मानसून की तबाही के बाद बड़ी उम्मीद : पंचायतें बनेंगी पर्यावरण की रक्षक, ग्राम पंचायतों की सात बड़ी भूमिकाएं
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 13 Dec 2025 08:39 PM IST
सार
विदा होते मानसून ने इस साल पंजाब, हिमाचल, पूर्वी यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल में भारी तबाही मचाई। इसके लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण से ही ऐसी आपदाओं से बचाव संभव है, जिसमें पंचायतें अहम भूमिका निभा सकती हैं।
ग्राम पंचायतें जलवायु परिवर्तन से लड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
- फोटो : गांव जंक्शन
अंग्रेजी का अक्तूबर और हिंदी का आश्विन यानी क्वार का महीना उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में मानसून की विदाई का समय होता है। विदा लेता मानसून आमतौर पर हल्की बूंदाबांदी के साथ हल्की ठंड छोड़ जाता है। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं हुआ। विदा होते मानसून ने खासकर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में भारी तबाही मचाई। बिजली गिरने की घटनाएं ठीक वैसी ही हुईं, जैसी मानसून की शुरुआत में होती हैं।
पश्चिमी भारत भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार बाढ़ और अतिवृष्टि से जूझ रहा है। देवभूमि के रूप में विख्यात उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के साथ ही धरती का स्वर्ग जम्मू-कश्मीर भी भारी बारिश, भूस्खलन, नदियों के उफान और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त रहे। इन आपदाओं का सबसे बुरा असर खेती-बाड़ी, किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर पड़ता है। प्रकृति के इस बढ़ते कोप को लेकर अब आम इंसान भी मानने लगा है कि इसकी वजह जलवायु परिवर्तन है। लोग अब समझने लगे हैं कि पर्यावरण की रक्षा के जरिए ही जलवायु परिवर्तन से उपजी आपदाओं से बचाव संभव है। इसमें पंचायतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन और गांव की ओर वापसी
आधुनिक विकास की अवधारणा का मुख्य अर्थ शहरीकरण है। कई वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने शहरों पर एक अध्ययन कराया था, जो हिंदी में 'महानगर' नाम से प्रकाशित हुआ। इसके अनुसार, शहर गांवों की तुलना में अधिक ऊष्मा उत्सर्जित करते हैं। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी शहरों में गांवों से ज्यादा होता है। बिजली, पेट्रोलियम जैसे ऊर्जा संसाधनों का उपयोग भी शहरों में अधिक होता है। शहरों की बड़ी आबादी अमानवीय हालात में रहने को अभिशप्त होती है। जलवायु परिवर्तन की भयावहता को देखते हुए, अब जरूरी हो गया है कि मानवता और व्यवस्था एक बार फिर अठारहवीं सदी से पहले वाली अवधारणा की ओर लौटे। बेशक उस समय भी शहर थे, लेकिन अधिकांश आबादी गांवों में रहती थी। उस आबादी के लिए ऊर्जा की खपत कम थी और बदले में ऊष्मा का उत्सर्जन भी कम होता था।
इन सात तरीकों से बदल सकती है तस्वीर
जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में एक बार फिर गांवों की ओर ध्यान केंद्रित हो रहा है। विकास के मौजूदा मॉडल को अपनाने और स्मार्ट सिटी मिशन को तेजी से लागू करने के बावजूद देश की बड़ी जनसंख्या अब भी गांवों में रहती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की 68.8 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती है। भारत सरकार के केंद्रीय बजट 2025-26 के अनुसार, देश में लगभग 2,68,000 ग्राम पंचायतें हैं। भारत की व्यापक ग्रामीण जनसंख्या के कल्याण व सहयोग के लिए जिम्मेदार इन पंचायतों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से जंग को न केवल मजबूत किया जा सकता है, बल्कि उसे जमीनी हकीकत में भी बदला जा सकता है। भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची में पंचायतों को दिए गए अधिकारों के अनुसार, पंचायतें कम से कम सात बिंदुओं पर पर्यावरण रक्षा में मददगार साबित हो सकती हैं :
(1) स्मार्ट कृषि और भूमि विकास : अपनी विशिष्ट आधिकारिक स्थिति के चलते पंचायतें - जलवायु केंद्रित स्मार्ट कृषि पद्धति और भूमि विकास कार्यक्रम को बढ़ावा दे सकती हैं। पंचायतों के जरिए किसानों को जैविक खेती के लिए जरूरी उपायों को अपनाने की मदद दी जा सकती है। पंचायतें चाहें तो सस्ती खेती को बढ़ावा देते हुए स्वदेशी और पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देते हुए फसल की बेहतर पैदावार के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर सकती हैं।
(2) जल संसाधनों का संरक्षण एवं विकास : ग्रामीण इलाकों में स्थानीय तालाब जैसे पारंपरिक जलस्रोत तेजी से सिकुड़ रहे हैं, जिनका संरक्षण करके भूजल दोहन पर निर्भरता कम कर सकते हैं। पंचायतों के जरिए ग्रामीण इलाकों में जल संसाधनों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने और कृषि के लिए सिंचाई सुविधाओं के विकास के कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।
(3) जैव संसाधनों का विकास और वन प्रबंधन : पंचायतें जैव संसाधनों के विकास में योगदान दे सकती हैं। इसके लिए वे वन संसाधनों के सतत और हरित उपयोग को सुनिश्चित कर सकती हैं। पंचायतों के जरिए जन-भागीदारी को बढ़ावा देकर वन प्रबंधन और जंगल संरक्षण का अभियान जमीनी हकीकत बन सकता है। स्थानीय पेड़-पौधों के संरक्षण और नए वृक्ष लगाने के लिए खाली जमीनों के इस्तेमाल को भी पंचायतें बढ़ावा दे सकती हैं। इसके जरिए, जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा। इससे मिट्टी का संरक्षण तो होगा ही, स्थानीय स्तर पर परंपरा से पाए जाने वाले पक्षियों का आवागमन बढ़ सकता है और उनका प्रजनन भी बढ़ सकता है।
(4) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ एवं सतत ऊर्जा : ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की खपत कम होती है। पंचायतें चाहें तो अपने गांव की ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए स्थानीय स्तर पर सौर, पवन ऊर्जा और गोबर गैस जैसे प्राकृतिक और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ा सकती हैं। ऐसा प्रयोग कर्नाटक में सफल हो रहा है। वहां की विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा योजना के जरिए बड़ा बदलाव दिख रहा है। इसके जरिए कर्नाटक के कई गांवों में छोटे-छोटे सौर ऊर्जा केंद्र लगाए जा रहे हैं। वर्ष 2024 तक कर्नाटक के 500 से अधिक गांव सौर ऊर्जा से रोशन हो चुके हैं, जिससे लगभग 12,000 टन कार्बन उत्सर्जन कम करने में बड़ी मदद मिली है।
(5) अपशिष्ट से खाद एवं ऊर्जा उत्पादन : कृषि और अन्य जैविक अपशिष्ट के बेहतर एवं सुरक्षित निपटान के लिए पंचायतें गांवों में अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रमों को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके जरिए ऊर्जा के नए और जैविक स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। इन अपशिष्टों के जरिए जैविक खाद और जैव ऊर्जा उत्पादन भी कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए जैव संसाधन प्रबंधन को बढ़ावा देने में पंचायतों की भूमिका पर देहरादून के भारतीय वन प्रबंधन संस्थान ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन के अनुसार, पंचायतें जैव ऊर्जा परियोजनाओं के विकास में सहायक सिद्ध हो सकती हैं, जो कृषि अपशिष्ट और अन्य कार्बनिक पदार्थों का उपयोग कर नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देंगी। अध्ययन मिट्टी संवर्धन के लिए बायोचार के उपयोग का भी समर्थन करता है, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है और कार्बन संग्रहण में सहायता मिल सकती है।
(6) पशुधन प्रबंधन से कम मीथेन उत्सर्जन : गांवों की रीढ़ खेती-किसानी के बाद पशुधन हैं। पंचायतों के जरिए पालतू और दुधारू पशुओं के प्रजनन कार्यक्रमों, टीकाकरण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंधन कर सकती हैं। इनके जरिए पशुधन उद्योग को बड़ी मदद होगी। साथ ही, पंचायतें पशुधन से स्थायी अपशिष्ट प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन के लिए बायोगैस संयंत्रों के उपयोग को भी प्रोत्साहित कर सकती हैं। पशुपालन क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस मीथेन के उत्सर्जन के लिए भी जिम्मेदार है। पशुपालन के अत्याधुनिक तौर-तरीकों को अपनाकर और आहार में बदलाव करके इस उत्सर्जन को कम कर सकते हैं।
(7) विकेंद्रीकृत विकास, कम कार्बन फुटप्रिंट : ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने और स्थानीय लोगों की आय बढ़ाने के लिए पंचायतें स्थानीय हस्तशिल्प, स्थानीय पैदावार आधारित खाद्य प्रसंस्करण और खेती आधारित ग्रामीण उद्योगों के विकास को बढ़ावा दे सकती हैं। विकेंद्रीकृत ग्रामीण विकास के ऐसे मॉडल से कार्बन फुटप्रिंट कम करने में मदद मिल सकती है।
पंचायतों को अपनी ग्राम सभाओं में सामुदायिक जागरूकता अभियान चलाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। पंचायतें ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय लोगों को जलवायु परिवर्तन के कारणों और इसके परिणामों के बारे में शिक्षित कर सकती हैं। साथ ही, वे पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं को अपनाने की अपील भी कर सकती हैं, जिससे निश्चित रूप से प्रभावी परिणाम प्राप्त होंगे।
पंचायतों के माध्यम से गांवों में पारंपरिक परिवहन साधनों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा आधारित छोटे वाहनों को बढ़ावा देना आवश्यक है। यदि पंचायत स्तर पर ऐसे कदम उठाए जाएं, तो जलवायु परिवर्तन के खतरों को काफी हद तक कम कर सकते हैं और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, जिसके फलस्वरूप राज्य को सताने वाली सामाजिक समस्याएं कम होंगी। लंबे समय में इससे असमय की वर्षा, अनावश्यक तूफान और सूखा जैसी आपदाओं से भी बचाव संभव हो सकेगा।
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