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भारत का भूजल संकट: पंचायतों के माध्यम से किया जा सकता है इस साझा संसाधन का संरक्षण

डॉ. निमिष कपूर, विज्ञान संचार विशेषज्ञ Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 17 Jun 2025 01:32 PM IST
सार

भारत का भूजल संकट गहरा हो रहा है। भूजल पर निजी कब्जे को बढ़ावा देने वाले पुराने कानून इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। सूखे कुओं की विरासत छोड़ने के बजाय हमें यह समझना होगा कि भूजल साझा संपत्ति है और ग्राम पंचायतें व समुदाय मिलकर ही इसे बचा सकते हैं।

जमीन के मालिक को भूजल का भी मालिक मान लेना समाज और पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है।
जमीन के मालिक को भूजल का भी मालिक मान लेना समाज और पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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कभी आपने सोचा कि कुएं, नल या हैंडपंप का पानी कहां से आता है? भारत की जीवनरेखा - भूमिगत जल - आज संकट के कगार पर है। दशकों से वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि भूजल स्तर गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है और हमारी इस पर निर्भरता अपने चरम पर है। फिर भी, हमारा कानूनी ढांचा 19वीं सदी की औपनिवेशिक सोच में जकड़ा हुआ है, जहां जमीन का मालिक भूजल का भी मालिक माना जाता है। यह सोच अवैज्ञानिक होने के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय रूप से विनाशकारी भी है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए सूखे कुएं छोड़ेंगे या फिर समय रहते जागेंगे?

जमीन मालिक को भूजल पर असीमित अधिकार देना इस संकट की जड़ है। शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के प्रोफेसर डॉ. फिलिप कुले ने इस पर गहरी चिंता जताई है। वह कहते हैं, भूजल निजी संपत्ति नहीं, बल्कि साझा संसाधन है। इसे न कोई व्यक्ति पूरी तरह हड़प सकता है, न ही राज्य इसका एकमात्र मालिक हो सकता है। फिर भी, हमारा कानून जमीन मालिकों को इतना पानी निकालने की छूट देता है कि पड़ोसी के कुएं सूख जाते हैं। यह व्यवस्था जलभृतों (जमीन के नीचे पानी के भंडार) के संरक्षण को नजरअंदाज करती है, जिसकी रक्षा के बिना भूजल बचाना असंभव है। 

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भूमिगत जल एक साझा संपत्ति 
भूजल साझा संपत्ति है, जिसे समुदाय की जिम्मेदारी बनाना होगा। डॉ. कुले सुझाते हैं कि सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत को भूजल पर लागू करना चाहिए। जबकि, आज तक इसे विधायी रूप में नहीं बदला गया है। हालांकि, कुछ राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर भूजल प्रबंधन अधिनियम बनाए हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अब भी व्यापक विधायी पहल नहीं हुई है। यह सिद्धांत कहता है कि भूजल न किसी व्यक्ति का है, न सिर्फ सरकार का - यह समुदाय की अमानत है। ग्राम पंचायतों और नगरीय निकायों को जलभृतों के संरक्षक की भूमिका मिलनी चाहिए। जब तक स्थानीय समुदायों को प्रबंधन की शक्ति नहीं मिलेगी, भूजल का संरक्षण और न्यायसंगत बंटवारा एक सपना ही रहेगा। सामुदायिक भागीदारी ही इस संकट का एकमात्र हल है। 

भूमिगत जल का नियमन अब भी जमीन मालिकों के उपयोग अधिकारों पर केंद्रित है। जल स्तर में तेजी से गिरावट और भूमिगत जल प्रदूषण की बढ़ती समस्या को दूर करने की कोशिशें भी जलभृत स्तर के संरक्षण पर केंद्रित न होकर इसके उपयोग को नियंत्रित करने वाले उपायों पर आधारित हैं।  जब हम धरती की सतह से नीचे खोदाई करते हैं, तो एक बिंदु ऐसा आता है, जहां मिट्टी या चट्टानें पूरी तरह पानी से भरी हुई होती हैं - यही बिंदु जलभृत स्तर कहलाता है, जिसके संरक्षण की आज आवश्यकता अनुभव की जा रही है। 

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नई चुनौतियां, पुराने कानून
हमारा कानूनी ढांचा सतही जल (नदियां, तालाब) और भूजल को अलग मानता है, जो वैज्ञानिक रूप से गलत है। सतही और भूजल एक-दूसरे से जुड़े हैं। फिर भी, कानून जमीन मालिक को भूजल निकालने का लगभग असीमित अधिकार देता है, भले ही पड़ोसियों को इसका नुकसान हो। डॉ. कुले इस चलन की चार प्रमुख खामियां गिनाते हैं: 
  •     जल के वितरण का यह नियम भूजल के सीमित वैज्ञानिक ज्ञान पर आधारित है। 
  •     यह दृष्टिकोण सतही और भूजल के बीच एक कृत्रिम अंतर पैदा करता है। 
  •     यह सामूहिक संरक्षण को प्रोत्साहित करने की बजाय व्यक्तिगत स्वामित्व को बढ़ावा देता है। 
  •     यह जल को सामाजिक अधिकार के बजाय सिर्फ संसाधन मानता है।
  •     19वीं सदी का यह ढांचा जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या के दबाव और औद्योगिक मांग के दौर में पूरी तरह बेमानी है।

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सामुदायिक नेतृत्व से बदलाव की राह
वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत को जल पर लागू किया, जिसने संरक्षण को उपयोग से ऊपर रखा। इससे एक ऐसी व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसमें न तो राज्य और न ही व्यक्ति जल पर स्वामित्व का दावा कर सकते हैं। यहां उपयोग से पहले संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। यह भूजल संरक्षण के लिए क्रांतिकारी हो सकता है, लेकिन, इसे अभी तक स्पष्ट रूप से लागू नहीं किया गया। बदलाव के लिए कुछ जरूरी बातों पर गौर करना जरूरी है:  
  • कानूनी सुधार : भूजल को साझा संपत्ति घोषित करने और पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत लागू करने का मार्ग कानूनी सुधार से प्रशस्त हो सकता है।
  • स्थानीय सशक्तिकरण : ग्राम सभाओं और पंचायतों को जलभृत प्रबंधन की जिम्मेदारी देने से बदलाव हो सकता है।  
  • सामुदायिक योजनाएं : जल बजट और जल सुरक्षा योजनाएं स्थानीय स्तर पर लागू करना उपयोगी हो सकता है। जल शक्ति अभियान और अटल भूजल योजना में पंचायत स्तर पर जल प्रबंधन शुरू हो चुका है। 24 लाख से अधिक महिलाएं जल परीक्षण के लिए प्रशिक्षित हो चुकी हैं, जो सामुदायिक जागरूकता का सबूत है।

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भूजल रिचार्ज की उम्मीद
भारत में भूजल पुनर्भरण पर केंद्र द्वारा जारी इंडियाज ग्राउंड वाटर रिवाइवल - रिपोर्ट इस दिशा में एक आशा जगाती है। वर्ष 2024 में, भूजल पुनर्भरण में 15 अरब क्यूबिक मीटर की वृद्धि वर्ष 2017 के मुकाबले दर्ज की गई, वहीं भूजल निष्कर्षण में 3 अरब क्यूबिक मीटर की कमी आई। इसके अतिरिक्त, 128 से अधिक मूल्यांकन इकाइयों में भूजल की स्थिति में सुधार देखा गया और 73.4% मूल्यांकन इकाइयां अब ‘सुरक्षित’ श्रेणी में हैं। लेकिन, प्रदूषण नियंत्रण और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति पर अभी कार्य बाकी है। 

संकट से निपटने की पहल
भारत सरकार और राज्य सरकारों के सहयोग से भूजल संरक्षण के लिए कई प्रभावी योजनाएं चलाई जा रही हैं। ये पहल जल संचयन, इसके पुनर्भरण और टिकाऊ उपयोग पर जोर देती हैं: 
  •     मनरेगा :  जल संरक्षण और जल संचयन संरचनाएं बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में जल सुरक्षा को बढ़ावा देने में मनरेगा की बड़ी भूमिका है। 
  •     15वां वित्त आयोग अनुदान : राज्यों को वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण के लिए केंद्र की ओर से वित्तीय सहायता दी जाती है। 
  •     जल शक्ति अभियान : वर्ष 2019 से शुरू, 2024 में 5वें चरण में 'कैच द रेन' अभियान के तहत जल संरक्षण एवं संचयन। 
  •     अटल भूजल योजना (2020) : 7 राज्यों के 80 जिलों में जल-संकट से ग्रस्त ग्राम पंचायतों में भूजल प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाता है। 
  •     पीएम कृषि सिंचाई योजना : हर खेत को पानी, जल निकायों का निर्माण और जल उपयोग दक्षता में सुधार करने में यह योजना कारगर है।
  •     मिशन अमृत सरोवर : प्रत्येक जिले में 75 अमृत सरोवरों का निर्माण अथवा पुनरुद्धार।
  •     राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण और प्रबंधन कार्यक्रम : 25 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण योजनाओं के लिए मैपिंग।
  •     अमृत 2.0 योजना : बरसाती नालों के जरिए वर्षा जल संचयन का समर्थन और जलभृत प्रबंधन योजनाओं से भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा। 
  •     भूजल पुनर्भरण मास्टर प्लान (2020) :  185 अरब क्यूबिक मीटर वर्षा जल उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जल संचयन और पुनर्भरण के लिए 1.42 करोड़ संरचनाओं के निर्माण की योजना। 
  •     जल उपयोग दक्षता ब्यूरो : वर्ष 2022 में स्थापित इस संस्था का उद्देश्य सिंचाई, घरेलू, नगरपालिका और औद्योगिक उपयोगों में जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना है।
  •     वाटरशेड विकास घटक :  वर्षा सिंचित और बंजर भूमि पर मृदा संरक्षण और जल संचयन।
  •     राष्ट्रीय जल नीति (2012) : वर्षा जल संचयन और इसके प्रत्यक्ष उपयोग से जल उपलब्धता बढ़ाने पर यह नीति जोर देती है। 
  •     राष्ट्रीय जल पुरस्कार : वर्ष 2018 से शुरू किया गया यह पुरस्कार जल संरक्षण के लिए योगदान देने वाले लोगों को प्रोत्साहन देता है। 

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जल है भविष्य : जनांदोलन की जरूरत
भूजल सिर्फ एक संसाधन नहीं है, बल्कि यह देश के अधिकांश समुदायों और हमारी भावी पीढ़ियों की जीवनरेखा भी है। जल बचाना आज का कर्तव्य है, जो कल को सुरक्षित करेगा। संविधान के अनुसार, जल राज्य का विषय है, अतः भूजल के सतत विकास और प्रबंधन की प्रमुख जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। हालांकि, केंद्र सरकार जल शक्ति मंत्रालय के माध्यम से तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करती है। भूजल संरक्षण के लिए, व्यापक सामुदायिक भागीदारी जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिक जरूरतों के बीच हमें टिकाऊ, सामुदायिक और वैज्ञानिक प्रबंधन चाहिए। भूजल को सामाजिक अधिकार मानकर इसके सामूहिक प्रबंधन की दिशा में कदम उठाने होंगे। हर गांव, पंचायत और समुदाय को जलभृत का रक्षक बनाना होगा। यह हमारी जल-रक्षा का एकमात्र रास्ता है।


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