बायोइकोनॉमी ग्रामीण भारत के लिए रोजगार, पर्यावरण और पलायन का समाधान बन सकती है। स्थानीय स्तर पर छोटे प्रयोग गांव के युवाओं को सम्मानजनक आय दे सकते हैं, खेती और पशुपालन को फिर से जोड़ सकते हैं और विकास को जमीन से जोड़ सकते हैं।
कुछ वर्ष पहले मैंने ग्रामीण भारत का एक ऐसा मॉडल देखा, जो किसी बड़े उद्योग घराने की देन नहीं था, बल्कि जमीन से उपजा एक व्यावहारिक प्रयोग था। स्वच्छता और कचरा प्रबंधन की जिस मुहिम ने वर्ष 2014 के बाद देश में रफ्तार पकड़ी, उसी की गोद से यह प्रयोग निकला था। गांव के परिवार अपने मवेशियों का गोबर एक केंद्र पर जमा करते थे। जो परिवार पूरे महीने रोज लगभग 20 किलो गोबर देता, उसे महीने के अंत में नकद पैसे नहीं, बल्कि एक रसोई गैस सिलेंडर मुफ्त मिलता था।
यह सुनने में साधारण लगता है, लेकिन गरीब परिवार के लिए हजार रुपये की सीधी बचत बहुत मायने रखती है। असली तस्वीर तब सामने आती है जब हम उस इकाई की आर्थिकी समझते हैं। उस गोबर संग्रह और खाद बनाने के केंद्र का प्रबंधक 30 हजार रुपये महीना कमाता था। उसके साथ दो सहायक थे, उन दोनों में प्रत्येक को 15 हजार रुपये मिलते थे। यानी एक ही गांव के कचरे से 60 हजार रुपये की नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई थी। सवाल यह है कि ऐसी बायोइकोनॉमी आज भी अपवाद क्यों बनी हुई है!
साइकिल की दूरी और पलायन का गणित
ग्रामीण विकास की चर्चा होते ही हम खेती तक सिमट जाते हैं, लेकिन पलायन के मूल कारणों को समझने से चूक जाते हैं। एक युवक गांव में पांच हजार कमाकर दो हजार बचाता है। शहर जाकर वह 15 हजार कमाता है, लेकिन खर्चों के बाद तीन हजार ही बचा पाता है। बचत का यह मामूली अंतर ही उसे गांव छोड़ने पर मजबूर करता है। अगर गांव के पास ही, साइकिल से जाने लायक दूरी पर, खाद निर्माण, फसल प्रसंस्करण या बागवानी से दस से बारह हजार रुपये कमाने का अवसर हो, तो कोई युवक शहर क्यों जाएगा। पलायन रोकने का रास्ता महानगरों में नहीं, बल्कि गांव को कृषि आपूर्ति तंत्र से जोड़ने में है।
खेती और पशुपालन का टूटा हुआ रिश्ता
भारतीय खेती की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारी दो बड़ी सफलताएं एक दूसरे से अलग हो गईं। हरित क्रांति ने फसलों को बढ़ाया और श्वेत क्रांति ने दुग्ध उत्पादन को। लेकिन इस प्रक्रिया में खेती और पशुपालन का प्राकृतिक रिश्ता टूट गया। पहले खेत का अवशेष पशु खाते थे और पशुओं का गोबर खेत की उर्वरता बढ़ाता था। आज किसान पराली जला रहा है और बड़े दुग्ध फार्म गोबर नालों में बहा रहे हैं। नदियां प्रदूषित हो रही हैं और मिट्टी कमजोर पड़ती जा रही है। बायोइकोनॉमी का मूल उद्देश्य इसी टूटे चक्र को फिर से जोड़ना है। जिस दिन कचरे से पोषक तत्व निकालकर दोबारा मिट्टी तक पहुंचने लगे, उस दिन खेती की आधी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएंगी।
निर्यात का मोह और बंजर होती जमीन
हम चावल के निर्यात पर गर्व करते हैं, लेकिन एक किलो चावल उगाने में हजारों लीटर पानी खर्च होता है। इसका अर्थ यह है कि हम अनाज नहीं, अपना भूजल बाहर भेज रहे हैं। दूसरी ओर चीन जैसे देश ने तय किया है कि वह मिट्टी और पानी बचाने के लिए निर्यात घटाएगा और घरेलू खपत को प्राथमिकता देगा। विडंबना यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी शाकाहारी आबादी होने के बावजूद भारत में प्रोटीन की कमी है। हम पानी खपाने वाली फसलें उगा रहे हैं और दालें बाहर से मंगा रहे हैं। बायोइकोनॉमी का मतलब केवल अधिक उगाना नहीं, बल्कि समझदारी से उगाना भी है।
छोटे समाधान और बड़ी संभावनाएं
बायोइकोनॉमी कोई कठिन विज्ञान नहीं है। इसके लिए बड़ी मशीनों से अधिक छोटे और स्थानीय उपायों की जरूरत है। केरल के गुरुवायुर मंदिर में निकलने वाला जैविक कचरा खाद बनकर किसानों तक पहुंचता है। यहां तक कि गरीब देशों में भी मानव और पशु अपशिष्ट से खाद बनाने की परंपरा जीवित है। हमें गांव के युवाओं को कृषि उद्यमी बनाना होगा। खाद निर्माण, भंडारण, दाल मसालों की पैकिंग जैसे काम अगर गांव में हों, तो मुनाफा भी गांव में रहेगा। आज कच्चा माल गांव से निकलता है और लाभ शहर में सिमट जाता है।
आने वाला दशक इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपने जैविक संसाधनों का कितना समझदारी से उपयोग करते हैं। भारत के पास विविध मिट्टियां हैं, विशाल पशुधन आबादी है और युवा-शक्ति है। जब गांव का युवा कचरे को कमाई में बदल पाएगा और शहर की ओर भागने के बजाय अपने कस्बे में सम्मानजनक रोजगार पाएगा, तभी विकसित भारत का सपना सच होगा।
60 हजार रुपये कमाने वाला गोबर गैस केंद्र का प्रबंधक अपवाद नहीं, बल्कि भविष्य का मानक होना चाहिए।