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Climate Law Agriculture India Building A Legally Enforceable Roadmap For Low Emission Farming
Climate law & agriculture: कम उत्सर्जन वाली खेती के लिए भारत कानूनी रास्ता तैयार कर रहा है, किसानों को फायदा?
गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: Himanshu Mishra
Updated Sun, 07 Dec 2025 11:59 AM IST
सार
विशेषज्ञों के अनुसार सरकार और निजी क्षेत्र यदि इसे अवसर के रूप में ले, तो ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार, स्टार्ट-अप, हरित रोजगार और स्थायी अर्थव्यवस्था विकसित की जा सकती है। भारत में टिकाऊ कृषि अब केवल विचार नहीं, बल्कि एक लागू होने वाली नीति, संरचना और आर्थिक व्यवहार्यता वाला मॉडल बनता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का असर पर्यावरण के साथ-साथ खेती-बाड़ी और किसानों की आजीविका पर पड़ रहा है।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत में जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं रहा, बल्कि देश की कृषि नीति, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन गया है। मौसम के बदलते पैटर्न, तापमान में उतार-चढ़ाव, लंबे समय तक सूखा, अचानक बाढ़, मिट्टी का क्षरण और उत्पादन में गिरावट ने किसानों, बाजारों और सरकार के नीतिगत ढांचे के सामने नई जटिलताएँ खड़ी कर दी हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार अब कृषि क्षेत्र के लिए कानूनी ढंग से लागू किए जा सकने वाले नियम-कानून, प्रोत्साहन और दंडात्मक ढांचे पर जोर दे रही है, ताकि देश को टिकाऊ, कम-उत्सर्जन और आधुनिक कृषि की ओर अग्रसर किया जा सके।
जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव
कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव तेजी से बढ़ रहे हैं। प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं—
फसलों के जीवनचक्र में व्यवधान और विनाश
खेतों में जलभराव से मिट्टी क्षरण
भंडारित खाद्यान्न पर सीलन का खतरा
आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट
किसानों की आय पर दबाव और आर्थिक संकट
बीमा प्रीमियम में वृद्धि
अनिश्चित राजनीतिक और नियामकीय ढांचा
मौसम आधारित जोखिमों के कारण श्रम में बाधा
समाज और बाजार द्वारा तय किए गए ट्रांजिशन-रिस्क
कृषि वैश्विक स्तर पर लगभग 25 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। मवेशियों से निकलने वाला मिथेन, उर्वरकों से निकलने वाली नाइट्रस ऑक्साइड और कृषि मशीनरी से होने वाला कार्बन उत्सर्जन इसकी सबसे बड़ी वजह है। भारत में पराली जलाना एक प्रमुख पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य संकट है, जिसने हवा की गुणवत्ता और मिट्टी की क्षमता दोनों को प्रभावित किया है।
क्यों जरूरी हुआ लो-कार्बन एग्रीकल्चर?
कम-उत्सर्जन वाली खेती का अर्थ ऐसे मॉडल से है जिसमें न्यूनतम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन, उर्वरकों का नियंत्रित उपयोग, कम डीजल आधारित मशीनरी, पशुपालन में वैज्ञानिक प्रबंधन, जैविक अवशेषों का नियंत्रित उपयोग को प्राथमिकता दी जाती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री की वृद्धि पर कृषि उत्पादन में स्पष्ट गिरावट दर्ज होती है। ऐसे में भविष्य की खाद्य सुरक्षा सीधे-सीधे जलवायु अनुकूल कृषि से जुड़ती है।
भारत की पहलें: कानूनी और नीतिगत ढांचे की ओर बढ़ता कदम 1. कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम
भारत ने 2023 में ग्रीन क्रेडिट नियम लागू किए हैं जिसके तहत कृषि क्षेत्र से संबंधित टिकाऊ गतिविधियों पर कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र जारी किए जाएंगे। इन्हें उद्योगों, कंपनियों और अन्य संस्थाओं के बीच खरीदा-बेचा जा सकेगा। “सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’’ को आधिकारिक रूप से स्कीम में शामिल किया गया है।
2. प्रिसिजन एग्रीकल्चर
सरकार द्वारा कई तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसमें रिमोट सेंसिंग, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), ड्रोन आधारित सर्वे, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) शामिल है। इससे पानी, उर्वरक, कीटनाशक और बीज की मात्रा वैज्ञानिक तरीके से तय की जाती है, लागत घटती है और उत्पादकता बढ़ती है।
3. ‘किसान ड्रोन’ अभियान
सरकार ड्रोन तकनीक को कृषि में लागू कर रही है। ड्रोन का उपयोग इस प्रकार—
खेत निदान और सर्वेक्षण
भूमि रिकॉर्ड डिजिटाइज़ेशन
पौध संरक्षण और पोषक द्रव छिड़काव
उत्पादन अनुमान
इससे मानवीय श्रम घटता है और परिणाम वैज्ञानिक आधार पर तय होते हैं।
नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर
NAPCC के तहत स्थापित इस मिशन का मुख्य उद्देश्य कृषि को जलवायु-रेजिलिएंट बनाना है। इसके 10 मुख्य फोकस क्षेत्र—
उच्च गुणवत्ता वाले बीज और पशु-प्रजातियां
पानी का कुशल प्रबंधन
उन्नत कीट नियंत्रण
वैज्ञानिक खेती के तरीके
पोषक तत्व प्रबंधन
कृषि बीमा
क्रेडिट सहायता
विपणन ढांचा
किसानों को तकनीकी सूचना
वैकल्पिक आजीविका प्रबंधन
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और निजी भागीदारी
भारत में अब बड़े एग्री-कॉरिडोर और फूड-प्रोसेसिंग इकाइयों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि किसानों को सामूहिक उत्पादन करने का लाभ मिले, लागत कम हो, मांग-आधारित उत्पादन हो, तकनीक, स्टोरेज और सप्लाई-चेन मजबूत बने और किसानों का सौदेबाजी-क्षमता बढ़ेगी, जबकि उद्योगों को गुणवत्ता आधारित निरंतर आपूर्ति मिलेगी।
आगे की राह
भारत इस समय परंपरा और आधुनिक कृषि-संरचना के बीच खड़ा है। नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता है—
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