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दृष्टिकोण: धान और गेहूं पर फोकस ने यूरिया पर निर्भर बनाया, दलहन-तिलहन एमएसपी से मिलेगा समाधान

प्रो. एन. रघुराम हेड, सतत नाइट्रोजन और पोषक तत्व प्रबंधन केंद्र, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 12 Jan 2026 01:29 PM IST
सार

धान-गेहूं की एमएसपी पर अंधाधुंध खरीद ने किसानों को यूरिया पर निर्भर बना दिया है। इसका असल इलाज सब्सिडी में कटौती न होकर, दलहन और तिलहन पर प्रभावी एमएसपी देकर फसल चक्र को बदलना है।

देश का तीन-चौथाई उर्वरक सिर्फ चावल, गेहूं और थोड़ा हिस्सा गन्ना में खप जाता है।
देश का तीन-चौथाई उर्वरक सिर्फ चावल, गेहूं और थोड़ा हिस्सा गन्ना में खप जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली उर्वरक सब्सिडी 2.55 लाख करोड़ को पार कर चुकी है। सरकार क्रिसिल से समीक्षा करा रही है, पर सिर्फ खर्च घटाने की जल्दबाजी में उर्वरक जाल को नजरअंदाज कर रही है। धान-गेहूं की एमएसपी पर अंधाधुंध खरीद ने किसानों को यूरिया का गुलाम बना दिया है। इसका समाधान सब्सिडी में कटौती न होकर दलहन-तिलहन पर प्रभावी एमएसपी देकर फसल चक्र को बदलना है। ऐसा करें तो एक झटके में सब्सिडी 40 फीसदी तक कम हो जाएगी और मिट्टी भी स्वस्थ रहेगी। प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा था - ‘धरती मां को बचाना है तो यूरिया का उपयोग कम करना होगा।’ यह सिर्फ नैतिक अपील नहीं थी, बल्कि इस कथन में भारत की कृषि नीति की नई दिशा छिपी है। 

सब्सिडी का विकराल रूप
आज जब उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ने के साथ सरकार ने क्रिसिल जैसी एजेंसी से समीक्षा कराई है, तो सबसे बड़ा खतरा यही है कि समीक्षा सिर्फ वित्तीय कटौती तक न सिमट जाए, क्योंकि असल समस्या तो कहीं और छिपी है। पिछले एक दशक तक 70,000 करोड़ सालाना रहने वाली उर्वरक सब्सिडी कोविड और यूक्रेन युद्ध के बाद आसमान छूने लगी। सब्सिडी के खर्च को लेकर सरकार की चिंताएं भी जायज हैं, लेकिन क्रिसिल को दिए गए टर्म्स ऑफ रेफरेंस से लगता है कि रिपोर्ट पहले से तय निष्कर्ष की ओर ले जाई जा रही है - बस खर्च घटाओ, बढ़ाओ मत। यह आधा-अधूरा इलाज खतरनाक है।

सप्लाई साइड से आगे बढ़ने की जरूरत
अब तक सारा जोर सप्लाई साइड मैनेजमेंट पर रहा है ताकि यूरिया उपलब्ध रहे, सस्ता रहे। डिमांड साइड को छुआ तक नहीं गया। जबकि, यूरिया का 60-70 फीसदी हिस्सा फसल तक पहुंचता ही नहीं है; बल्कि वह हवा में उड़ जाता है या पानी में घुलकर भूजल और मिट्टी में प्रदूषण फैलाता है। इस बर्बादी को रोकने का प्रमुख हथियार सरकार के पास पहले से ही मौजूद है, जो फसलों की फसल खरीद नीति के रूप में जाना जाता है। 

देश का तीन-चौथाई उर्वरक सिर्फ चावल, गेहूं और थोड़ा हिस्सा गन्ना में खप जाता है - क्योंकि इन्हीं पर एमएसपी की गारंटी मिलती है। सरकार इन फसलों की खरीद ज्यादा करती है, किसान भी इन्हीं फसलों की खेती ज्यादा करते हैं और ज्यादा यूरिया डालते हैं। हम जरूरत से ज्यादा चावल-गेहूं पैदा करके दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक बन गए, मगर दुनिया के सबसे बड़े शाकाहारी देश होने के बावजूद आधी दालें और आधा खाद्य तेल आयात करते हैं। यही उर्वरकों का फंदा है और हम इसमें खुद ही फंसे हुए हैं।

दालें लौटेंगी तो सब्सिडी घटेगी 
दालें और तिलहन फलीदार फसलें हैं, जो हवा से नाइट्रोजन लेकर अपनी जरूरत खुद पूरी करती हैं और मिट्टी में भी नाइट्रोजन छोड़ती हैं। धान की फसल में 120-150 किलो प्रति हेक्टेयर यूरिया चाहिए, तो दालों में सिर्फ 20-25 किलो की जरूरत पड़ेगी। एक सीजन में दाल बोई जाए तो उस सीजन में यूरिया की खपत 80 फीसदी तक कम हो सकती है। अगर देश में अनाज और दालों का अनुपात आधा-आधा हो तो साल भर में यूरिया की खपत 40 फीसदी तक कम हो सकती है - सब्सिडी भी घट जाएगी।

नीति में बस एक बदलाव
सरकार को सिर्फ अपनी खरीद नीति बदलनी है। धान-गेहूं की अंधाधुंध खरीद थोड़ी कम करनी होगी और दलहन-तिलहन पर प्रभावी एमएसपी लागू करना होगा। किसान खुद उर्वरक जाल से बाहर निकल जाएंगे। मिट्टी स्वस्थ होगी, देश दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भर बनेगा और प्रधानमंत्री का लाल किले से किया गया वादा पूरा हो जाएगा। फसल चक्र बदलकर सब्सिडी का बोझ हमेशा के लिए 40 से 50 फीसदी कम किया जा सकता है। इसके लिए उर्वरक के कुचक्र को तोड़ना होगा, तभी धरती मां सचमुच बचेगी।
 
(यह लेख मूल रूप से अमर उजाला गांव जंक्शन पत्रिका के दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया है।)

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