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Mahila Kisan Diwas 2026 Women Are The Backbone Of Farming Yet Missing From Land Records
महिला किसान दिवस पर बड़ा सवाल : खेती-बाड़ी की धुरी कहलाने वाली महिलाएं सरकारी रिकॉर्ड में कब कहलाएंगी किसान
डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Thu, 15 Oct 2026 01:15 PM IST
सार
Mahila Kisan Diwas 2026: खेती की रीढ़ कहलाती हैं महिलाएं, फिर भी जमीन के कागज में नाम नहीं होने से किसान की पहचान और योजनाओं से उनकी दूरी बनी हुई है। महाराष्ट्र के नए कानून ने सुधार की राह खोली है, पर चुनौती अब प्रमाणपत्र को फार्मर आईडी, कर्ज, बीमा और योजनाओं से जोड़ने की है। जानिए, विस्तार से...
सिर्फ 14 प्रतिशत जोतें महिलाओं के नाम, पर खेती की रीढ़ वही हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
किसान के बारे में सोचें तो आमतौर पर आंखों के सामने खेत में काम करता कोई पुरुष ही उभरकर आता है। लेकिन, बुआई से लेकर निराई, गुड़ाई एवं फसल की कटाई, पशुपालन और फसल के बाद तमाम कार्यों तक बड़ी संख्या में महिलाएं खेती की रीढ़ बनी हुई हैं। फिर भी सरकारी रिकॉर्ड और योजनाओं की दुनिया में उनकी पहचान अक्सर किसी और नाम के पीछे छिप जाती है। यही वह अंतर है, जिसे अब गंभीरता से देखने की जरूरत है।
किसी महिला का खेत में काम करना और उसका सरकारी रिकॉर्ड में किसान होना, दोनों अब तक एक ही बात नहीं रहे। जमीन जिसके नाम है, किसान की पहचान भी अक्सर उसी से जुड़ जाती है। नतीजा यह कि जिस महिला ने उसी खेत में बराबर श्रम किया, उसके हिस्से में किसान होने की औपचारिक पहचान नहीं आती।
महाराष्ट्र ने इस समस्या को संबोधित करने की कोशिश की है। राज्य ने महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण अधिनियम-2026 के तहत महिला किसान प्रमाणपत्र की व्यवस्था शुरू की है। महाराष्ट्र कृषि विभाग के पोर्टल पर इसके लिए आवेदन और प्रमाणपत्र की प्रक्रिया उपलब्ध कराई जा रही है।
कुछ समय पूर्व पीएम मोदी भी महिला श्रमिकों के सम्मान में उनके साथ चाय की पत्तियां तोड़ने बागान में उतर पड़े थे।
- फोटो : गांव जंक्शन
संयोग यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किया है। ऐसे में महिला किसान की पहचान और अधिकार पर बहस को केवल एक राज्य की पहल के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक कृषि नीति के सवाल के रूप में देखने का अवसर है।
जमीन नहीं, खेती में काम को बनाया आधार
महाराष्ट्र की इस नई व्यवस्था की बड़ी बात यही है कि महिला किसान की पहचान के लिए जमीन का उसके नाम होना जरूरी नहीं रखा गया है। राज्य के पोर्टल के अनुसार, खेती या उससे जुड़ी गतिविधियों में कम से कम एक सीजन काम करने वाली 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिला इसके दायरे में आ सकती है।
इसमें फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, बागवानी, मुर्गीपालन, रेशम पालन और कृषि उपज के प्रसंस्करण जैसे काम भी शामिल हैं। इसका मतलब सीधा-सा है कि किसान की पहचान केवल जमीन से नहीं, उसके काम से भी तय हो सकती है।
यूपी की महिलाओं ने किया कमाल। महिला समूह की पांच कंपनियों का कारोबार साढ़े पांच हजार करोड़ के पार।
- फोटो : AI Image
यह बदलाव उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो परिवार की जमीन पर खेती करती हैं, बंटाई या किराये की जमीन पर काम करती हैं, खेत मजदूरी करती हैं या कृषि से जुड़े दूसरे काम संभालती हैं, लेकिन जमीन के रिकॉर्ड में उनका नाम नहीं है।
महाराष्ट्र में प्रमाणपत्र के लिए आवेदन के बाद ग्राम सभा या संबंधित स्थानीय निकाय की प्रक्रिया रखी गई है। इस पहल के तहत पात्र महिला स्वयं आवेदन कर सकती है और ग्राम सभा भी पात्र महिला को पहचान का प्रमाण दे सकती है। प्रमाणपत्र मिलने के बाद अपील की व्यवस्था भी रखी गई है।
समस्या सिर्फ पहचान की नहीं, सिस्टम की
यहां असली सवाल थोड़ा बड़ा है। अगर महिला खेती करती है, लेकिन जमीन उसके नाम नहीं है, तो वह सिर्फ एक प्रमाणपत्र से किसान कैसे बनेगी? यहीं भारतीय कृषि व्यवस्था की पुरानी संरचना सामने आती है। देश में कृषि से जुड़े अनेक प्रशासनिक कामों में भूमि रिकॉर्ड महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।
गेहूं की कटाई करतीं महिला किसान।
- फोटो : सोशल मीडिया
जब किसान की पहचान जमीन के रिकॉर्ड से तय होती है, तो महिला का नाम वहां न होने का असर आगे भी दिखाई देता है। कर्ज, बीमा, सब्सिडी, कृषि सलाह, तकनीक और दूसरी सरकारी सहायता तक पहुंच में इसका असर दिखाई देता है।
कृषि जनगणना 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के पास परिचालन कृषि जोतों का हिस्सा करीब 14 प्रतिशत था। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र भी वैश्विक स्तर पर रेखांकित करता है कि कृषि में महिलाओं की भागीदारी उनकी भूमि स्वामित्व हिस्सेदारी की तुलना में कहीं अधिक है। इससे स्पष्ट है कि खेती में महिलाओं की मौजूदगी और जमीन के कागज में उनकी मौजूदगी के बीच एक बड़ा फासला है।
मशरूम उत्पादन से भी महिलाएं बड़ी संख्या में जुड़ी हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
काम बढ़ा, लेकिन पहचान नहीं बढ़ी
हाल के वर्षों में कृषि श्रम बाजार में महिलाओं की भूमिका बढ़ी है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि अब भी महिलाओं के लिए रोजगार का बड़ा आधार है। लेकिन, काम में हिस्सेदारी बढ़ना और निर्णय लेने या संसाधनों पर अधिकार बढ़ना एक ही बात नहीं है।
यही वजह है कि केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी महिलाएं खेती में काम कर रही हैं। यह भी देखना होगा कि उनमें से कितनी महिलाएं किसान के रूप में दर्ज हैं, कितनों के पास फार्मर आईडी है, कितनों को संस्थागत कर्ज मिला और कितनी महिलाएं कृषि योजनाओं की लाभार्थी बनीं। यहीं आंकड़ों में दिखाई देने वाला अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।
मसलन, पीएम-किसान की आधिकारिक व्यवस्था अभी भी भूमिधारी किसान परिवारों पर आधारित है और पात्र किसान परिवार को सालाना ₹6,000 की आय सहायता दी जाती है। इसलिए, जमीन के रिकॉर्ड में महिला का नाम न होने की स्थिति में योजना की मौजूदा संरचना और महिला की वास्तविक कृषि भूमिका के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
महिला किसानों के कंधों पर टिकी है खेती और खाद्य सुरक्षा की कमान। वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष घोषित किया गया है।
- फोटो : AI Image
महाराष्ट्र की पहल का महत्व इस बात में है कि उसने महिला किसान की पहचान को जमीन के स्वामित्व से अलग करके देखने का रास्ता खोला है। राज्य ने इसके लिए अलग पोर्टल भी शुरू किया है और महिला किसान प्रमाणपत्र को कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों में काम के आधार पर देने की व्यवस्था बनाई है। लेकिन, अब असली परीक्षा कानून लागू होने के बाद शुरू होती है।
पहली जरूरत तो यही है कि पहचान की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए। गांव की महिलाओं को अगर यह पता ही नहीं होगा कि ऐसा कोई प्रमाणपत्र मिल सकता है, तो कानून कागज पर ही रह जाएगा। ग्राम पंचायत, स्वयं सहायता समूहों, कृषि विभाग और स्थानीय महिला संगठनों के जरिए व्यापक जानकारी पहुंचानी होगी। दूसरी बड़ी जरूरत डेटाबेस को आपस में जोड़ने की होगी।
महिला किसान प्रमाणपत्र अलग रिकॉर्ड बनकर रह गया तो समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। इसे कृषि डेटाबेस, फार्मर आईडी और दूसरी प्रासंगिक डिजिटल प्रणालियों से जोड़ना जरूरी होगा।
आंध्र प्रदेश में बनीं 213 महिला मत्स्य सहकारी समितियां।
- फोटो : AI Image
महाराष्ट्र के मौजूदा आवेदन पोर्टल में भी परिवार के किसी सदस्य के फार्मर आईडी और एग्रीस्टैक से किसान के विवरण के सत्यापन का प्रावधान दिखाई देता है। यह संकेत देता है कि नई पहचान को मौजूदा डिजिटल कृषि व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में काम हो रहा है।
तीसरी जरूरत योजनाओं तक वास्तविक पहुंच सुनिश्चित करने की है। प्रमाणपत्र अपने आप किसी योजना का लाभ नहीं देता। महाराष्ट्र का पोर्टल भी स्पष्ट करता है कि संबंधित योजनाओं की अपनी पात्रता शर्तें रहेंगी। इसलिए, अगला कदम यह होना चाहिए कि पात्र महिला की पहचान होने के बाद उसे संबंधित योजनाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था भी बने।
70 वर्षीय बिहार की किसान चाची बनीं महिला सशक्तिकरण की मिसाल।
- फोटो : AI
प्रमाणपत्र से अधिकार तक पहुंचना होगा
महिला किसान को पहचान देने का अर्थ सिर्फ एक नया प्रमाणपत्र जारी करना नहीं है। असली बदलाव तब होगा जब वह पहचान खेत की वास्तविक अर्थव्यवस्था में दिखाई दे। जिस महिला ने फसल उगाई है, उसे कृषि सलाह भी मिले।
जिस महिला ने पशुपालन किया है, उसे पशुधन से जुड़ी सेवाओं और ऋण तक पहुंच भई मिले। जिस महिला ने खेत में वर्षों श्रम किया है, उसे प्रशिक्षण, तकनीक और बाजार से जोड़ने का रास्ता भी दिलाना होगा।
इसके लिए राज्यों के बीच भी एक समान ढांचा विकसित किया जा सकता है। महिला किसान की स्पष्ट परिभाषा, प्रमाणपत्र की मानक प्रक्रिया और ऐसे डेटाबेस जिन्हें अलग-अलग कृषि योजनाओं में इस्तेमाल किया जा सके। इससे हर योजना के लिए महिला को अपनी पहचान फिर से साबित करने की जरूरत कम होगी।
महिला किसान
- फोटो : सोशल मीडिया
सवाल यह है कि रिकॉर्ड में कौन दिखाई देगा?
महिलाएं अचानक किसान नहीं बनी हैं। वे लंबे समय से खेतों में हैं। बदला सिर्फ इतना है कि अब नीति और कानून उनकी भूमिका को अधिक स्पष्ट रूप से पहचानने की कोशिश कर रहे हैं। महाराष्ट्र का कानून इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रयोग है। लेकिन, इसकी सफलता कानून की किताब में नहीं, गांव के खेत में दिखाई देगी।
कितनी महिलाओं को प्रमाणपत्र मिला? कितनों की फार्मर आईडी बनी और कितनों को कृषि ऋण मिला? कितनी महिलाएं बीमा, सब्सिडी, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ीं? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि महिला किसान को सिर्फ पहचान मिली है या उसके साथ अधिकार और अवसर भी जुड़े हैं।
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