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Minimum Support Price: राज्यों में एमएसपी पर खरीद में बड़ा अंतर, फसलों के सही दाम के हकदार सभी किसान

डॉ. उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Thu, 17 Jul 2025 01:38 PM IST
सार

किसान किसी भी राज्य के हों, उन्हें उनकी मेहनत का सही दाम मिलना चाहिए। लेकिन, धान की खरीद प्रणाली में क्षेत्रीय असमानता एक बड़ी चुनौती है। पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना जैसे राज्य एमएसपी पर खरीद के मामले में सबसे आगे रहते हैं तो पश्चिम बंगाल, यूपी और बिहार जैसे बड़े धान उत्पादक राज्य इस मामले में पीछे हैं।

धान की खरीद प्रणाली में क्षेत्रीय असमानता एक बड़ी चुनौती है।
धान की खरीद प्रणाली में क्षेत्रीय असमानता एक बड़ी चुनौती है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने फसल वर्ष 2024-25 के लिए अपने खाद्यान्न उत्पादन अनुमान को संशोधित कर रिकॉर्ड 35 करोड़ 39.5 लाख टन कर दिया है। इसमें धान का उत्पादन रिकॉर्ड 14 करोड़ 90.7 लाख टन होने का अनुमान है, जो फसल वर्ष 2023-24 के 13 करोड़ 78.2 लाख टन से अधिक है। भारत में धान की खेती लाखों किसानों की रोजी-रोटी का आधार है।

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किसानों को आर्थिक समर्थन प्रदान करने के लिए सरकार गेहूं और चावल की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर करती है। लेकिन, सरकार की ओर से किसानों को दिया जाने वाले एमएसपी का फायदा हर किसान को नहीं मिल पाता। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2023-24 तक के तीन सालों में सिर्फ 17.3% धान किसानों को ही एमएसपी की खरीद का लाभ मिला। इससे समझा जा सकता है कि देश के अधिकतर धान उत्पादक किसान अभी भी इस योजना से अछूते हैं। कुछ राज्य इस मामले में मीलों आगे हैं, तो कुछ बुरी तरह पिछड़े हुए हैं।  

कुछ राज्य चमके, कुछ अंधेरे में
सीएसीपी की खरीफ फसलों (2025-26) की रिपोर्ट कहती है कि धान की खरीद में राज्यों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। पंजाब में 94%, तेलंगाना में 76% और छत्तीसगढ़ में 58.8% धान किसानों को एमएसपी का फायदा मिल रहा है। दूसरी तरफ, ओडिशा में 33.7%, पश्चिम बंगाल में 15.6%, उत्तर प्रदेश में 5.8% और बिहार में महज 4.1% धान उत्पादक किसानों को एमएसपी पर खरीद का लाभ मिलता है। इससे स्पष्ट है कि इन राज्यों में एमएसपी पर खरीद के हालात खराब हैं। असम, कर्नाटक, झारखंड और बिहार में तो 5% से भी कम किसानों को खरीद का लाभ मिल रहा है। मतलब, जहां कुछ राज्यों में किसानों की बल्ले-बल्ले है, वहीं बाकी जगह किसान बस इंतजार में हैं।

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बड़े उत्पादक, छोटी खरीद
पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े धान उत्पादक राज्य हैं। वर्ष 2023-24 में, इन राज्यों की कुल धान उत्पादन में 23.7% हिस्सेदारी थी। लेकिन, जब बात विपणन योग्य अधिशेष (जो धान बेचने के लिए उपलब्ध है) की आती है तो पश्चिम बंगाल का सिर्फ 9.4% और उत्तर प्रदेश का 11.8% हिस्सा इस दायरे में रहा। एमएसपी खरीद में तो ये राज्य और भी पीछे रहे। पश्चिम बंगाल का 3.7% और उत्तर प्रदेश का 7.4% धान एमएसपी पर खरीदा गया। दूसरी तरफ, पंजाब (92.4%), हरियाणा (74.1%) और छत्तीसगढ़ (73.8%) जैसे राज्यों ने अपनी उपज का बड़ा हिस्सा एमएसपी पर बेचा। एमएसपी से जुड़ा यह अंतर बताता है कि बड़े धान उत्पादक राज्यों में खरीद की व्यवस्था कमजोर है।
 
वर्ष 2017 से 2021 के बीच देखें तो एमएसपी से लाभ पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ी है।
वर्ष 2017 से 2021 के बीच देखें तो एमएसपी से लाभ पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ी है। - फोटो : गांव जंक्शन
बाजार के आगे फीकी एमएसपी की चमक
वर्ष 2017 से 2021 के बीच देखें तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खरीद योजना से लाभ पाने वाले किसानों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2021 में यह संख्या 1.31 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। लेकिन, वर्ष 2021-22 से इसमें गिरावट शुरू हो गई। वर्ष 2023-24 में सिर्फ 1.1 करोड़ किसानों को इस योजना से फायदा मिला, जो वर्ष 2022 की तुलना में 19% कम है। बाजार में धान की ऊंची कीमतों के चलते कई बार किसान एमएसपी के बजाय निजी व्यापारियों को अपनी फसल बेचना अधिक मुनासिब समझते हैं। इसी से समझा जा सकता है कि बाजार की चमक एमएसपी की चमक को कैसे फीका कर रही है। 

कितनी हुई खरीद, कहां गया धान?
वर्ष 2023-24 के दौरान अक्तूबर से सितंबर तक चलने वाले खरीद  सत्र में एफसीआई और राज्य एजेंसियों ने 52.54 मिलियन टन चावल खरीदा। वर्ष 2024-25 सीजन में अब तक 46 मिलियन टन से ज्यादा की खरीद हो चुकी है। इस चावल का बड़ा हिस्सा यानी 38 मिलियन टन, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत गरीबों को बांटा जाता है। बाकी चावल एफएसीआई के बफर स्टॉक में जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। धान खरीदने के बाद उसे मिलर्स को दिया जाता है, जो इसे चावल में बदलते हैं। धान से चावल बनने का अनुपात 67% होता है - यानी 100 किलो धान से 67 किलो चावल प्राप्त होता है। 

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सबसे अधिक खरीद करने वाले राज्य
पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना देश की 90% से ज्यादा धान खरीद में योगदान देते हैं। इन राज्यों में मजबूत खरीद व्यवस्था, अच्छे भंडारण और बेहतर लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था है। ये राज्य न सिर्फ धान की खेती में आगे हैं, बल्कि अपनी उपज को एमएसपी पर बेचने में भी अग्रणी हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े उत्पादक राज्य इस दौड़ में काफी पीछे हैं। 

ऐसे दूर हो सकती हैं रुकावटें
सीएसीपी का कहना है कि बिहार, पश्चिम बंगाल, यूपी और तमिलनाडु जैसे राज्यों में खरीद प्रक्रिया मजबूत करना जरूरी है। कई राज्यों में वेयरहाउस की कमी के चलते किसान अपनी उपज एमएसपी पर नहीं बेच पाते। सरकार को भंडारण सुविधाएं बढ़ानी होंगी। साथ ही, खरीद प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने की जरूरत है, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इसका फायदा उठा सकें। कई किसानों को एमएसपी योजना की पूरी जानकारी नहीं है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को किसानों तक पहुंचकर उन्हें जागरूक करना होगा।

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धान की एमएसपी पर खरीद में इस असमानता को दूर करने के लिए सरकार को एक ठोस रणनीति बनानी होगी। कम खरीद वाले राज्यों में खरीद केंद्र बढ़ाने, भंडारण सुविधाए मजबूत करने और किसानों को तकनीकी सहायता देने की जरूरत है। साथ ही, बाजार की ऊंची कीमतों का मुकाबला करने के लिए एमएसपी को और आकर्षक करना होगा। अगर इन कदमों को सही तरीके से लागू किया जाए तो ज्यादा किसानों को एमएसपी का फायदा मिल सकेगा और उनकी आय बढ़ेगी। बेहतर भंडारण, पारदर्शी खरीद प्रक्रिया और किसानों में जागरूकता बढ़ाकर सरकार न सिर्फ ज्यादा किसानों को एमएसपी का लाभ दे सकती है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र के विकास को भी मजबूत कर सकती है। 

क्या होता है एमएसपी? 
एमएसपी सरकार द्वारा निर्धारित एक मूल्य है, जो किसानों को उनकी फसलों के लिए एक निश्चित आय सुनिश्चित करता है, खासकर जब बाजार मूल्य कम होता है। सरकार किसानों से उनकी फसलें एमएसपी पर खरीदती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है। एमएसपी का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिए एक सुरक्षित मूल्य प्रदान करना और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना है। एमएसपी सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल्य है। सरकार 22 प्रमुख फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित करती है, जिसमें अनाज, दालें, तिलहन और वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं।


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