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GM MAIZE: जीएम मक्का ट्रायल के चलते कृषि, पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर छिड़ी नई बहस

डॉ. निमिष कपूर, वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचार विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 11 Aug 2025 06:16 PM IST
सार

GM MAIZE: पंजाब में जीएम मक्का ट्रायल ने कृषि, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर नई बहस छेड़ दी है। इसमें शोध और राज्य में प्रतिबंधित खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट के बीच टकराव प्रमुख मुद्दा है।

जीएम फसलों पर विवाद बढ़ने के  साथ ही जनमानस में इसको लेकर भ्रम और डर भी फैल रहा है।
जीएम फसलों पर विवाद बढ़ने के साथ ही जनमानस में इसको लेकर भ्रम और डर भी फैल रहा है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा चालू खरीफ सीजन में शुरू किए गए जीन-संशोधित (जीएम) मक्का के फील्ड ट्रायल ने पंजाब में कृषि, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर नई बहस छेड़ दी है। यह विवाद किसानों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों को जीएम तकनीक अपनाने और इसके नियंत्रण पर नए सिरे से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या जीएम मक्का का ट्रायल सिर्फ शोध का हिस्सा है या फिर इसमें कुछ ऐसे निहित पहलू भी शामिल हैं, जो राज्य में ग्लाइफोसेट के प्रतिबंध से जुड़ी नीतियों से टकराते हैं? इस मामले के विभिन्न पक्षों को हम यहां समझने का प्रयास करेंगे।  

शोध से जुड़ी पहल और नियामक मंजूरी
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) ने स्पष्ट किया है कि जीएम मक्का के ट्रायल केवल शोध के लिए हैं, जिनका कोई वाणिज्यिक उपयोग नहीं है और न ही इसे बड़े पैमाने पर खेती के लिए तैयार किया जा रहा है। ये ट्रायल कैंपस में नियंत्रित क्षेत्र में किए जा रहे हैं और सभी सुरक्षा मानकों व प्रक्रियाओं का पालन हो रहा है।

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भारतीय जैव प्रौद्योगिकी विभाग की जैव प्रौद्योगिकी 
मूल्यांकन समिति और कृषि, वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञों वाली पंजाब सरकार की राज्य स्तरीय जैव सुरक्षा समिति ने जीएम मक्का के ट्रायल को मंजूरी दी है। यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि ये परीक्षण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हैं। 

पीएयू के वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि की चुनौतियों से निपटने के लिए नई तकनीक जरूरी है, जिसमें कम पानी की खपत वाले जीएम मक्का की खेती पंजाब के जल संकट को हल कर सकती है। यही नहीं, इसकी सफलता भविष्य की कृषि नीतियों को भी नया आकार दे सकती है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षा का सवाल 
जीएम-मुक्त भारत के लिए गठबंधन और अन्य कई पर्यावरण एवं सामाजिक संगठन जीएम मक्का के ट्रायल का विरोध कर रहे हैं। ये संगठन इस ट्रायल को पंजाब सरकार द्वारा खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ मानते हैं। आपको बता दें कि ग्लाइफोसेट एक खरपतवारनाशी है, जिसको कैंसरकारी और पर्यावरण के लिए हानिकारक मानकर राज्य सरकार ने इसे प्रतिबंधित किया है।

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जीएम मक्का की एक किस्म ग्लाइफोसेट-प्रतिरोधी है, जो खरपतवार को खत्म कर फसल को सुरक्षित रखती है। अब यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि जीएम मक्का के ट्रायल में ग्लाइफोसेट का उपयोग हो सकता है, जो राज्य के प्रतिबंध का उल्लंघन होगा। विरोधी समूह इसे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा मान रहे हैं।

विरोधी संगठन जैव सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव और पराग-संचरण से पारंपरिक फसलों में जीन रिसाव की चिंता भी जताते हैं। उनका मानना है कि इससे पारंपरिक खेती और किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

ग्लाइफोसेट प्रतिबंध और ट्रायल की वैधता
पंजाब में कैंसरकारी खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है, जिसका उपयोग या बिक्री करना अवैध है। ग्लाइफोसेट के उपयोग से जुड़ी आशंकाओं के संदर्भ में पीएयू का कहना है कि जीएम मक्का ट्रायल में ग्लाइफोसेट अनिवार्य नहीं है और यदि जरूरत पड़ेगी, तो कड़े नियमों और निगरानी के तहत ही इसका इस्तेमाल होगा। हालांकि, विरोधी पक्ष पीएयू के दावे से संतुष्ट नहीं है, उनका मानना है कि ग्लाइफोसेट-सहनशीलता और जीन परिवर्तनों का परीक्षण तभी संभव है, जब इस खरपतवारनाशी का उपयोग किया जाएगा। बिना ग्लाइफोसेट के यह ट्रायल अधूरा रहेगा, जिससे ट्रायल की वैधता और कानूनी स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।

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दुनियाभर में तीन दशकों से जीएम मक्का, सोयाबीन समेत कई फसलों पर शोध चल रहा है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि नियामक निरीक्षण के तहत जीएम फसलें मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं। भारत के कृषि वैज्ञानिक भी जीएम मक्का पर सतर्क हैं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से काम कर रहे हैं।

दशकों से चल रहे अंतरराष्ट्रीय शोध जीएम मक्का की सुरक्षा और प्रभाव को सिद्ध करते हैं। जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल एंड फूड केमिस्ट्री (2002) में प्रकाशित अध्ययन में कीट-प्रतिरोधक जीएम मक्का में फफूंद और विषाक्त पदार्थों की मात्रा पारंपरिक मक्का से कम पाई गई, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। टेलर एंड फ्रांसिस (2010) के अध्ययन में चूहों पर परीक्षण से पारंपरिक और जीएम मक्का की पोषक तत्व गुणवत्ता में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया।

यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (मार्च, 2025) 
ने पाया कि ग्लाइफोसेट-प्रतिरोधी जीएम मक्का का मानव या फिर पशु स्वास्थ्य पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इसके पोषण देने वाले गुण पारंपरिक मक्का के समान सुरक्षित हैं और पर्यावरणीय प्रभाव भी नगण्य है।

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चीन में जून 2025 के सात वर्षों के अध्ययन
ने साबित किया कि जीएम मक्का का वानरों की आंतों के सूक्ष्मजीव तंत्र या स्वास्थ्य पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं, स्लोवाकिया में तीन वर्षों के पर्यावरणीय अध्ययन में भी मिट्टी के सूक्ष्मजीवों पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पाया गया।

इंडियन जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी, 2025 में प्रकाशित शोध में राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के वैज्ञानिकों ने 50 पैकेज्ड मक्का उत्पादों की जांच की, जिनमें से 12 उत्पाद जीएम मक्का उपयोग वाले देशों से आयात किए गए थे। रियल-टाइम पीसीआर जैसी उन्नत तकनीक से परीक्षण में किसी भी अनधिकृत जीएम मक्का की मौजूदगी नहीं पाई गई।

ये सभी शोध बताते हैं कि जीएम मक्का न केवल पोषण और कीट-प्रतिरोध क्षमता से लैस है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है। ऐसे में, यह कहा जा सकता है कि नियंत्रित अनुसंधान के साथ इसे अपनाना भविष्य की कृषि जरूरतों के लिए लाभकारी हो सकता है। हालांकि, इसके लिए पारदर्शिता, सतर्कता और स्थानीय कानूनी-पर्यावरणीय नियमों का पालन जरूरी है, ताकि कृषि विकास और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन बना रहे।

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भविष्य की जरूरत नए विकल्पों की तलाश 
पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां ने पीएयू के ट्रायल को आवश्यक बताया है और कहा है कि नए कृषि विकल्प तलाशना भविष्य की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि मक्का कम पानी की खपत वाली फसल है और पंजाब के लिए यह फायदेमंद हो सकती है। मंत्री ने पीएयू के अनुसंधान पर भरोसा जताते हुए, विरोधी समूहों से कहा है कि वे वैज्ञानिक तथ्यों को समझें।

सरकार का यह भी कहना है कि सभी ट्रायल नियमों के तहत हो रहे हैं और किसी भी अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार किसानों के हित और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानती है।

जीएम मक्का के ट्रायल को लेकर उठ रही 
बहस यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि हमें वैज्ञानिक अनुसंधान और जन-सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। ऐसे में, सभी पक्षों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारदर्शिता और सतर्क नीति निर्माण के जरिए एक ऐसा रास्ता खोजना होगा, जो अनुसंधान की स्वतंत्रता और जनता की सुरक्षा - दोनों की गारंटी दे सके।

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तकनीक को खारिज करने से पहले मूल्यांकन जरूरी
जीएम फसलों पर विवाद बढ़ने के साथ ही जनमानस में इसको लेकर भ्रम और डर भी फैल रहा है। कई लोगों को जीएम फसलों के सेवन से एलर्जी, कैंसर और अन्य बीमारियों का डर सताता है, जबकि बहुत-से वैज्ञानिक इस डर को बिना ठोस प्रमाण के मात्र अफवाह बताते हैं। शोधकर्ता कहते हैं कि किसी भी तकनीक को खारिज करने से पहले उसका वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। 

यदि उचित ट्रायल और नियंत्रित प्रयोग से डाटा मिलता है कि कोई फसल सुरक्षित है तो उसे अपनाना चाहिए। इसके बिना, केवल डर और असहमति के कारण कृषि प्रगति रुक सकती है, जो किसानों के हित में नहीं है।
 
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