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Sugarcane History: जिस गन्ने से बना गुड़, फिर चीनी – भारत में उसकी दास्तान हजारों साल पुरानी है, जानें...

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Sun, 15 Jun 2025 04:17 PM IST
सार

भारत के लिए गन्ना एक विदेशी फसल है। राजधानी दिल्ली से आठ हजार किलोमीटर दूर न्यू गिनी के द्वीप में पहली बार गन्ने की खेती हुई थी। इतिहासकारों की मानें तो इस द्वीप से गन्ने की खेती के तार भी लगभग आठ हजार साल पुराने हैं। समय के साथ इस द्वीप से गन्ने की खेती का धीरे-धीरे विस्तार दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने लगा। माना जाता है कि सबसे पहले गन्ना न्यू गिनी के द्वीप से दो हजार किलोमीटर दूर सोलोमन द्वीप समूह में गन्ने की खेती फैली और दो हजार साल बाद गन्ने की खेती इंडोनेशिया और उत्तर भारत तक पहुंची। इतिहास के जानकारों की मान्यता है कि भारत में 3 हजार से 3 हजार 500 साल पहले गन्ने की खेती शुरू हुई थी। 
 

जब भारत पहुंचा गन्ना: 8000 साल पुरानी फसल का सफरनामा
जब भारत पहुंचा गन्ना: 8000 साल पुरानी फसल का सफरनामा - फोटो : AI
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विस्तार
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उत्तर भारत के खेतों में साल के 12 महीने गन्ने की फसल का दिखना आम बात है। गन्ना भारतीय किसानों से लेकर चीनी मिलों में काम करने वाले कर्मचारियों तक के लिए आय का स्रोत बना है। वहीं, बीते सालों में इथेनॉल उत्पादन पर देश के फोकस ने इस फसल को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। 

आठ हजार किलोमीटर दूर और आठ हजार साल पहले 
भारत के लिए गन्ना एक विदेशी फसल है। राजधानी दिल्ली से आठ हजार किलोमीटर दूर न्यू गिनी के द्वीप में पहली बार गन्ने की खेती हुई थी। इतिहासकारों की मानें तो इस द्वीप से गन्ने की खेती के तार भी लगभग आठ हजार साल पुराने हैं। 

धीरे-धीरे दुनियाभर के खेतों में दिखने लगे गन्ने 
न्यू गिनी के द्वीप से गन्ने की खेती का धीरे-धीरे विस्तार दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने लगा। माना जाता है कि सबसे पहले गन्ना न्यू गिनी के द्वीप से दो हजार किलोमीटर दूर सोलोमन द्वीप समूह में गन्ने की खेती फैली और दो हजार साल बाद गन्ने की खेती इंडोनेशिया और उत्तर भारत तक पहुंची। इतिहास के जानकारों की मान्यता है कि भारत में 3 हजार से 3 हजार 500 साल पहले गन्ने की खेती शुरू हुई थी। 

एक समय चीनी का आयात करता था भारत 
वर्तमान में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है। अगर संभावना जताई जाए कि भारत चीनी के निर्यात को सीमित या प्रतिबंधित करने वाला है , तो कई देश आयात पर अपनी निर्भरता के कारण चिंता में आ जाते हैं। लेकिन, करीब 100 साल पहले परिस्थिति कुछ अलग थी। भारत 1900 के दशक की शुरुआत में जावा और सुदूर पूर्व से चीनी का आयात करता था। हालांकि इस दशक में गन्ने  का उत्पादन-अच्छा-खासा होता था, लेकिन गन्ने की पेराई की सुविधा देश में कम थीं। 

भारत के रास्ते चीन पहुंचा गन्ना 
चीन का नाम सुनकर लगता है कि चीनी में गन्ने और चीनी का उत्पादन मूल रूप से होता आ रहा है। शब्द से जोड़ा जाता है। लेकिन, इतिहास उठाकर देखें तो 2800 साल पहले भारत के रास्ते गन्ना चीन पहुंचा था। इसी तरह माना जाता है की भारत से बौद्ध भिक्षुओं ने चीनी बनाने का तरीका चीन पहुंचाया था। 

8वीं शताब्दी में हुई थी चीनी बनाने की शुरुआत
इतिहास में जाएं तो माना जाता है कि दुनिया में सबसे पहले गन्ने से चीनी बनाने की शुरुआत भारत में 2 हजार 374 साल पहले हुई थी। इस अवधि को गुप्त वंश से भी जोड़ा जाता है। 

पहली चीनी मिल की स्थापना 
अब तक का गन्ने और चीनी का इतिहास एशियाई देशों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। लेकिन, गन्ने और चीनी की इस यात्रा में अमेरिका का नाम भी आता है, जब  एक स्पैनिश व्यक्ति ने साल 1535 में अमेरिक के उत्तर में पहली चीनी मिल की स्थापना की थी। इसके बाद धीरे-धीरे अमेरिका में चीनी उत्पादन एक बड़ा उद्योग बन गया। 

समृद्धि की निशानी थी चीनी 
एक समय चीनी समृद्धि की निशानी थी। इतिहासकारों की मानें तो ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ अपने मेज के ऊपर एक चीनी का कटोरा रखती और सेवन करती थी. इस सब का उद्देश्य खुद को अमीर दिखाना था। 

दिलचस्प थी चीनी बनाने की प्रक्रिया 
गन्ने और चीनी के इतिहास की तरह चीनी बनाने का तरीका भी काफी दिलचस्प था। चीनी बनाने के लिए  बक्से के आकार की ईंट या पत्थर से भटिठयाों का निर्माण होता था। एक भट्ठी के ऊपर की तरफ तांबे से बनी हुई सात केतली रखी जाती थीं।  इन केतलियों में नीचे की तरफ राख निकालने के लिए थोड़ी जगह होती थी। इन केतलियों का आकार एक दूसरे से अलग होता था। गन्ने का गर्म रस सबसे बड़ी वाली केतली में होता था। इस केतलियों में नींबू डाला जाता था। नींबू डालने से गन्ने रस में झाग बनता था फिर झाग को हटाकर दूसरी रस को दूसरी केतलियों में भेजा जाता था। आखिरी केतली में पहुंचते-पहुंचते  गन्ने का रस एक सिरप में बदल जाता था। इस चरण के बाद रस को ठंडा करने के बाद सिरप गुड़ के टुकड़ों में बदल जाता था। इन टुकड़ों को चीनी बनाने के लिए आगे भेज दिया जाता था। 

 
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