइनें और ट्रांसफार्मर इतना भारी लोड नहीं झेल पाते, जिससे ग्रिड फेल होने या तार जलने का खतरा पैदा हो जाता है। यही वजह है कि कई बार सरकारों को मजबूरी में इन बड़े सोलर प्लांट्स को दिन के समय बिजली बनाने से रोकना पड़ता है।

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चीन ने इस समस्या को सुलझाने के लिए पहले अपना ग्रिड मजबूत किया, फिर सोलर पैनल लगाए। लेकिन, भारत में सोलर उत्पादन क्षमता तो तेजी से बढ़ गई, ग्रिड का ढांचा अभी भी पीछे है। ऐसे में एक ही जगह विशाल सोलर पार्क लगाने के बजाय, छोटे स्तर पर खेतों में बिखरे हुए सोलर पैनल लगाना कहीं ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ रास्ता साबित हो सकता है।

किसानों को भी मिलेगा फायदा
पीएम कुसुम 2.0 का मुख्य जोर विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा पर है यानी बिजली वहीं बनाई जाएगी, जहां उसकी खपत होनी है। इस योजना के तहत सरकार खेतों में सोलर पैनल लगाने के लिए किसानों को वित्तीय सब्सिडी देगी।

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किसान इस बिजली से अपने ट्यूबवेल और दूसरे कृषि उपकरण चला सकते हैं, जिससे वे सरकारी बिजली आपूर्ति पर निर्भरता घटा सकते हैं और खर्चे में भारी बचत कर सकते हैं। जरूरत पूरी होने के बाद बची अतिरिक्त बिजली को वे ग्रिड को वापस बेच भी सकते हैं, जिससे खेती की आय के साथ-साथ एक अतिरिक्त नियमित कमाई भी हो सकती है। हालांकि, ग्रिड की मौजूदा सीमाओं को देखते हुए किसानों को इसे केवल बचत के एक जरिये के तौर पर देखना ही समझदारी होगी। अभी इसे आमदनी के प्रमुख स्रोत के रूप में देखना सही नहीं होगा। 

हर फसल इस छांव के लायक नहीं
एग्रीवोल्टाइक्स सुनने में जितना आकर्षक लगता है, इसे धरातल पर उतारते समय विज्ञान को समझना उतना ही जरूरी है। हर फसल सोलर पैनल की छांव में नहीं उगाई जा सकती। यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि किसी फसल को कितनी धूप चाहिए।

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भारत में सबसे ज्यादा जमीन पर उगाई जाने वाली फसलों में गेहूं, धान, मक्का, गन्ना, सूरजमुखी और कपास शामिल हैं, जिनको सीधी और तेज धूप चाहिए होती है। अगर इन्हें घने सोलर पैनल के नीचे उगाया जाए, तो इनकी पैदावार में 10% से 30% तक की भारी गिरावट आ सकती है। सेब और नाशपाती के कुछ पेड़ भी छांव में अच्छे फल नहीं देते। इस तरह, पारंपरिक अनाज वाली फसलों के लिए यह मॉडल बहुत फायदेमंद साबित नहीं होता।

यह मॉडल इन फसलों के लिए वरदान
सोलर पैनल के नीचे पनपने के लिए वे फसलें सबसे बेहतर मानी जाती हैं, जिन्हें कम धूप और ज्यादा नमी की जरूरत होती है क्योंकि पैनल के नीचे तापमान कम रहता है और मिट्टी की नमी जल्दी नहीं सूखती। इस वातावरण में उगने वाली हाई-वैल्यू फसलों में शामिल हैं:
  • पालक, सलाद पत्ता, पुदीना, धनिया और बेसिल जैसी पत्तेदार सब्जियां व जड़ी-बूटियां। 
  • आलू, मूली, चुकंदर, गाजर, टमाटर (खासकर चेरी टमाटर), शिमला मिर्च, ब्रोकली, पत्तागोभी और प्याज। दिलचस्प बात यह है कि चेरी टमाटर और शिमला मिर्च की पैदावार छांव में भी 20% से 90% तक बढ़ती देखी गई है। 
  • हल्दी और अदरक जैसी फसलें, जो कम धूप में भी तेजी से पनपती हैं। 
  • मशरूम, जिसे वैसे भी अंधेरे और नमी की जरूरत होती है, इसलिए यह एग्रीवोल्टाइक्स के लिए एकदम फिट बैठता है। 
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दलहन बन सकता है असली गेम-चेंजर
एग्रीवोल्टाइक्स में दलहन यानी दालों की खेती एक बड़ा आर्थिक बदलाव ला सकती है। भारत आज भी अपनी जरूरत की लगभग आधी दालें और खाद्य तेल विदेशों से मंगाता है। दालों की खासियत यह है कि ये सोलर पैनल की छांव में आसानी से उगाई जा सकती हैं। अगर सरकार किसानों को सोलर पैनल के साथ-साथ दालें उगाने के लिए भी प्रोत्साहित करे, तो इससे किसानों की कमाई बढ़ने के साथ-साथ देश का आयात बिल भी घटेगा, और मिट्टी की उर्वरक क्षमता में भी सुधार होगा।

बिजली बेचने से भी ज्यादा जरूरी है कोल्ड स्टोरेज और ग्रीन अमोनिया
खेती में किसान की सबसे बड़ी हार तब होती है, जब उसकी उगाई फसल बाजार तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती है। आलू, टमाटर और प्याज जैसी जल्दी खराब होने वाली फसलों के दाम रोज ऊपर-नीचे होते रहते हैं और मजबूरी में किसान को फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है।

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अगर ग्रिड अस्थिर होने के कारण बिजली 
खरीदने से मना कर दे, तो किसान उस सौर ऊर्जा का क्या करेगा? इसका सबसे बेहतरीन उपाय उसी बिजली का इस्तेमाल गांव में ही करना है। किसान इस अतिरिक्त बिजली से अपने खेतों के पास छोटे कोल्ड स्टोरेज चला सकते हैं। इसके साथ ही एक और क्रांतिकारी तकनीक ग्रीन अमोनिया के उपयोग से जुड़ी है।

सोलर पैनल से बनी बिजली का इस्तेमाल कर पानी से हाइड्रोजन और हवा से नाइट्रोजन निकालकर इन्हें मिलाने से ग्रीन अमोनिया गैस बनाई जा सकती है। इसके दो बड़े फायदे हैं - एक तो इसका इस्तेमाल कोल्ड स्टोरेज को ठंडा रखने वाली गैस के रूप में हो सकता है, और दूसरा इसे कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल कर यूरिया जैसी खाद तैयार की जा सकती है, जो खेतों में इस्तेमाल होती है। अगर कोल्ड स्टोरेज बन जाए, तो किसान टमाटर, धनिया या बेरीज को तुरंत बेचने की मजबूरी से बचकर, बाजार में दाम ऊंचे होने पर बेच सकेगा।

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पीएम कुसुम 2.0 के तहत एग्रीवोल्टाइक्स शानदार कदम है, लेकिन इसे सिर्फ सोलर पैनल पर सब्सिडी देने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। सब्सिडी के इस पैकेज में सोलर पैनल के साथ ही छांव में उगने वाली दलहन जैसी जरूरी फसलों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

(देवेश सारस्वत से बातचीत पर आधारित यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के अक्तूबर 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
 
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