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From Wheat And Rice To Maize India S Next Green Revolution Is About Value Not Volume
दृष्टिकोण : बिहार की मक्का पट्टी से मिली सीख, गांव के पास प्रोसेसिंग से किसान को स्थिर बाजार और स्थानीय रोजगार
अनिल किशोरपुरिया, एग्रीटेक उद्यमी
Published by: Umashankar Mishra
Updated Wed, 14 Oct 2026 05:35 PM IST
सार
हरित क्रांति गेहूं और चावल के अधिक उत्पादन पर केंद्रित थी, पर आज मक्का नया सवाल लेकर खड़ा है कि हम जो उगा रहे हैं, उससे ज्यादा कैसे कमाएं। यह फर्क खेती को देखने का नजरिया बदल सकता है।
मक्का बना औद्योगिक फसल। स्टार्च से दवा और कागज तक, हर टन में छिपी है कमाई।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत 50 साल पहले खाद्य संकट के मोड़ पर खड़ा था। हरित क्रांति ने गेहूं-चावल, सिंचाई और उन्नत बीजों के सहारे देश को खाद्य आत्मनिर्भर बनाया। आज भारत फिर एक ऐसे दोराहे पर है, लेकिन इस बार कहानी के केंद्र में मक्का है।
पिछले एक दशक में भारत का मक्का उत्पादन 2.26 करोड़ टन से बढ़कर वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 5.509 करोड़ टन (तीसरा अग्रिम अनुमान) पहुंच गया। पिछले साल के 4.341 करोड़ टन के मुकाबले 1.168 करोड़ टन की छलांग दर्ज हुई, जो हाल के इतिहास में एक साल की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। आज मक्का भारतीय कृषि में सबसे गतिशील और बहुआयामी फसलों में शामिल है, हालांकि इसके वास्तविक पैमाने को उद्योग और नीति-निर्माता अब भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं।
इस बदलाव के केंद्र में बिहार है, जहां 2024-25 में करीब 66 लाख टन मक्का उत्पादन हुआ, जिससे राज्य देश के प्रमुख मक्का पट्टियों में शामिल हो गया। क्षेत्र में बढ़ती प्रोसेसिंग क्षमता के साथ मक्का की संभावनाएं उद्योग जगत की कल्पना से भी आगे बढ़ रही हैं।
मक्का दूसरी फसलों से अलग क्यों है?
गेहूं और चावल ने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाया। अब मक्का पूरे देश की खेती को औद्योगिक रंग दे सकता है। जहां ज्यादातर मुख्य अनाज सीधे भोजन के रूप में खाए जाते हैं, वहीं मक्का असल मायने में एक औद्योगिक फसल है। इससे स्टार्च, स्वीटनर, ग्लूकोज, माल्टोडेक्सट्रिन, पशु आहार और तमाम तरह के उत्पाद बनते हैं, जिनका दायरा पैकेज्ड फूड से लेकर दवाओं और कागज तक लगातार फैल रहा है।
प्रत्येक टन मक्का में अधिक कमाई की कई संभावनाएं छिपी होती हैं, जो भारतीय उद्योग के सामने बड़ा अवसर बनकर खड़ा है। पहली हरित क्रांति जमीन से ज्यादा फसल उगाने व अनाज आत्मनिर्भरता से जुड़ी थी। अब अगली क्रांति प्रत्येक टन उपज से ज्यादा मूल्य प्राप्त करने पर केंद्रित हो रही है।
गांवों के आसपास औद्योगीकरण
लंबे समय तक कृषि प्रगति को प्रति एकड़ उपज और प्रति हेक्टेयर उत्पादन से मापा जाता रहा। अब इस कहानी को खेत से आगे ले जाने का समय है। जब फसल के उत्पादन क्षेत्र के पास ही प्रोसेसिंग की व्यवस्था खड़ी होती है, तो किसानों के लिए खुले बाजार पर निर्भर रहने के बजाय स्थिर और व्यवस्थित मांग के द्वार खुलते हैं।
प्रोसेसिंग प्लांट के साथ ही लॉजिस्टिक्स, गोदाम, पैकेजिंग, परिवहन एवं कुशल तकनीकी काम रोजगार के अवसर पैदा करते हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था सहारा देते हैं। इससे ऐसे ग्रामीण क्षेत्र, जो कच्चा माल बाहर भेजते रहे हैं, अपनी क्षमता और रोजगार के अवसर खुद विकसित करने लगते हैं।
यह बदलाव व्यापक असर पैदा करता है। खेती और इससे जुड़े काम भारत की अर्थव्यवस्था के करीब पांचवें हिस्से के बराबर हैं और लगभग 46% कामगारों को रोजगार देते हैं। ऐसे में कृषि का औद्योगीकीकरण किसी एक राज्य या फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका और गांवों के आर्थिक नक्शे को बदल सकता है।
बिहार बना जीता-जागता उदाहरण
बिहार की मक्का पट्टी कई मायनों में यह दिखा चुकी है कि खेती पर आधारित उद्योग गांवों की सूरत कैसे बदल सकते हैं। जो राज्य लंबे समय से सिर्फ कृषि उत्पादन के लिए जाना जाता रहा, वह धीरे-धीरे खुद अपना प्रोसेसिंग और मूल्यवर्धन ढांचा खड़ा कर रहा है और कच्चा माल उत्पादन करने की अपनी क्षमता को विनिर्माण की बढ़त में बदल रहा है।
यही वह मॉडल है, जिस पर कहीं ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। सवाल सिर्फ मक्का के ज्यादा उत्पादन का नहीं है, बल्कि यह बात भी अहम है कि आसपास एक ऐसा तंत्र खड़ा होना चाहिए, जहां प्रत्येक टन मक्का ज्यादा काम आए, ज्यादा रोजगार पैदा करे और अपने उत्पादन क्षेत्र से बाहर निकलने से पहले ही ज्यादा से ज्यादा मूल्यवर्धन जोड़ ले।
प्रोसेसिंग अपने आप किसान की आय नहीं बढ़ा देती और न ही कोई एक कंपनी या एक प्लांट अकेले पूरी भारतीय खेती को औद्योगिक बना सकता है। बेहतर तरीके से जुड़ी वैल्यू चेन मांग के नए रास्ते खोल सकती हैं, खेत से फैक्ट्री तक फसल पहुंचाने में होने वाली फिजूलखर्ची घटा सकती हैं और उत्पादन स्थल के पास ही अधिकतम मूल्यवर्धन के अवसर पैदा कर सकती हैं। यही दूसरी हरित क्रांति की असली ताकत है।
यह कोई एक झटके में हुआ करिश्मा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विकसित हुआ वह दृष्टिकोण है, जिसके जरिए देश अब फसल के वास्तविक मूल्य को समझने और बढ़ाने की ओर बढ़ रहा है। पहली हरित क्रांति ने भारत को ज्यादा उगाना सिखाया, अब अगला अध्याय सिखाएगा कि इस पैदावार के आसपास बेहतर ढांचा खड़ा कर, ज्यादा प्रोसेसिंग और मूल्यवर्धन कैसे किया जाए।
(लेखक रीगाल रिसोर्सेज के संस्थापक व प्रबंध निदेशक हैं।)
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