कृत्रिम बुद्धिमत्ता या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक पर सवार होकर भारत के किसान अब जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से लड़ने के लिए कमर कस रहे हैं। मशीन लर्निंग (एमएल), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), ड्रोन, ब्लॉकचेन और सैटेलाइट इमेजिंग जैसी उन्नत तकनीकें खेती की सूरत बदल रही हैं। एआई आधारित इन तकनीकों ने फसलों के रोगों एवं कीटों के नियंत्रण और उपज के सटीक आकलन को संभव बना दिया है।
साथ ही, ये मिट्टी की नमी, तापमान और पोषक तत्वों का रियल-टाइम डाटा भी देती हैं। ड्रोन व स्पेक्ट्रल इमेजिंग से फसलों की स्थिति और पोषक तत्वों की कमी का बेहद कम समय में पता लगाना आसान हो गया है। वहीं, सैटेलाइट इमेजिंग बड़े स्तर पर मौसमी बदलाव, भूमि उपयोग और कृषि क्षेत्र की निगरानी में सहायक हो रही है। इसी तरह, ब्लॉकचेन तकनीक ने खेत से उपभोक्ताओं तक कृषि उत्पादों की पूरी आपूर्ति शृंखला को पारदर्शी, सुरक्षित और सत्यापन योग्य बना दिया है।
तकनीक से खेती को नई ताकत
अब स्मार्ट मशीनें और उपकरण तय करते हैं कि खेत में कब और कितना पानी देना है, किस क्षेत्र में कितनी खाद डाली जाए और कब कौन-सा कीट या रोग हमला कर सकता है? इन स्मार्ट तकनीकों की मदद से न केवल फसल की उपज बढ़ती है, बल्कि संसाधनों की बचत भी होती है। खेती में उपयोगी एआई के महत्वपूर्ण यंत्रों की बात करें तो इनमें मिट्टी की नमी, तापमान और पोषक तत्वों की जानकारी देने वाले सेंसर शामिल है। ये सेंसर खेत की लगातार निगरानी करते हैं और डाटा किसान के मोबाइल या कंप्यूटर पर भेज देते हैं।
एआई तकनीक आधारित उपकरण डाटा का विश्लेषण करके किसानों को सलाह देते हैं कि खेत में उन्हे क्या करना चाहिए। मशीन लर्निंग तकनीक नए एवं पुराने आंकड़ों के विश्लेषण से भविष्य में कीट एवं रोगों के प्रकोप का अनुमान लगाती है। इससे किसान पहले से तैयार रहकर नुकसान से बच सकते हैं। खेती में उपयोगी कृषि रोबोट बुवाई, निराई और कटाई जैसे काम बिना थके और पूरी सटीकता से कर रहे हैं। इससे समय की बचत के साथ श्रम की लागत कम होती है और फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है। वहीं, कृषि ड्रोन का उपयोग उर्वरकों के छिड़काव से लेकर खेतों की निगरानी करने तक होने लगा है। फसल की स्थिति, पोषण की कमी और रोग के लक्षणों की पहचान करके ये ड्रोन किसानों की मदद करते हैं।
रोग और कीटों की पहचान
एआई आधारित प्रणालियां शुरुआती चरण में ही फसल में रोग और कीटों के प्रकोप की पहचान कर सकती हैं। ड्रोन और सैटेलाइट से प्राप्त उच्च-रिजॉल्यूशन तस्वीरों का उपयोग करके एआई एल्गोरिदम फसल में तनाव, पोषक तत्वों की कमी, रोग के लक्षण या कीटों के प्रकोप का आसानी से पता लगा सकते हैं। ये सिस्टम किसानों को प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने और उपचार में मदद करते हैं। आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी बॉम्बे और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं ने गेहूं, चावल, कपास और टमाटर जैसी फसलों में रोग व कीटों की पहचान के लिए डीप लर्निंग और कंप्यूटर विजन तकनीकों का उपयोग किया है।
फसल उत्पादकता में वृद्धि
एआई संचालित उपकरण किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद करते हैं, जिससे फसलों की उपज बढ़ती है। एआई मिट्टी के स्वास्थ्य, मौसम के पैटर्न और फसल वृद्धि का विश्लेषण करके खाद और पानी के उपयोग को अनुकूलित कर सकता है। सटीक खेती के माध्यम से एआई उर्वरकों, कीटनाशकों और पानी के अनावश्यक उपयोग को कम करने में मदद करता है, जिससे इनपुट लागत में कमी आती है। स्मार्ट सिंचाई प्रणालियां मिट्टी की नमी के स्तर के आधार पर पानी का वितरण करती हैं, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है। इससे किसानों को समय पर हस्तक्षेप करने और फसल हानि को कम करने में मदद मिलती है।
जल प्रबंधन और नपी-तुली सिंचाई
भारत में पानी की कमी एक गंभीर मुद्दा है। एआई संचालित स्मार्ट सिंचाई प्रणालियां मिट्टी की नमी सेंसर, मौसम पूर्वानुमान डाटा और फसल की वृद्धि अवस्था का उपयोग करके पानी की आवश्यकता का अनुमान लगाती हैं। ये प्रणालियां स्वचालित रूप से सिंचाई को समायोजित करती हैं, जिससे पानी का कुशल उपयोग सुनिश्चित होता है। नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर, इसरो और विभिन्न आईआईटी रिमोट सेंसिंग डाटा और एआई का उपयोग करके फसल में पानी की आवश्यकता का अनुमान लगाने और सिंचाई दक्षता में सुधार करने पर कार्य कर रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने ड्रिप सिंचाई प्रणालियों के साथ एआई एकीकरण पर शोध किया है।
एआई सेंसर की पैनी नजर
एआई सेंसर को कृषि की आंख, नाक और कान भी कह सकते हैं, जो खेती में नई क्रांति ला रहे हैं। इन स्मार्ट सेंसर्स के जरिए किसान मिट्टी की नमी एवं तापमान, हवा का तापमान, हवा में मौजूद नमी और मिट्टी के पोषक तत्वों की मात्रा का सटीक तरीके से पता लगा सकते हैं। खेत में कब पानी देना है या फिर कौन-से उर्वरक की कितनी मात्रा डालनी है, ऐसे कई निर्णय लेना किसानों के लिए एआई सेंसर्स के उपयोग के कारण अब बेहद आसान हो गया है। मिट्टी की नमी पता करने के लिए सॉइल मॉइस्चर सेंसर, प्रकाश की मात्रा जांचने के लिए लाइट सेंसर, पीएच स्तर बताने वाले पीएच सेंसर, पोषक तत्वों के बारे में बताने वाले सॉइल न्यूट्रिएंट सेंसर और मौसम का हाल बताने वाले वेदर स्टेशन किसानों के नए साथी बन रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन से जंग
ऐतिहासिक मौसम डाटा, सैटेलाइट इमेजरी और वायुमंडलीय मॉडलों का विश्लेषण करके एआई अत्यधिक सटीक मौसम पूर्वानुमान प्रदान कर सकता है। यह सूखे, बाढ़ और पाले जैसी चरम मौसमी घटनाओं का अनुमान लगाने में मदद करता है, जिससे किसान निवारक उपाय कर सकते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी ने एआई और मशीन लर्निंग को मौसम पूर्वानुमान मॉडल में एकीकृत करने पर काफी काम किया है।
एआई आधारित एल्गोरिदम भंडारण सुविधाओं में तापमान और आर्द्रता जैसी स्थितियों की निगरानी कर सकते हैं और परिवहन मार्गों का सुझाव दे सकते हैं ताकि खराब होने वाले कृषि उत्पादों के नुकसान को कम किया जा सके। केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान और भारतीय पैकेजिंग संस्थान जैसे संस्थानों ने एआई आधारित गुणवत्ता मूल्यांकन और कटाई के बाद के प्रबंधन पर शोध किया है। एग्री-बाजार जैसे स्टार्टअप एआई का उपयोग करके किसान के खेत से बाजार तक सुविधाओं को बेहतर बना रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने भी लगाई अपनी मुहर
जर्नल ऑफ एग्रीकल्चर फूड रिसर्च में, अप्रैल, 2025 में प्रकाशित अध्ययन - ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन एग्रीकल्चर’ - एक प्रासंगिक और समयोचित शोध प्रस्तुत करता है। इस शोध में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एआई तकनीक कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और सटीक बनाने की दिशा में क्रांतिकारी भूमिका निभा रही है। यह शोध तीन प्रमुख स्तंभों - प्रिसीजन फार्मिंग, मशीन लर्निंग और कृषि रोबोटिक्स - पर आधारित है।
प्रिसीजन फार्मिंग के अंतर्गत जीपीएस, आईओटी सेंसर और ड्रोन का उपयोग कर पर्यावरणीय स्थितियों की रीयल-टाइम निगरानी संभव हो गई है। एआई तकनीक से लैस एल्गोरिदम इन आंकड़ों का विश्लेषण करके फसलों की देखभाल से जुड़ी सटीक सलाह प्रदान करते हैं। मशीन लर्निंग के उपयोग से फसल उत्पादन का पूर्वानुमान लगाना, कीट और रोगों की पहचान करना और पोषण संबंधी कमियों का निर्धारण करना संभव हो गया है।
अधिक श्रम वाले कार्यों, जैसे - बुवाई, निराई और कटाई के लिए कृषि रोबोट्स का उपयोग किया जा रहा है। ये रोबोट 24 घंटे विभिन्न मौसमी स्थितियों में कार्य कर सकते हैं और फसल उत्पादन की गुणवत्ता को बनाए रखते हैं। आज एआई से लैस स्वचालित ट्रैक्टर विकसित किए गए हैं। प्लांटिक्स जैसे एप के माध्यम से किसान स्मार्टफोन से फसल के रोगों की पहचान करके उपचार कर सकते हैं। वहीं, एआई की मदद से जीन की पहचान कर उच्च उपज और प्रतिरोधी फसलें विकसित की जा रही हैं।
खेती के इन क्षेत्रों में एआई का दखल
इन्फॉर्मेशन जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र - ‘एआई एंड रिलेटेड टेक्नोलॉजीज इन द फील्ड्स ऑफ स्मार्ट एग्रीकल्चर: अ रिव्यू’- एआई से आए बदलाव का विश्लेषण करता है। इसमें ओपन फील्ड स्मार्ट फार्मिंग, वर्टिकल और इन्डोर फार्मिंग, जीरो वेस्ट एग्रीकल्चर, प्रिसिजन लाइवस्टॉक फार्मिंग, स्मार्ट ग्रीनहाउस और रीजेनेरेटिव एग्रीकल्चर जैसे छह क्षेत्रों में एआई, आईओटी, ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग जैसी तकनीकों के प्रभाव को समझाया गया है। उदाहरण के लिए, स्वचालित सिंचाई प्रणाली, जो आईओटी आधारित सेंसरों से मिट्टी की नमी के अनुसार संचालित होती है, जल संरक्षण में सहायक सिद्ध हो रही है। वहीं, स्मार्ट कॉलर और सेंसर पशुपालन में पशु स्वास्थ्य और उत्पादकता को बेहतर बना रहे हैं।
रोबोटिक्स और ऑटोमेशन
कृषि रोबोट और स्वचालित मशीनें एआई से संचालित होती हैं, जो कृषि कार्यों को दक्षता और सटीकता के साथ अंजाम दे सकती हैं। ये रोबोट खरपतवारों और फसलों के बीच अंतर कर सकते हैं और खरपतवार हटा सकते हैं। कुछ फसलों के लिए स्वचालित कटाई रोबोट विकसित किए जा रहे हैं, जो तैयार फलों या सब्जियों की पहचान एआई से कर सकते हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना कटाई कर सकते हैं। आईआईटी मद्रास और आईआईटी दिल्ली जैसे संस्थानों में कृषि रोबोटिक्स पर शोध चल रहा है। कृषि यंत्र अनुसंधान संस्थान, भोपाल भी कृषि के लिए उपयुक्त रोबोटिक समाधान विकसित करने में जुटा है।
एआई और संबंधित तकनीकों के एकीकृत प्रयोग से कृषि अब केवल जीविका का साधन नहीं रही, बल्कि यह उच्च तकनीकी, डाटा-संचालित और जलवायु-अनुकूल प्रणाली बन रही है। भविष्य की कृषि स्मार्ट, टिकाऊ और समावेशी होगी और इसका रास्ता एआई और प्रिसीजन फार्मिंग से होकर ही जाएगा।