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राष्ट्रीय जीन बैंक से लेकर गांवों के बीज बैंक तक : सुरक्षित भविष्य के लिए समुदाय और सरकार की साझा पहल जरूरी

प्रो. एन. रघुराम, प्रमुख - सतत नाइट्रोजन और पोषक तत्व प्रबंधन केंद्र, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विवि Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 19 May 2025 01:25 PM IST
सार

बीज संरक्षण (Seed Conservation) के काम में सरकारी तंत्र के साथ-साथ समुदाय की भागीदारी को भी सशक्त बनाना जरूरी है। सामुदायिक बीज बैंक (Community Seed Banks) पारिस्थितिक तंत्र के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करने और लचीलेपन को बढ़ावा देते हुए, देसी बीजों (Indigenous seeds) तक किसानों की पहुंच को सुनिश्चित करते हैं। 

बीज संरक्षण की सामुदायिक गतिविधियों के साथ-साथ सरकारी स्तर पर भी बीजों के संरक्षण का काम भी जरूरी।
बीज संरक्षण की सामुदायिक गतिविधियों के साथ-साथ सरकारी स्तर पर भी बीजों के संरक्षण का काम भी जरूरी। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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इस साल बजट में दूसरा राष्ट्रीय जीन बैंक बनाने की घोषणा की गई है। राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के पूर्व निदेशक कुलदीप सिंह बताते हैं कि यह प्रस्ताव नया नहीं है, यह काफी पुराना है। इस दौरान सिविल सोसाइटीज के बीच आशंका बढ़ गई कि शायद सरकार बीजों के संरक्षण में निजी भागीदारों को शामिल करना चाहती है। हालांकि, कुलदीप सिंह बताते हैं कि बीजों के संरक्षण के काम में इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं था। यह पूरी तरह से सार्वजनिक फंडिंग पर आधारित प्रस्ताव था, जिसे स्वीकृति दी गई। दूसरा जीन बैंक बनाने के पीछे एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि नई दिल्ली में स्थापित जीन बैंक की अपनी एक सीमा है। इसीलिए, इसका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी किया जाना चाहिए। 

बेहद अहम हैं बीज संसाधन 
कुछ समय पूर्व जब सीरिया पर बमबारी हुई, तो वहां के बीज बैंक को भी निशाना बनाया गया। नॉर्वे में स्वालबार्ड नामक जगह पर प्राकृतिक रूप से ठंडी परिस्थितियों में जीन बैंक बनाया गया है, जिससे कूलिंग पर होने वाले खर्च की बचत होती है। इसी तर्ज पर, भारत में भी लद्दाख और लाहौल स्पीति जैसे क्षेत्रों में जीन बैंक बनाने की संभावनाएं तलाशी जाती रही हैं। लेकिन, सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण ऐसे इलाकों में जीन बैंक बनाना, महत्वपूर्ण बीज संसाधनों की सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरा माना जाता है। जिस तरह किसी वेबसाइट की एक मिरर साइट होती है, उसी तरह बीजों का एक कलेक्शन दूसरे स्थानों पर भी होना चाहिए, जिससे उनकी सुरक्षा से जुड़े जोखिम कम हो सकते हैं। इसमें मौजूदा सरकारी तंत्र के साथ-साथ समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। 
बीजों के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका भी उभरकर आ रही है।
बीजों के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका भी उभरकर आ रही है। - फोटो : सोशल मीडिया
कैसे होता है बीजों का संरक्षण?
बीजों के संरक्षण के दो तरीके हैं। एक होता है इन-सीटू-कन्जर्वेशन, जिसमें स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र में बीजों का संरक्षण किया जाता है। यदि इसमें कोई अंतर देखने को मिलता है, तो स्थानीय समुदाय बीजों को एक-दूसरे से साझा करके उनको बढ़ावा देने का काम करते रहते हैं। इससे बीज प्रजातियों का प्रवाह पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है। इसी को इन-सीटू-कन्जर्वेशन कहते हैं। ग्रामीण समुदाय इसको सदियों से करते रहे हैं।

कृषि में आजकल महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है। ऐसे में, बीजों के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका भी उभरकर आ रही है। ऐसी कई महिलाएं दक्षिण भारत में डेक्कन डेवेलपमेंट सोसाइटी के साथ जुड़कर बीजों के संरक्षण का काम सामुदायिक स्तर पर कर रही हैं। 

दूसरी ओर, कोल्ड स्टोरेज आधारित बीजों का संरक्षण सरकारी स्तर पर भी किया जाता है। इसे एक्स-सीटू-कन्जर्वेशन कहते हैं, जो केंद्रीकृत व्यवस्था पर आधारित होता है। इसका एक उदाहरण नई दिल्ली स्थित एनबीपीजीआर में स्थापित जीन बैंक है, जहां देश और दुनिया से प्राप्त बीजों की प्रजातियों को एकत्र करके उनका संरक्षण किया जाता है। यदि कोई इन बीज प्रजातियों को प्राप्त करके उनका उपयोग करना चाहता है, तो कुछ औपचारिकताएं पूरी करके इन्हें प्राप्त कर सकते हैं।

इस साल जब दूसरा जीन बैंक बनाने की घोषणा की गई, तो सिविल सोसाइटी संस्थाओं को ये डर था कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिये बीज संसाधनों को कहीं निजी कंपनियों का न सौंप दिया जाए। अभी तक ऐसी स्थिति दिखाई नहीं देती और भविष्य में क्या होगा, यह अभी कहना मुश्किल है। हालांकि, सिविल सोसाइटी से इस तरह के सवाल उठते हैं, तो कन्फ्यूजन की स्थिति में समय के साथ स्पष्टीकरण भी मिलते रहते हैं, जो बेहद जरूरी प्रक्रिया है। 
बीज खेती का प्रमुख आधार होता है।
बीज खेती का प्रमुख आधार होता है। - फोटो : सोशल मीडिया
समुदाय की भूमिका बने मजबूत 
गैर-सरकारी संगठनों की ओर से सबसे पहला सवाल तो यही उठ रहा है कि एनबीपीजीआर का जो पहले से एक स्थापित तंत्र है, उसको बढ़ाने की आज आवश्यकता क्यों है? बीजों के समुदाय आधारित इन-सीटू-कन्जर्वेशन को सपोर्ट करने का प्रावधान पहले से पॉलिसी में है। एक अहम पहलू यह भी है कि यदि एनबीपीजीआर जैसे पहले से स्थापित केंद्रीकृत तंत्र को बढ़ावा दिया जाता है, तो बीजों के संरक्षण में समुदाय की भागीदारी और पिछड़ सकती है। इसीलिए, मौजूदा तंत्र के विस्तार के साथ-साथ समुदाय को भी सशक्त किया जाना चाहिए, ताकि वो भी केंद्रीय तंत्र के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बीजों के संरक्षण में अपना योगदान समान रूप से दे सकें। 

साथ चलें समुदाय और सरकार 
सरकारी फंडिंग पर आधारित बीज बैंक का संचालन हमारे कानून में है। साथ ही, बीजों को लेकर हमारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं भी हैं। ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते किए गए हैं, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि भारत अन्य देशों के साथ बीजों का आदान-प्रदान करता रहेगा। इसी तरह, दूसरे देशों से जब भी बीजों की कोई नई प्रजाति भारत में लाई जाती है, तो वह पहले नेशनल जीन बैंक में आती है, और फिर वहां उसकी जांच-परख किए जाने के बाद, उसको आगे बढ़ावा दिया जाता है। इसलिए, बीज संरक्षण की सामुदायिक गतिविधियों के साथ-साथ सरकारी स्तर पर भी बीजों के संरक्षण का काम भी समान रूप से आवश्यक है। दोनों की आवश्यकता समान रूप से है। हालांकि, इन दोनों प्रयासों के बीच के अंतर को कम करने की आवश्यकता है, जो समुदायों को सशक्त बनाकर ही संभव है। 

अभी तक सामुदायिक स्तर पर बीजों के संरक्षण का जो काम हो रहा है, उसका राष्ट्रीय स्तर का डाटा हमारे पास नहीं है। जैसे - कितने सामुदायिक बीज बैंक काम कर रहे हैं, उनके पास कितनी प्रजातियों के बीज किस मात्रा में उपलब्ध हैं, बीजों के गुणधर्म क्या हैं, वो लंबी अवधि में तैयार होने वाले बीज हैं या फिर छोटी अवधि के हैं, उनसे उपज कितनी मिलती है, किसी को वो बीज चाहिए, तो किससे प्राप्त किया जा सकता है, ऐसे कई सवालों के जवाब डाटा के अभाव में नहीं मिल पाते। इसलिए, सामुदायिक बीज बैंकों का भी इन्फॉर्मेशन डाटाबेस जरूरी है। इसका एक कॉमन फॉर्मेट बनना चाहिए, ताकि एकीकृत डाटाबेस बनाकर उसमें सामुदायिक बीज बैंकों को जोड़ा जा सके। 
गेहूं की कटाई करतीं महिला किसान।
गेहूं की कटाई करतीं महिला किसान। - फोटो : सोशल मीडिया
संरक्षण और स्थानीय स्वामित्व 
समुदाय-आधारित बीज संरक्षण से जुड़ी पहलों के सफल होने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि वे स्थानीय आवश्यकताओं और ज्ञान से प्रेरित होती हैं। किसान, जिनके पास अक्सर विशिष्ट फसलों के साथ पीढ़ियों का अनुभव होता है, देसी बीजों के सबसे पहले संरक्षक होते हैं। समुदाय की भागीदारी बीजों के संरक्षण, भंडारण और खेती से संबंधित ज्ञान और कौशल को साझा करने के लिहाज से भी अहम है। बीज मेलों, बीजों के आदान-प्रदान और शैक्षिक कार्यशालाओं के माध्यम से इस काम में समुदायों को शामिल करने से स्थानीय ज्ञान भी बढ़ता है।

समुदाय के सदस्य बीज संरक्षण की प्रक्रिया के सभी चरणों में सक्रिय रूप से शामिल होते हैं, तो नियोजन और कार्यान्वयन से लेकर मूल्यांकन तक वे इसकी दीर्घकालिक सफलता में योगदान देते हैं। यही नहीं, स्थानीय बीज बैंक किसानों को अपने समुदाय के भीतर से ही बीज प्राप्त करने की सहज सुविधा भी दे सकते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर बीजों की सुरक्षा और विविधता को बढ़ावा मिलता है।

जलवायु परिवर्तन संग तालमेल
समुदाय-आधारित बीज संरक्षण से ऐसे बीजों के चयन और संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है, जो स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त हैं और जिनमें जलवायु परिवर्तन से लड़ने की बेहतर क्षमता होती है। इससे यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसानों के पास बदलती परिस्थितियों के अनुकूल और अपनी आजीविका बनाए रखने के लिए सही बीजों तक पहुंच बनी रहे। बीजों के संरक्षण में औपचारिक तंत्र और अनौपचारिक स्तर पर समुदाय द्वारा किए जाने वाले प्रयासों के बीच जो अंतर पैदा हुआ है, उसे कम करने के लिए काम करने की जरूरत है।

यह मामला सीधे तौर पर छोटे किसानों से लेकर उन प्रगतिशील किसानों से जुड़ा हुआ है, जो बीजों के सेलेक्शन से लेकर उनकी ब्रीडिंग और विस्तार के काम में लगे हुए हैं। उनकी क्या दिक्कते हैं और उनकी क्या उम्मीदें हैं, इसे भी समझने की जरूरत है, ताकि बीजों के संरक्षण में सरकारी तंत्र के साथ-साथ समुदाय की भूमिका को भी मजबूत बनाया जा सके।
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