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Cooperative Farming: डेयरी कोऑपरेटिव्स की तर्ज पर मजबूत होनी चाहिए खेती में सहकारिता, किसान बनेंगे आत्मनिर्भर

डॉ. नरेंद्र सिंह राठौड़ पूर्व उप-महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 19 May 2025 09:04 PM IST
सार

डेयरी मॉडल की सफलता को सब्जियों, अनाज और फलों की खेती तक विस्तार देकर, भारत सहकारिता के जरिए कृषि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। जानिए, कैसे सहकारी समितियां किसानों की लागत घटाकर, आमदनी बढ़ाकर और बाजार से जोड़कर बन सकती हैं कृषि विकास की रीढ़।

सहकारी खेती का मॉडल किसानों को बाजार, प्रसंस्करण और उचित मूल्य तक बेहतर पहुंच प्रदान कर सकता है।
सहकारी खेती का मॉडल किसानों को बाजार, प्रसंस्करण और उचित मूल्य तक बेहतर पहुंच प्रदान कर सकता है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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भारतीय डेयरी सहकारी समितियों की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, सब्जियों, फलों और अनाज के लिए भी सहकारिता के इस परखे हुए मॉडल को बढ़ावा देना किसानों, उपभोक्ताओं और पूरे कृषि क्षेत्र के लिए फायदेमंद हो सकता है। डेयरी सेक्टर की तर्ज पर खाद्यान्न और सब्जी उत्पादक किसानों के लिए भी सहकारिता का सशक्त मॉडल बनाकर उनकी आय तेजी से बढ़ा सकते हैं। यह मॉडल न केवल किसानों को सामूहिक शक्ति प्रदान कर सकता है, बल्कि बाजार, प्रसंस्करण और उचित मूल्य तक उन्हें बेहतर पहुंच प्रदान कर सकता है। साथ ही, उपभोक्ताओं को इसके माध्यम से ताजा उपज की निरंतर आपूर्ति भी सुनिश्चित की जा सकती है। खेती की लागत कम करने और उन्नत तकनीकों का लाभ उठाने में भी इससे मदद मिल सकती है। 

कैसी-कैसी सहकारी समितियां 
सहकारी समितियों के कार्य की प्रकृति के आधार पर इन्हें वर्गीकृत किया गया है। इनमें उपभोक्ता सहकारी समितियां, उत्पादक सहकारी समितियां, विपणन सहकारी समितियां, ऋण सहकारी समितियां, आवास सहकारी समितियां और सहकारी कृषि समितियां शामिल हैं। कई समितियां फसल उत्पादन और पशुधन प्रबंधन सहित संयुक्त कृषि गतिविधियों से जुड़ी हैं।

राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस के अनुसार, देश भर में, 30 अलग-अलग क्षेत्रों में कुल 8,42,647 सहकारी समितियां हैं। इनमें सक्रिय सहकारी संस्थाओं की संख्या 6,47,783 है, जबकि 1,48,664 संस्थाएं निष्क्रिय हैं। 1,01,890 प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पैक्स) हैं और डेयरी सहकारी संस्थाओं की संख्या 1,50,983 है, जबकि फिशरीज कोऑपरेटिव संस्थाओं की संख्या 26,616 है। वहीं, एग्रो प्रोसेसिंग/इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव 23,516 हैं। पशुपालन एवं पोल्ट्री क्षेत्र में 16,922 सहकारी संस्थाएं हैं। हैंडलूम टैक्सटाइल एवं बुनकर कोऑपरेटिव 19,559 और हस्तशिल्प के क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं की संख्या 5,191 है।

इन सहकारी संस्थाओं का संबंध सीधे तौर पर ग्रामीण भारत से जुड़ा है। हालांकि, भारत जैसे विशाल देश के लिहाज से सहकारी संस्थाओं की यह संख्या पर्याप्त नहीं है। डेयरी सहकारिता में अमूल जैसे संगठनों ने सफलता का परचम लहराया है, लेकिन इसका फायदा भी गुजरात से बाहर के राज्यों के किसानों को बहुत नहीं मिला। महाराष्ट्र की क्रेडिट सोसायटियों की धमक भी दूसरे राज्यों में वैसी नहीं है, जैसी कि मराठा राज्य में है। अब इसे बढ़ावा देने की जरूरत है। 
भारत में सबसे अधिक सहकारी समितियां महाराष्ट्र में हैं।
भारत में सबसे अधिक सहकारी समितियां महाराष्ट्र में हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र में सहकारिता 
भारत जैसा देश, जहां 60 फीसदी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों में महज 27,746 सहकारी संस्थाएं हैं, जबकि आवश्यकता अधिक है। इसीलिए, अब समग्र रूप से कृषि सहकारिता को भी बढ़ावा देने की जरूरत है।

सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद कई महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई हैं। इनमें, बहुउद्देश्यीय गतिविधियां करने वाले पैक्स के लिए मॉडल उप-नियमों का निर्माण, राष्ट्रीय सहकारी नीति का निर्माण, 63,000 कार्यात्मक पैक्स के कम्प्यूटरीकरण के लिए एक योजना का शुभारंभ, राष्ट्रीय सहकारी डाटाबेस का निर्माण, कृषि और ग्रामीण विकास बैंकों का कम्प्यूटरीकरण, सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए ऋण गारंटी निधि ट्रस्ट के साथ ऋण देने वाली सदस्य संस्थाओं के रूप में राज्य सहकारी बैंकों और जिला सहकारी बैंकों को शामिल करना, पैक्स में दुनिया की सबसे बड़ी अनाज गोदाम परियोजना का शुभारंभ, सहकारिता के माध्यम से दुग्ध उत्पादन और विपणन को बढ़ावा, प्रमाणित बीज, कृषि निर्यात एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए तीन नई राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियों का गठन शामिल है।  

यहां कुछ प्रमुख रणनीतियों का उल्लेख किया जा रहा है, जिससे किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं और पूरे कृषि क्षेत्र के लिए फायदा हो सकता है।

सुदृढ़ सहकारी समितियों का गठन : किसानों को संगठित करके उनकी सहकारी समितियां बड़ी संख्या में गठित करनी होंगी, ताकि भारत जैसे विशाल देश की विविध आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इन समितियों का विधिवत पंजीकरण सुनिश्चित करना होगा, ताकि कानूनी मान्यता मिल सके और सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। इन सहकारी समितियों मेंे सदस्यता और लोकतांत्रिक प्रबंधन की भी आवश्यकता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए। सहकारी समितियों की वित्तीय स्थिरता पर भी नजर रखना आवश्यक है। समितियों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए सदस्यता शुल्क, सरकारी अनुदान और व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से पूंजी जुटाई जा सकती है।

सामूहिक उत्पादन और योजना : मांग और आपूर्ति का विश्लेषण करके कौन-सी फसल कब और कितनी उगानी है, इसकी योजना बनाने में किसानों की मदद करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इससे अधिक उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ बर्बादी को कम किया जा सकेगा। लेकिन, मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण भी जरूरी है। सामूहिक रूप से उत्पादन करने पर गुणवत्ता और मानकों को बनाए रखना आसान होगा, जिससे बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकता है। सामूहिक खरीद को प्राथमिकता देना और बीज, उर्वरक, कीटनाशकों और अन्य कृषि इन्पुट्स की सामूहिक खरीद से लागत कम की जा सकती है। कई एफपीओ भी इस काम को अंजाम दे रहे हैं, िजन्हें सशक्त बनाना होगा।

विपणन और बाजार संपर्क : किसानों को सीधे उपभोक्ताओं, खुदरा विक्रेताओं और थोक बाजारों से जोड़ने के लिए मंच तैयार करने में कृषि सहकारी समितियां बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। वे अपने स्वयं के बिक्री केंद्र या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी स्थापित कर सकती हैं। उत्पादों की ब्रांडिंग और पैकेजिंग से किसानों को फायदा मिल सकता है। किसानों के लिए स्थिर बाजार और अच्छी कीमत सुनिश्चित करने के लिए सरकारी खरीद एजेंसियों और निजी खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों के साथ दीर्घकालिक अनुबंध स्थापित करने में ये सहकारी समितियां अहम योगदान दे सकती हैं। 

मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण : सहकारी समितियों के स्तर पर अनाज की सफाई, ग्रेडिंग, फल और सब्जियों की धुलाई, कटाई और पैकेजिंग जैसी प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने से मूल्य शृंखला को मजबूत किया जा सकता है।  

तकनीकी ज्ञान और कौशल विकास : किसानों को नवीनतम कृषि तकनीकों, फसल प्रबंधन, कीट नियंत्रण, जल प्रबंधन और जैविक खेती के बारे में नियमित प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित करके ये समितियां बड़ा बदलाव ला सकती हैं। कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और विपणन विशेषज्ञों को सहकारी समितियों से जोड़कर किसानों को समय पर उचित मार्गदर्शन मिल सकता है। मिट्टी परीक्षण, मौसम पूर्वानुमान और बाजार की जानकारी जैसी सेवाओं से किसानों की मदद की जा सकती है। 

वित्तीय सहायता और ऋण सुविधा: सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को आसान शर्तों पर ऋण मिलेगा, तो वे कृषि इन्पुट्स आसानी से खरीद सकेंगे और अन्य जरूरी निवेश कर सकेंगे। योजनाओं और सब्सिडी के बारे में जानकारी देने और इन योजनाओं का लाभ दिलाने में भी मदद मिल सकती है। किसानों को फसल बीमा योजनाओं से जोड़कर उन्हें प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से बचाने में भी ये समितियां योगदान दे सकती हैं।

बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक्स: सहकारी समितियों के स्तर पर आधुनिक भंडारणगृहों का निर्माण किया जा सकता है, जिससे किसान अपनी उपज को सुरक्षित रख सकते हैं और अच्छी कीमत मिलने पर उसे बेच सकते हैं। खेतों से बाजार तक उपज को पहुंचाने के लिए ये परिवहन सुविधाएं भी उपलब्ध करा सकती हैं। जल्दी खराब होने वाले उत्पादों के लिए शीतगृहों की व्यवस्था करके उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने में भी बड़ी भूमिका हो सकती है। डेयरी सेक्टर में सहकारिता की सफलता से सीख लेकर खाद्यान्न और सब्जी उत्पादक किसान भी एकजुट होकर इन रणनीतियों को अपनाते हैं, तो निश्चित रूप से उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे।
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