अगर सरकार को सब्सिडी बिल कम करना है, तो दालों पर न केवल एमएसपी लानी चाहिए, बल्कि उनकी खरीद को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसी तरह, सरसों और मूंगफली जैसी पारंपरिक तिलहनी फसलों पर एमएसपी पर फोकस किया जाना चाहिए। पाम ऑयल को प्रोत्साहन न तो किसानों के हित में है और न ही उपभोक्ताओं के हित में। किसान को तो पैसा चाहिए। हरित क्रांति के समय जब खाद्यान्न सुरक्षा पर जोर दिया गया और किसानों को गेहूं और चावल उगाने के लिए कृषि इन्पुट देने के साथ उनकी फसल खरीदने की व्यवस्था की गई, तो उन्होंने इन दो फसलों की बंपर पैदावार करके दिखा दिया। इसी तरह, अब अगर उन्हें दलहन और तिलहन उगाने के लिए कहा जाएगा, तो वो ऐसा करने में पूरी तरह से सक्षम हैं। हरियाणा, यूपी, राजस्थान समेत कुछ राज्यों ने तो दालों को एमएसपी पर खरीदना शुरू किया है। इसे और प्रोत्साहन देने की जरूरत है।
एमएसपी की सूची में शामिल फसलों के उत्पादन और उनकी सरकारी खरीद के आंकड़ों का अध्ययन करेंगे, तो वास्तविक तस्वीर उभरकर आएगी। यह पता चल जाएगा कि इन फसलों का उत्पादन कितना होता है, और एमएसपी पर इनकी खरीद कितनी मात्रा में की जा रही है। गेहूं और चावल की एमएसपी पर खरीद काफी कम होती है। ऐसा नहीं है कि सरकार शत प्रतिशत खरीद कर रही है। चावल और गेहूं की 60 से 70 फीसदी खरीद मात्र 3-4 राज्यों में होती है। लेकिन, कुल खाद्यान्न उत्पादन की खरीद की बात करें, तो वो आधा भी नहीं होता है। जितना भी अनाज खरीदा जाता है, वो मुख्य रूप से तीन-चार राज्यों से ही खरीदा जाता है, क्योंकि वो हरित क्रांति वाले राज्य हैं। इन राज्यों में गेहूं, चावल, और महाराष्ट्र एवं यूपी में गन्ने की फार्मिंग को प्रमुखता से प्रोत्साहित किया गया। इससे फसल विविधीकरण के लक्ष्य को धक्का लगा है। खेती की लागत बढ़ी है और उर्वरक, सिंचाई एवं कीटनाशक जैसे इन्पुट्स पर किसानों का खर्च बढ़ने के साथ-साथ मिट्टी सहित पूरे कृषि पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान हुआ है।
अब तो प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए मिशन भी शुरू किया गया है। गोपालन और गोशालाओं को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। गोशालाओं से निकलने वाले गोबर और गोमूत्र के उपयोग को प्रभावी तरीके से सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीकृत योजना बनाई जाए, तो इससे भी फर्टिलाइजर बिल को कम करने में मदद मिल सकती है। ऐसा होता है तो खेती में रसायनों के प्रदूषण से भी मुक्ति में मिल सकती है। अभी तक नाइट्रोजन, पोटाश और फॉस्फोरस जैसे रासायनिक उर्वरकों के रूप में फसलों को एक तरह से स्टेपल फूड दिया जाता रहा। बाकी सभी इन्पुट्स; चाहे वो गोबर हो; मल्च हो; बायोचार हो या गोमूत्र; सभी को अतिरिक्त इन्पुट माना जाता रहा है। आज स्थिति ये है कि रासायनिक उर्वरक मुख्य पोषक तत्व के रूप में फसलों को दिए जाते हैं, जबकि ऑर्गेनिक अपशिष्ट आधारित इन्पुट्स को टॉप-अप के रूप में दिया जाता है। वास्तव में, स्थिति इसके ठीक उलट होनी चाहिए। जितने भी ऑर्गेनिक अपशिष्ट हैं, उनको फर्टीलाइजर के रूप में उपयोग किया जाए, तो बहुत-सारी समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा। उर्वरकों पर दी जाने वाली 1.5 लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी का बिल इससे काफी हद तक कम हो सकता है और पर्यावरण को भी फायदा होगा। साथ ही, रसायन-मुक्त खाद्य उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकेगा।
रासायनिक खाद का उपयोग तो सिर्फ दवा के रूप में पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए होना चाहिए। इसके लिए, एक नीतिगत ढांचा बनाने की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र में इन्पुट मैनेजमेंट को लेकर इस तरह के बजटीय प्रावधानों को किए जाने की आवश्यकता है। कृषि इनपुट मैनेजमेंट में इस तरह के बजटीय तर्क की आवश्यकता को हमें समझना होगा। आज भी गाय के गोबर और गोमूत्र जैसे जैव अपशिष्ट का उपयोग पूरी तरह नहीं हो पाता है। गाय और भैंस के गोबर का उपयोग 25-30 फीसदी से अधिक नहीं हो पाता। यह संभव है कि गोशालाओं को बढ़ावा मिलने के बाद इस आंकड़े में थोड़ा सुधार हुआ हो, पर स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अंततः ये अपशिष्ट प्रदूषण का कारण ही बनते हैं। ये तो सिर्फ पशुओं के गोबर की बात है।
पशुओं के मलमूत्र का उपयोग तो एक प्रतिशत से अधिक नहीं होता है। जबकि, पशुओं का यूरिन खेती में यूरिया का विकल्प बन सकता है। फिलहाल, तो पुनर्चक्रण की व्यवस्था नहीं होने के कारण 90 से 100 फीसदी मानवीय एवं पशुओं के मलमूत्र को हम बर्बाद कर रहे हैं। इसके पुनर्चक्रण के लिए, तकनीक उपलब्ध है, जिसका इस्तेमाल नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड्स और जर्मनी जैसे देशों में हो रहा है। इनमें कई देश तो ऐसे हैं, जो हमारे देश के कई राज्यों से भी छोटे हैं, लेकिन उनका डेयरी और मांस का कारोबार हमारे देश से भी अधिक बड़ा है। ये देश गोबर और पशुओं का मलमूत्र हाइजीनिक तरीके से इकट्ठा करते हैं, पैक करते हैं और इसकी आपूर्ति करते हैं। यूरोप में तो सिंथेटिक फर्टिलाइजर की खपत बहुत कम है।
जैव अपशिष्ट के एकत्रीकरण से लेकर इसकी प्रोसेसिंग और आपूर्ति के लिए आवश्यक तकनीकों को भारत में लाने के लिए बजटीय प्रावधानों की जरूरत है। उदाहरण के लिए, टेक्नोलॉजी इम्पोर्ट को टैक्स फ्री किया जा सकता है। इसी तरह, पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले कंटेनर निर्माताओं को भी प्रोत्साहन दिया जा सकता है। गोबर और मलमूत्र को इकट्ठा करने के लिए चेन स्थापित की जा सकती है, ताकि साफ-सुथरे तरीके से इनका एकत्रीकरण करके प्रोसेसिंग की जा सके। किसानों के गलव्स, पाइप और अन्य इन्पुट्स बनाने वाले निर्माताओं को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। कोई विदेशी कंपनी यदि हमारे यहां आकर इस क्षेत्र में काम करना चाहती है, तो उसे भी प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इस तरह के बहुत सारे प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं, ताकि हम अपने मैन्योर मैनेजमेंट को 25 फीसदी से बढ़ाकर 95 फीसदी या उससे भी अधिक कर सकें।
कृषि में रूपांतरण किसी एक मैजिक माइंड से नहीं आने वाला है। एमएसपी के लाभार्थी कुछेक राज्य ही रह गए हैं। जब तक फसल विविधीकरण नहीं किया जाता, तब तक कृषि क्षेत्र में उपजे कुचक्र से निकलने के लिए और कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है। दलहन उत्पादन और मैन्योर मैनेजमेंट में ही फिलहाल रास्ता नजर आता है।