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Study: बायोफॉर्टिफाइड अनाज बन रहे प्रदूषण के खिलाफ भारत की नई ढाल, समझें क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

गांव जंक्शन डेस्क, नोएडा Published by: Himanshu Mishra Updated Mon, 08 Dec 2025 01:55 PM IST
सार

उद्योग जगत का अनुमान है कि यह मॉडल आने वाले समय में उपभोक्ता-आधारित खाद्य-श्रेणी में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। नीति-निर्माताओं तक मामला पहुंचने लगा है और कृषि अनुसंधान संस्थान इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सरकारी पोषण योजनाओं से जोड़ने पर विचार कर रहे हैं। 

बायोफॉर्टिफाइड अनाज बन रहे प्रदूषण के खिलाफ भारत की नई ढाल
बायोफॉर्टिफाइड अनाज बन रहे प्रदूषण के खिलाफ भारत की नई ढाल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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देश में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर अब स्वास्थ्य विशेषज्ञ सिर्फ मास्क, एयर प्यूरीफायर और अस्पतालों में बढ़ती भीड़ को लेकर चिंतित नहीं हैं, बल्कि वे पोषण स्तर में तेजी से हो रही गिरावट को भी तत्काल खतरे के रूप में देख रहे हैं। शोध बताते हैं कि दिल्ली से लेकर लखनऊ, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु तक, प्रदूषण का स्तर बढ़ने के साथ शरीर में सूक्ष्म पोषक तत्वों विशेष रूप से आयरन, जिंक, कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी बढ़ती है। इन कमी वाले पोषक-तत्वों को “पहली रक्षा पंक्ति” माना जाता है, जो फेफड़ों, प्रतिरोधक क्षमता और कोशिका-मरम्मत की प्रक्रिया को सक्षम बनाए रखते हैं।

प्रदूषण के चलते कई और समस्याएं
वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है कि प्रदूषण-प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों में सूजन, शरीर का जल्दी थकना, श्वसन समस्याएं और प्रतिरोधक तंत्र कमजोर होने की शिकायतें ज्यादा देखी जा रही हैं। ऐसे में खाने की सामान्य थाली शरीर को उतना पोषण नहीं दे पा रही, जितना कुछ दशक पहले देती थी। कृषि विश्वविद्यालयों व खाद्य विशेषज्ञों का आकलन है कि सामान्य खाद्यान्नों में मौजूद कुछ ज़रूरी पोषक तत्व पिछले वर्षों में 40 से 60 फीसदी तक घट चुके हैं।

इसी पृष्ठभूमि में कृषि वैज्ञानिकों और कुछ कंपनियों ने बायोफॉर्टिफिकेशन मॉडल को आगे बढ़ाया है। इसमें बीज से लेकर खेती और कटाई तक, अनाज को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह सामान्य खाद्यान्न की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक पोषक हो। इसमें बाहरी सप्लीमेंट, सिंथेटिक पाउडर या रासायनिक मिश्रण शामिल नहीं होते, बल्कि बीज और मिट्टी को समृद्ध किया जाता है।

देश में हो रहे परीक्षण
कई क्षेत्रों में इस मॉडल पर काम शुरू हो चुका है। पोषक तत्वों की मात्रा मापने के लिए एक्स-रे फ्लोरेसेंस तकनीक (XRF) आधारित लैब परीक्षण किए जा रहे हैं, जो किसी बैच में 20 से अधिक पोषक-तत्व और 10 से अधिक भारी धातुओं का स्तर दर्शाते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि दावा किए गए पोषण आंकड़े वास्तविक हैं या नहीं।

उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि बायोफॉर्टिफाइड रागी की एक रोटी में सामान्य गेहूं की चार रोटियों से अधिक आयरन मिल सकता है। इसी तरह भूरे चावल में जिंक की मात्रा सामान्य सफेद चावल के मुकाबले दो से तीन गुना तक पाई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन अनाजों के नियमित सेवन से लंबे समय तक प्रदूषण के प्रभाव से होने वाले पोषण-ह्रास को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में प्रदूषण का स्तर और बढ़ेगा, ऐसे में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली केवल बाहरी सुरक्षा उपायों से नहीं बचेगी। भोजन, जिसमें पोषण-स्तर प्रमाणित हो, सीधे तौर पर शरीर की क्षमताओं को मजबूत करता है।

इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का क्या कहना है?
उद्योग जगत का अनुमान है कि यह मॉडल आने वाले समय में उपभोक्ता-आधारित खाद्य-श्रेणी में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। नीति-निर्माताओं तक मामला पहुंचने लगा है और कृषि अनुसंधान संस्थान इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सरकारी पोषण योजनाओं से जोड़ने पर विचार कर रहे हैं। विशेषज्ञों की राय है कि यदि थाली में मौजूद अनाज पोषक रूप से मजबूत हुआ तो प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों से होने वाली थकान, सांस की परेशानी और संक्रमण के जोखिम कम किए जा सकेंगे। दूसरे शब्दों में, प्रदूषण के खिलाफ देश की अगली बचाव-रणनीति शायद मास्क या एयर-प्यूरीफायर नहीं, बल्कि रोटी और चावल की गुणवत्ता साबित हो सकती है।
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