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Decision To Buy Pulses Will Reduce The Fertilizer Subsidy Bill Crop Diversity Will Also Get A Boost
PULSES: 100 फीसदी दलहन खरीद से कम हो सकता है उर्वरक सब्सिडी बिल, फसल विविधता को भी मिलेगा बढ़ावा
प्रो. एन. रघुराम, प्रमुख, सतत नाइट्रोजन और पोषक तत्व प्रबंधन केंद्र, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विवि, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 12 Apr 2025 04:50 PM IST
सार
100 फीसदी दलहन खरीद के सरकार के फैसले से उर्वरक सब्सिडी बिल कम कर सकते हैं और फसल विविधता को भी बढ़ावा मिल सकता है। उर्वरक सब्सिडी से बचने वाले पैसे का उपयोग फलीदार फसलों की उपज बढ़ाने, अनुसंधान और बीज उत्पादन जैसे कार्यों में हो सकता है।
100 दलहन खरीदने का सरकार का फैसला टिकाऊ भविष्य की एक नई राह तैयार कर सकता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अनाज और फलियों के अनुपात को लेकर अध्ययन हुए हैं। हरित क्रांति की मिसाल पेश करने वाले उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और मेक्सिको के क्षेत्रों में अनाज और फलियों का अनुपात लगभग आधा-आधा है। लेकिन, हमारे यहां यह अनुपात लगभग 90:10 है यानी हम 90 फीसदी अनाज पैदा करते हैं, जबकि फलियों का उत्पादन 10 फीसदी ही है। सही मायनों में तो फलियों की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है। यह दक्षिण एशिया का डेटा है, जिसमें भारत भी शामिल है। भारत की स्थिति तो शायद इससे भी बदतर है।
कहने का आशय यही है कि जिन देशों में हरित क्रांति की शुरुआत हुई, वहां भी फलियों के उत्पादन को नजरअंदाज नहीं किया गया। इसका फायदा उन्हें उर्वरकों के उपयोग के मामले में भी मिलता होगा, क्योंकि जिस जमीन पर फलियों की खेती होती है, वहां अगली फसलों में उर्वरकों के उपयोग की जरूरत कम पड़ती है। भारत में हम उन्हीं देशों से सीखकर हरित क्रांति लाए, लेकिन अनाज और फलियों के जिस अनुपात को उन देशों ने बनाकर रखा है, उसे हम अपने यहां लागू करने से चूक गए। इसका परिणाम यह हुआ कि अनाज और फलियों का अनुपात हमारे यहां 90:10 पर पहुंच गया, जो लगभग 50:50 होना चाहिए था।
दालों की 100% खरीद के साथ दलहन मिशन और तिलहन मिशन में नई जान फूंकने की कोशिशें बड़ा बदलाव ला सकती हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
एमएसपी से बड़ा है यह फैसला
यह सही है कि 1960 के दशक में खाद्यान्न के मामले में विदेशी निर्भरता के चलते अनाज उत्पादन पर अधिक जोर दिया गया। 1980 के दशक तक अनाज उत्पादन के मामले में भारत की स्थिति में सुधार हो चुका था, तो उसके बाद से ही हमें फलियों का उत्पादन बढ़ाने पर जुट जाना चाहिए था। अब भी देर नहीं हुई है और अनाज एवं फलियों के अनुपात में सुधार करके इस खामी को दुरुस्त कर सकते हैं। अब जो नीतिगत प्रयास शुरू हुए हैं, उसमें न सिर्फ दलहन की 100 फीसदी खरीद की बात कही जा रही है, बल्कि दलहन मिशन और तिलहन मिशन में नई जान फूंकने पर भी जोर दिया जा रहा है। सरकार का यह निर्णय फसलों की खरीद और एमएसपी से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इस पर ध्यान देने और निवेश बढ़ाने के साथ-साथ एक केंद्रित निर्देश वैज्ञानिकों को मिलना बेहद अहम है। इससे वैज्ञानिक बिरादरी को संदेश मिलेगा कि आपने जो उपलब्धि अनाज उत्पादन के मामले में प्राप्त करके दिखाई है, अब उसी तरह की सफलता फलीदार फसलों के मामले में भी अर्जित करनी है। भारतीय वैज्ञानिकों को जब भी किसी मामले में लक्षित और स्पष्ट निर्देश के साथ निरंतर फंडिंग, राजनीतिक संरक्षण मिला है, तो उन्होंने अपनी क्षमता को साबित करके दिखाया है। हरित क्रांति से लेकर परमाणु एवं अंतरिक्ष कार्यक्रम और यहां तक कि वैक्सीन डेवेलपमेंट जैसे मामले इसकी मिसाल कहे जा सकते हैं। यह सक्सेस स्टोरी अब फलियों में लागू करने का वक्त आ गया है।
उड़द दाल
- फोटो : गांव जंक्शन
फलियों पर फोकस बढ़ाने की जरूरत
फसलों की खरीद और किसानों को उनकी उपज के लिए एमएसपी का भुगतान तो छोटी अवधि के उपाय हैं, जो इस बात को ट्रिगर करने में सहायक होता है कि किसान किस फसल की खेती का चयन करें। एमएसपी पर फसलों की खरीद इस मामले में किसानों के लिए प्रोत्साहन की तरह काम करती है। लेकिन, जमीनी स्तर पर भारत की दलहन के मामले में जो स्थिति है, उसे भी समझने की जरूरत है। दलहन की बात करें, तो इसकी कम उपज, सीमित रोग प्रतिरोधकता एवं सूखा सहन करने की कम क्षमता; ये कुछ ऐसे कारण हैं, जिसके कारण किसान दूसरी फसलों की ओर रुख करते हैं।
इसीलिए, अनाज की तरह दलहन में भी निरंतर फसल सुधार की आवश्यकता है। यह स्थापित तथ्य है कि दलहनी फलियां और तिल एवं मूंगफली जैसी फलीदार तिलहनी फसलों में अनाज की तरह फसल सुधार हमारे यहां नहीं हो पाया है, जिससे इनकी उपज, दाने का आकार, प्रोटीन क्वालिटी, रोग प्रतिरोधक क्षमता, ताप प्रतिरोधक क्षमता या सूखा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सके। इन सभी विषयों पर काम करने की जरूरत है।
फलियों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को जागरूक करने की जरूरत।
- फोटो : सोशल मीडिया
किसानों को करना होगा जागरूक
फलीदार फसलों में शामिल दालों को सबसे अधिक खाने वाला प्रमुख देश भारत ही है। हमारे यहां इसीलिए नवरत्न दाल का जिक्र होता है यानी कई दालों को हम एक साथ खाते हैं। दस से ज्यादा दालें हम हिंदुस्तान में खाते हैं। दालें हमारी सांस्कृतिक खाद्य विविधता का भी प्रतीक हैं। दालों में इतनी विविधता और किसी देश में नहीं मिलती है।
अब सवाल आता है कि किस इलाके में कौन-सी फलियां उगाई जाएं? कहने को तो हमारे यहां करीब 25 फलीदार फसलें हैं, जिसमें 10-12 तो सिर्फ दलहनी फसलें हैं। हर कृषि-जलवायु क्षेत्र और प्रत्येक मिट्टी के प्रकारों के लिए इन फलियों में से किसी न किसी फली की खेती जरूर उपयुक्त हो सकती है। उदाहरण के तौर पर बिहार में मक्का की जगह चना उगाएंगे, तो फायदा नहीं मिलेगा। लेकिन, विकल्प के तौर पर चना ही उगाएं यह जरूरी नहीं है।
हमारे पास तो फलीदार फसलों के 25 विकल्प हैं। यह संभव है कि इनमें से 10 विकल्प ऐसे हों, जो व्यवसायिक तौर पर फायदा पहुंचाने में अधिक सक्षम हों। हालांकि, इन फसलों के चयन का निर्णय सिर्फ किसानों पर छोड़ देना सही नहीं होगा, क्योंकि नई पीढ़ी के किसान अपने पूर्वजों के जमाने में जो फलियों पर आधारित खेती का रोटेशन होता था, उसको भूल चुके हैं। अब तो कई ऐसी दलहनी और अन्य फलीदार फसलें हैं, जिन्हें नई पीढ़ी ने देखा भी नहीं है।
जिन वैज्ञानिकों के पास इसके बारे में ज्ञान है, उनका रिसर्च फील्ड में लाना होगा। साथ ही, किसानों को भी फलीदार फसलों की खेती के फायदों के बारे में समझाना होगा कि इससे उर्वरक की खपत कम होगी, मिट्टी जैविक तत्वों की वृद्धि होगी, अगली फसल को भी फायदा होगा। किसानों को इसके वैज्ञानिक पहलुओं को भी बताना होगा। उन्हें बताना होगा कि अधिक उर्वरकों का उपयोग करने से मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया भी उसे ग्रहण करते हैं। जितना ज्यादा उर्वरक उपयोग होता है, मिट्टी में कार्बन की कमी होने का खतरा उतना ही अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया उसी कार्बन को खाते हैं। किसान तक इन नॉलेज को पहुंचाना जरूरी है।
कृषि विस्तार सेवाओं को मजबूत बनाना होगा, जो हाशिए पर पड़ी हुई हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
कृषि विस्तार सेवाओं की मजबूती
किसानों को बताने की जरूरत है कि उनके लिए किन फलियों की खेती सबसे अधिक उपयुक्त है। उन्हें यह भी बताना होगा कि उस विशेष फसल की कौन-सी प्रजाति की खेती करना अधिक फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए कृषि विस्तार सेवाओं को मजबूत बनाना होगा, जो हाशिए पर पड़ी हुई हैं। जबकि, प्लांट ब्रीडिंग और एग्रोनॉमी पर फोकस अधिक है। कृषि विस्तार वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन देना होगा, ताकि वो फील्ड में जाकर किसानों को समझाएं।
चुस्त-दुरुस्त हो क्रॉप ब्रीडिंग तंत्र
इसके बाद, क्रॉप ब्रीडर की जरूरत पड़ेगी, जो किसी क्षेत्र विशेष के लिए सबसे अधिक उपयुक्त फसल प्रजातियों के बीज तैयार करें। बीज कंपनियों की जरूरत होगी, जो बड़े पैमाने पर बीजों का उत्पादन करके उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करें। हिंदुस्तान की ज्यादातर बीज कंपनियां सार्वजनिक संस्थानों से निकले बीजों को तैयार करके ही बेचती हैं। लेकिन, इस मिशन के माध्यम से उन पर पूरी तरह निर्भर होना थोड़ा जोखिम भरा हो सकता है। सरकारी बीज कंपनियों के पास बीजों को बढ़ाने से लेकर भंडारण तक पूरा ढांचा है, जिसका उपयोग करें तो किसानों तक अच्छी गुणवत्ता के बीच रियायती दर पर पहुंचाए जा सकते हैं, जिसके लिए निजी क्षेत्र पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता।
दलहन की खेती से अगले सीजन अतिरिक्त नाइट्रोजन उर्वरक देने की जरूरत नहीं पड़ती।
- फोटो : गांव जंक्शन
उर्वरक बिल कम करने का टिकाऊ फॉर्मूला
गेहूं, चावल और गन्ने की फार्मिंग को पिछले कई दशकों से प्रमुखता से प्रोत्साहित किया जाता रहा है। इससे फसल विविधीकरण के लक्ष्य को धक्का लगा है। खेती की लागत बढ़ी है और रासायनिक उर्वरक, सिंचाई एवं कीटनाशक जैसे इन्पुट्स पर किसानों का खर्च बढ़ने के साथ-साथ मिट्टी सहित पूरे कृषि पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान हुआ है। जबकि, दलहन समेत अन्य फलीदार फसलों की खेती करते हैं, तो मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है। ऐसे में, अगले फसल सीजन में अतिरिक्त नाइट्रोजन उर्वरक देने की जरूरत नहीं पड़ती।
दलहनी फसलों को प्रोत्साहन दिया जाए, तो हमारा उर्वरक बिल कम हो सकता है। किसानों से 100 फीसदी दलहन की खरीद के ताजा फैसले से उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल कम करने में मदद मिलेगी। रासायनिक उर्वरकों की मांग कम होने पर जो पैसा बचेगा, उसका उपयोग फलियों का उत्पादन बढ़ाने से जुड़े अनुसंधान, बीज उत्पादन और कृषि विस्तार जैसे कार्यों में खर्च कर सकते हैं।
मिलेट्स को जिस तरह से प्रोत्साहन दिया गया, उसी तरह की पहल दलहन के मामले में भी कर सकते हैं।
- फोटो : प्रतीकात्मक
मिलेट्स मिशन की तरह बने एक नई मिसाल
दलहन और मिलेट्स के क्षेत्र में प्रमुखता से काम करने वाले प्रमुख संस्थानों में इक्रीसैट शामिल है, जिसने पीएम नरेंद्र मोदी के माध्यम से मिलेट्स ईयर घोषित कराने और मिलेट्स को दुनियाभर में पहुंचाने में भूमिका निभाई है। मिलेट्स को जिस तरह से प्रोत्साहन दिया गया, उसी तरह की पहल दलहन के मामले में भी कर सकते हैं। इस तरह की पहल से नई गति और दिशा मिल सकती है। इससे आगे काम करने के लिए एक नई पीढ़ी तैयार हो सकती है। कल जब इस पहल को आगे ले जाने की जरूरत होगी, तो प्रशिक्षित लोग तैयार रहेंगे।
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