Home›Misal Bemisal›Vishesh›
Nematodes This Insect Has Become The Enemy Of Crops Causing Loss Of 600 Lakh Tonnes Of Yield Annually
Nematode Infestation in Crops: फसलों का दुश्मन बना यह कीट, सालाना 600 लाख टन उपज का नुकसान
डॉ. निमिष कपूर
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 15 Mar 2025 03:58 PM IST
सार
भारत में हर साल 30 से 35 फीसदी फसलें कीटों के प्रकोप से नष्ट हो जाती है। नेमाटोड्स यानी सूत्रकृमि फसलों के लिए बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं, जो सालाना 600 लाख टन उपज का नुकसान करते हैं। दुनिया भर में ये कीट हर साल करोड़ों रुपये की चपत का कारण बनते हैं।
सूत्रकृमि हर साल 600 लाख टन फसल उपज का नुकसान करते हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
फसलों में सूत्रकृमि (नेमाटोड्स) का प्रकोप एक वैश्विक संकट बन चुका है। संयुक्त राज्य कृषि विभाग (यूएसडीए) के अनुसार, सूत्रकृमि हर साल दुनिया भर में 80 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की फसल हानि का कारण बनते हैं। भारत में हर साल लगभग 30 से 35 फीसदी फसल कीटों के प्रकोप से नष्ट हो जाती है। इसमें नेमाटोड्स यानी सूत्रकृमि फसलों के लिए बड़े खतरे के रूप में उभरे हैं, जो हर साल 600 लाख टन फसल उपज का नुकसान करते हैं। हाल ही में आयोजित ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन नेमाटोड्स इन क्रॉपिंग सिस्टम की वार्षिक समूह बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा यह चिंताजनक तथ्य साझा किया गया है।
भारत में, 24 विभिन्न फसलों में सूत्रकृमि के कारण होने वाली राष्ट्रीय क्षति का अनुमान लगभग 2100 करोड़ रुपये है।
- फोटो : गांव जंक्शन
कृषि और बागवानी फसलों पर कहर
सूत्रकृमि का असर पूरे देश में कृषि और बागवानी फसलों पर समय के साथ बढ़ता रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बागवानी फसलों का विस्तार हुआ है। सूक्ष्म सिंचाई तंत्र की ओर बढ़ते रुझान ने सूत्रकृमि के लिए आदर्श परिस्थितियां पैदा की हैं। इन सूक्ष्म परजीवियों द्वारा पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचता है और उपज में भारी गिरावट आती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) के सूत्रकृमि विज्ञान (निमेटोलॉजी) विभाग के अनुसार, वर्तमान समय में, सूत्रकृमि की समस्या बढ़ रही है, क्योंकि किसानों द्वारा बहुफसली प्रणाली और फसलों की गहन खेती को अपनाया जा रहा है।
बड़ी समस्या यह है कि सूत्रकृमि द्वारा उत्पन्न पौधों के रोगों को अक्सर किसानों द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है, क्योंकि ये कीट भूमि के गर्भ में छिपे रहते हैं, जिनका पता किसानों को समय रहते नहीं चल पाता। आईसीएआर के मुताबिक, कम से कम 10 प्रकार के सूत्रकृमि दुनिया भर में फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। भारत में, 24 विभिन्न फसलों में सूत्रकृमि के कारण होने वाली राष्ट्रीय क्षति का अनुमान लगभग 2100 करोड़ रुपये है। हालिया शोधों में भी सामने आ चुका है कि इस तरह के बड़े पैमाने पर फसल नुकसान का कृषि जैव सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जो खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण है। किसानों में जागरूकता की कमी भी सूत्रकृमि जैसे फसल विध्वंसकों को प्रोत्साहित कर रही है।
सूत्रकृमि धागानुमा कीट होते हैं, जो विशेष रूप से मिट्टी में पाए जाते हैं और वर्षों तक मिट्टी में रह सकते हैं। ये फसलों, फल एवं सब्जियों को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। सूत्रकृमि परजीवी होते हैं, जो पौधों की जड़ों में घुसकर पोषक तत्वों और पानी को चूसते हैं। इसके कारण पौधों में जल व पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिससे उनकी वृद्धि और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सूत्रकृमि का प्रकोप बढ़ने से फसलों के उत्पादन में कमी आती है। यह कई प्रकार की फसलों, जैसे गेहूं, टमाटर, मिर्च, बैंगन, भिंडी, परवल, धान के साथ-साथ फलों जैसे अनार, नींबू, संतरा, अमरूद, अंजीर, किन्नू, अंगूर इत्यादि पर भी प्रभाव डालते हैं।
पौधों पर परजीवी के रूप में हमला करने वाले सूत्रकृमि फसलों को अप्रत्यक्ष रूप से भी नुकसान पहुंचाते हैं, क्योंकि ये पौधों को रोगजनक बैक्टीरिया, फफूंदी, और अन्य रोगों के प्रति संवेदनशील बना देते हैं। ये फसलों की सफल खेती के लिए एक महत्वपूर्ण जैविक तनाव का कारण बनते हैं। सूत्रकृमि पौधों की जड़ों पर गाठें बना देते हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उनकी जड़ों में संक्रमण फैलता है। पौधा धीरे-धीरे मुरझाने लगता है और सूख जाता है। इसके साथ ही, फूलों और फलों की संख्या में भी कमी आती है, फसलों की उपज में कमी और गुणवत्ता में गिरावट हो सकती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
भारत में प्रमुख 30 फसलों में औसतन 21.3 प्रतिशत नुकसान सूत्रकृमि के कारण देखा गया है।
- फोटो : गांव जंक्शन
फसलों के नुकसान का आकलन
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ता डॉ. रमन कुमार वालिया के वर्ष 2024 में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि सूत्रकृमि से नुकसान का आकलन बहुत आवश्यक है, ताकि कृषि में इनके प्रभाव को समझा जा सके। वर्ष 2020 में किए गए एक अन्य अध्ययन के अनुसार, भारत में प्रमुख 30 फसलों में औसतन 21.3 प्रतिशत नुकसान हुआ। इस नुकसान का अनुमानित आर्थिक प्रभाव करीब 10,203 करोड़ रुपये रहा। इसमें प्रमुख नुकसान धान, केले, नींबू और टमाटर जैसी बागवानी फसलों में देखा गया है। धान में राइस रूट-नॉट नेमाटोड सबसे अधिक नुकसान करता है। हाल ही में सूत्रकृमि ने चावल के उत्पादन क्षेत्रों में गंभीर समस्या पैदा कर दी है। राइस रूट-नॉट नेमाटोड नामक सूत्रकृमि न केवल निचले क्षेत्रों में, बल्कि ऊपरी क्षेत्रों में भी धान की खेती को प्रभावित कर रहा है। मसाले जैसे काली मिर्च, इलायची और हल्दी में नुकसान 29.5 प्रतिशत तक हो सकता है। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में सूत्रकृमि रोग जैसे गेहूं और जौ का मोल्या रोग, ईयर-कॉकल और टंडू रोग सामान्य हैं। दक्षिण भारत में केला और सिट्रस फल जैसे संतरा, नींबू, अमरूद, अंगूर, लाइम, किन्नू के लिए सूत्रकृमि समस्या बन चुका है।
क्या है समाधान?
भारत में सूत्रकृमि के प्रसार के प्रमुख कारणों में संक्रमित पौधों की नर्सरी से उनका फैलाव, विशेष रूप से अमरूद और अनार जैसी बागवानी फसलों में शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप बागों में बड़ी संख्या में पौधे समाप्त हो जाते हैं। इस समस्या को रोकने के लिए, सूत्रकृमि से मुक्त पौधों के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने की जरूरत है। साथ ही, नर्सरी की मिट्टी का सूर्य की रोशनी से सीधा संपर्क सुनिश्चित करने से भी मदद मिल सकती है।
सूत्रकृमि से बचाव के लिए विभिन्न उपाय अपनाए जा सकते हैं। बीजों का उपचार, मिट्टी की सफाई और जैविक या रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग इन कृमियों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। इसके अतिरिक्त, कुछ प्राकृतिक शिकारियों का उपयोग भी सूत्रकृमि के नियंत्रण के लिए किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सूत्रकृमि की समस्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करने के लिए नीम का उपयोग एक प्रभावी उपाय है। नीम का तेल और खली दोनों ही सूत्रकृमि को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। साथ ही फसलों की उपज में 40% तक वृद्धि हो सकती है।
रासायनिक और जैविक उपायों से सूत्रकृमि को नियंत्रित किया जा सकता है।
- फोटो : सोशल मीडिया
रासायनिक और जैविक उपाय
हाल ही में फ्लुओपायरम और फ्लुएन्सल्फोन जैसे नए रासायनिक सूत्रकृमि नाशकों को मंजूरी दी गई है, जो सूत्रकृमि के नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं। इसके साथ ही जैविक उपायों जैसे पर्प्यूरोसीलियम लाइलासिनम का प्रयोग सूत्रकृमि से बचाव के लिए किया जा रहा है। यह एक प्रकार का कवक है जो सूत्रकृमि पर हमला करके उन्हें नियंत्रित करता है। ट्राइकोडर्मा भी सूत्रकृमि के प्रभाव को कम करने में मदद कर रहे हैं। यह भी एक प्रकार का कवक है जो विभिन्न प्रकार के पैथोजन और सूत्रकृमि के खिलाफ प्रभावी होता है, और फसलों की रक्षा करता है। बैसिलस बैक्टीरिया सूत्रकृमि को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। ये बैक्टीरिया मिट्टी में रहते हैं और सूत्रकृमि पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
एकीकृत सूत्रकृमि प्रबंधन
सूत्रकृमि, विशेष रूप से रूट नॉट सूत्रकृमि, एक बार जब किसी खेत में स्थापित हो जाते हैं, तो उनका उन्मूलन लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे में इनका प्रभावी प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इस संदर्भ में, एकीकृत सूत्रकृमि प्रबंधन एक प्रभावी उपाय के रूप में उभरकर सामने आया है, जो विभिन्न तकनीकों का संयोजन करता है। यह न केवल सूत्रकृमि की समस्या को नियंत्रित करने में मदद करता है, बल्कि पर्यावरण पर इसके प्रभाव को भी न्यूनतम करता है।
सूत्रकृमि प्रबंधन का उद्देश्य पर्यावरण और स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभावों को कम करना, साथ ही फसलों की रक्षा के लिए स्थान-विशिष्ट और संसाधन-संगत प्रबंधन रणनीतियों को अपनाना है। इसके तहत पारंपरिक, जैविक, भौतिक और रासायनिक विधियों का संयोजन किया जाता है। उदाहरण के लिए, गर्मियों में हल चलाना, फसल चक्र अपनाना, और प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग जैसी विधियाँ सूत्रकृमि प्रबंधन के प्रभाव को कम करने में सहायक हैं। जैविक नियंत्रण के तहत, सूत्रकृमि विरोधी जैविक एजेंटों का उपयोग किया जाता है, जबकि भौतिक विधियों में मिट्टी का स्टेरिलाइजेशन और भाप से स्टेरिलाइजेशन शामिल हैं।
निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों के सहयोग से सूत्रकृमि से निपटने के लिए नीतियां और कार्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
फायदेमंद भी हैं सूत्रकृमि
इन समस्याओं के बावजूद, कुछ लाभकारी सूत्रकृमि होते हैं, जो जैविक नियंत्रण एजेंट के रूप में काम करते हैं। इनका सफलतापूर्वक उपयोग कीट-रोगजनक (एंटोमोपैथोजेनिक) सूत्रकृमि के रूप में किया जाता है, जो अपने बैक्टीरिया सहजीवियों के साथ मिलकर कीटों को 24-48 घंटों में मार डालते हैं। सैप्रोजोइक सूत्रकृमि, जो रोगजनक नहीं होते और स्वतंत्र रूप से जीवन जीते हैं, राइजोस्फीयर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अन्य सूक्ष्मजीवों की जनसंख्या को नियंत्रित करते हैं, जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार होता है। यह पोषक तत्वों के खनिजकरण और मिट्टी की प्रक्रियाओं के द्वारा मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं।
जागरूकता की जरूरत
कृषि मंत्रालय और राज्य सरकारों द्वारा बागवानी के क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता ने सूत्रकृमि से संबंधित समस्याओं को भी उजागर किया है। किसानों, कृषि अधिकारियों और क्वारंटाइन अधिकारियों के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों के सहयोग से सूत्रकृमि से निपटने के लिए नीतियां और कार्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं। भारत में सूत्रकृमि से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए एक समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। किसानों को उचित प्रशिक्षण, नए जैविक और रासायनिक समाधानों का उपयोग और नर्सरी के स्तर पर सही प्रबंधन द्वारा इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। समय रहते यदि उचित कदम उठाए जाएं तो कृषि में नेमाटोड्स के प्रकोप को कम किया जा सकता है, जिससे कृषि और बागवानी में वृद्धि सुनिश्चित की जा सकेगी।
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।