कृषि वानिकी (
Agroforestry) भूमि के उपयोग (Land Use) की एक टिकाऊ (sustainable) और लाभदायक प्रणाली है, जो किसानों, पर्यावरण (Environment) और समाज के लिए अनेक लाभ प्रदान करने के लिए जानी जाती है। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) एवं संसाधनों के संरक्षण की चुनौती के बीच टिकाऊ भविष्य और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिहाज से कृषि वानिकी का महत्व अधिक बढ़ गया है। कृषि वानिकी को अपनाकर खेती-बाड़ी, पशुपालन और पेड़ों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़कर अधिक लचीला, विविधतापूर्ण, उत्पादक, लाभदायक और टिकाऊ भूमि उपयोग सुनिश्चित कर सकते हैं। यह किसानों के लिए फायदेमंद होने के साथ पर्यावरण की स्थिरता और विकास के साथ संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है।
कैसी-कैसी कृषि वानिकी?
कृषि वानिकी में खेतों के पास कुछ खास प्रजातियों के पेड़ लगाते हैं, जिससे फसलों को लाभ मिलने के साथ लकड़ी उत्पादन भी होता है। वहीं, पशुपालन के साथ भी कुछ विशिष्ट प्रजातियों के पेड़ चारा फसलों के साथ लगाए जाते हैं, जिससे दोहरा फायदा होता है। इससे पशुधन को पोषण और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। कृषि वानिकी के कुछ उदाहरणों की बात करें, तो इसमें फसलों के बीच या खेत के किनारे पर पेड़ लगाए जा सकते हैं। इसी तरह, नदियों के किनारे पेड़ लगाकर एक तरफ जहां मिट्टी के कटाव को रोका जा सकता है, वहीं दूसरी ओर पानी की गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है।
एक साथ साधे जा सकते हैं कई लक्ष्य
स्वतंत्रता के 100वें वर्ष में सरकार का लक्ष्य सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सहित हर क्षेत्र में भारत को सशक्त बनाने का है। इसमें जलवायु संतुलन, पर्यावरणीय सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों की सतत उपलब्धता भी शामिल है। इस कड़ी में, कृषि वानिकी एक उपयोगी वैज्ञानिक समाधान के रूप में सामने आई है, जो प्राकृतिक वनों पर दबाव कम करने के साथ जलवायु के साथ तालमेल स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही, लकड़ी
आधारित संसाधनों व उद्योगों के लिए एक मजबूत आपूर्ति शृंखला इसके जरिए बनाई जा सकती है। यह प्रणाली न केवल कृषि उत्पादकता और मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है, बल्कि किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर भी देती है। शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, भारत में राउंड वुड समतुल्य काष्ठ की मांग वर्ष 2021 में 59.64 मिलियन घन मीटर थी, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 97.81 मिलियन घन मीटर तक पहुंचने का अनुमान है।
राउंड वुड समतुल्य माप की एक इकाई है, जो लकड़ी की मात्रा को मापने के लिए उपयोग की जाती है। यह उस लकड़ी की कुल मात्रा को दर्शाती है जो किसी विशिष्ट उत्पाद (जैसे लकड़ी के तख्ते, बीम, या अन्य लकड़ी के उत्पाद) को बनाने के लिए उपयोग की जाती है। पूरा लकड़ी का लॉग, राउंड वुड या गोल लकड़ी कहलाता है।
भारत में औद्योगिक काष्ठ की मांग बढ़ रही है। फर्नीचर, प्लाईवुड, लुगदी एवं कागज व निर्माण क्षेत्र में इसकी मांग अधिक है। फर्नीचर उद्योग में 13.34 मिलियन घन मीटर; कागज और लुगदी उद्योग में 12.5 मिलियन घन मीटर; प्लाईवुड एवं अन्य काष्ठ व्यवसाय में 57.49 मिलियन घन मीटर और निर्माण क्षेत्र में 14.48 मिलियन घन मीटर काष्ठ की मांग है। इसके बावजूद, भारत में काष्ठ का एक बड़ा हिस्सा अभी भी आयात पर आधारित है। कृषि वानिकी इस निर्भरता को कम करने में सहायक हो सकती है।
कृषि वानिकी को वैश्विक मान्यता
पेरिस समझौता (2015) के तहत भारत ने 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन कार्बन अवशोषण वृक्षों और वनों के माध्यम से करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें कृषि वानिकी सहायक सिद्ध हो सकती है। वहीं, क्योटो प्रोटोकॉल, रेड प्लस और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति जैसे वैश्विक मंचों पर भी कृषि वानिकी को कार्बन अवशोषण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के सशक्त उपाय के रूप में मान्यता दी गई है। हालांकि, काष्ठ उत्पादन में कृषि वानिकी की संभावनाओं पर अभी भी सीमित ध्यान दिया गया है, जबकि इसकी गुणवत्ता युक्त लकड़ी उत्पादन की क्षमता बहुत अधिक है।
भारत की बंजर भूमि में जान फूंकने और हरित आवरण को बढ़ावा देने की एक नई पहल के अंतर्गत कृषि वानिकी (ग्रो) रिपोर्ट और पोर्टल की शुरुआत की गई है। यह पहल भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी, उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (भौगोलिक सूचना प्रणाली) के माध्यम से देश के प्रत्येक जिले में कृषि वानिकी की प्रासंगिकता का आकलन करती है। इसके आधार पर कृषि वानिकी उपयुक्तता सूचकांक तैयार किया गया है, जिससे राज्य और जिला स्तर पर नीति निर्माण में सहायता मिल सके।
इस परियोजना से कृषि योग्य बंजर भूमि को उत्पादक भूमि में बदला जा सकता है। इसके साथ ही, यह लकड़ी के आयात में कमी लाने, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक कार्बन पृथक्करण और कृषि भूमि के बेहतर उपयोग जैसे लक्ष्यों में सहायक हो सकती है। कृषि वानिकी के पारिस्थितिकीय लाभों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने इसे बजट में प्राथमिकता दी है। कृषि वानिकी से जड़ी गतिविधियां पर्यावरण पर केंद्रित वैश्विक समझौतों, जैसे- पेरिस समझौता, सतत विकास लक्ष्य और हरित भारत मिशन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सहायक हैं। इसका उद्देश्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर परती भूमि का सुधार और 2.5 से 3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य कार्बन सिंक तैयार करना है।
किसानों से कनेक्ट बढ़ाने की जरूरत
कृषि वानिकी की व्यापक स्वीकार्यता के बावजूद, कुछ प्रमुख समस्याएं हैं, जो इसके विकास में बाधक बनी हुई हैं। सबसे पहले तो किसानों को इसके बारे में वैज्ञानिक जानकारी नहीं है। ज्यादातर किसान नहीं जानते कि उन्हें किस प्रजाति का वृक्ष लगाना चाहिए, कितनी दूरी पर लगाना चाहिए और किस प्रकार की मिट्टी में वृक्ष उगते हैं। सही जानकारी का अभाव कृषि वानिकी के विकास में एक बड़ी रुकावट है। इसके अलावा, जल्दी कटाई की प्रवृत्ति के कारण न तो किसान को उचित लाभ मिलता है और न ही उद्योगों को गुणवत्तापूर्ण काष्ठ प्राप्त होता है, जो वाणिज्यिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से हानिकारक है। कृषि वानिकी में प्रमाणित बीज और सही पौधों की कमी के कारण वृक्षों की उत्पादकता में भी कमी आती है, जिससे खेती की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है।
किसानों, उद्योगों और वैज्ञानिकों के बीच समन्वय की कमी के कारण बिचौलियों को शोषण का मौका मिलता है। ऐसे में, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इन समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक तरीके से वृक्षारोपण योजनाओं के निर्माण से किया जा सकता है, ताकि किसान सही समय और सही प्रजाति के वृक्ष लगा सकें। किसानों को प्रमाणित बीज और पौधे उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है, ताकि वृक्षों की उत्पादकता बढ़े। सरल पंजीकरण प्रक्रिया और प्रशासनिक बाधाओं को कम करना भी आवश्यक है, ताकि कृषि वानिकी से किसान आसानी से जुड़ सकें।
स्थानीय समुदायों को शामिल करते हुए कृषि वानिकी परियोजनाओं का बेहतर संचालन सुनिश्चित किया जा सकता है। कृषि वानिकी से एक तरफ जहां पर्यावरणीय लाभ मिलते हैं, वहीं इससे किसानों और स्थानीय समुदायों का आर्थिक सशक्तिकरण भी किया जा सकता है।
कितनी कृषि वानिकी, वनों से कवर कितना क्षेत्र?
भारत के सभी कृषि-जलवायु क्षेत्रों में कुल 284.27 लाख हेक्टेयर भूमि पर कृषि वानिकी की जा रही है, जो कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र (3287.47 लाख) का लगभग 8.65 प्रतिशत है। भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत प्रकाशित भारत राज्य वन रिपोर्ट (2023) के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष क्षेत्रफल 8,27,356.95 वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। इसमें 7,15,342.61 वर्ग किमी वन क्षेत्र (21.76%) और 1,12,014.34 वर्ग किमी वृक्ष क्षेत्र (3.41%) शामिल है।
वर्ष 2021 की तुलना में कुल वन एवं वृक्षावरण में 1,445.81 वर्ग किमी की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें से वन आवरण में 156.41 वर्ग किमी की बढ़ोतरी हुई है। क्षेत्रवार देखें, तो छत्तीसगढ़, यूपी और ओडिशा में सबसे अधिक वृद्धि हुई है, जबकि एमपी, कर्नाटक और लद्दाख में वनों के आवरण में सर्वाधिक कमी दर्ज की गई है। क्षेत्रफल के आधार पर सबसे अधिक वन क्षेत्र मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में है। वहीं, भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत के रूप में लक्षद्वीप, मिजोरम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे हैं।
कुल 19 राज्य/संघ राज्य क्षेत्र ऐसे हैं, जहां 33% से अधिक क्षेत्र वन से आच्छादित है। देश का अनुमानित वन कार्बन स्टॉक 7,285.5 मिलियन टन है, जो वर्ष 2021 की तुलना में 81.5 मिलियन टन अधिक है। हालांकि, मैंग्रोव क्षेत्र में कुल मिलाकर 7.43 वर्ग किलोमीटर की गिरावट दर्ज की गई है। ये आंकड़े देश में वन संसाधनों की स्थिति के साथ-साथ उनके सतत संरक्षण और प्रबंधन की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को दर्शाते हैं।