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From Bengal S Muri To Bihar S Bhunja A Simple Taste That Encapsulates The Entire Culture Of Eastern India
बंगाल की मुड़ी से बिहार के भूंजा तक : एक साधारण स्वाद समेटे है पूरे पूर्वी भारत की संस्कृति...
डॉ. देवेंद्रनाथ तिवारी, लोक संस्कृति एवं संचार अध्येता
Published by: Devesh Saraswat
Updated Tue, 21 Apr 2026 09:06 AM IST
सार
पश्चिम बंगाल के झारग्राम की एक दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झालमुड़ी खाई और लोक-परंपरा से जुड़े चबैना की चर्चा इंटरनेट पर वायरल हो गई। यह केवल नाश्ता नहीं है, बल्कि यह जनजीवन की वह चलती-फिरती भाप है, जो तवे, ठेले, पगडंडी, स्टेशन, अखाड़े, मेले और घर की दहलीज तक फैलती है।
झाल-मुड़ी का नाम आते ही सड़क, धूल, शाम और चटोरी जीभ का परिचित संसार खुल जाता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
पश्चिम बंगाल के झारग्राम की एक दुकान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झालमुड़ी क्या खाई, इस चटपटे और सरसों की तेल की देसी महक से भरे इस चबैना की चर्चा दुनियाभर में वायरल हो गई। इंस्टाग्राम पर चौबीस घंटों में दस करोड़ बार इसे देखा गया। फेसबुक पर नौ करोड़ लोगों ने देखा। गूगल पर झालमुड़ी के सर्च पिछले 22 सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए। एक साधारण स्ट्रीट स्नैक रातोंरात वैश्विक हो गया। यह केवल भोजन का प्रसार नहीं है। लोक-स्वाद का उत्सव है। ठेले से सीधे करोड़ों स्मृतियों तक।
झाल-मुड़ी का नाम लेते ही एक अनगढ़-सा, पर परिचित-सा संसार खुलता है। उसमें सड़क है। धूल है। शाम है। चटोरी जीभ है। और है एक ऐसा स्वाद, जो अपने छोटे कद में भी बहुत बड़ी सांस्कृतिक स्मृति ढोता है। यह केवल नाश्ता नहीं है, बल्कि यह जनजीवन की वह चलती-फिरती भाप है, जो तवे, ठेले, पगडंडी, स्टेशन, अखाड़े, मेले और घर की दहलीज तक फैलती है। इसके भीतर भूख भी है, उत्सव भी है। और है वह देसी चंचलता, जो हमारे खान-पान को रसग्रहण नहीं, जीवनग्रहण बना देती है।
झाल शब्द अपने-आप में चौंकाता है। यह तीखापन है। यह रस का वह ताप है, जो स्वाद को जगाता है। और मुड़ी। मुढ़ी। मुरमुरा। लाई। यह दाने का हल्का हो जाना है। हवा में फूल जाना है। जैसे कोई साधारण वस्तु, अग्नि-स्पर्श से, अपनी सीमा तोड़ दे। धान का यह प्रस्फुटन भारतीय भोजन-संस्कृति की एक बड़ी विशेषता है। हम भोजन को केवल पकाते नहीं। उसे रूपांतरित करते हैं। मुरमुरा इसी रूपांतरण का लोक-रूप है। धान, जो खेत में भारी है, दाना बनकर थाली में उतरता है, और फिर आग की छुअन से इतना हल्का हो जाता है कि मुट्ठी में समा जाए। यह हल्कापन ही उसका सौंदर्य है। और यही उसका दार्शनिक संकेत भी है।
भारत में मुरमुरा या लाई का उपयोग बहुत व्यापक रहा है। यह केवल एक सामग्री नहीं, एक बुनियादी खाद्य-संस्कृति है। कहीं इसे गुड़ के साथ खाया गया। कहीं दूध में डुबोकर। कहीं नमक-तेल के साथ। कहीं भुजिया, आलू, प्याज और नींबू के साथ। कहीं प्रसाद की तरह। कहीं उपवास के साथी की तरह। कहीं खेत से लौटे किसान का सहचर। कहीं स्कूल से निकले बच्चे की तृप्ति। कहीं रेल यात्रा में पोटली में बंधा हुआ सहारा। यह सस्ता भी है। सुगम भी। शीघ्रग्राही भी। और इसीलिए यह जनपद का भोजन है। इसमें विलंब नहीं है। तामझाम नहीं। यह तत्काल का स्वाद है। तत्काल की संतुष्टि है। फिर भी इसमें लोक की लय है। और लोक की यह लय किसी महंगे व्यंजन से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
झाल-मुड़ी का भूगोल बड़ा दिलचस्प है। इसे केवल बंगाल की देन कहना अधूरा होगा। इसका एक केंद्र पूर्वी भारत की वह साझा खाद्यभूमि है, जहाँ बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और असम की सीमाएँ स्वाद के स्तर पर एक-दूसरे में घुलती हैं। बंगाल में मुड़ी है। बिहार में मुढ़ी है। कुछ जगह मुड़ी या मूढ़ी भी सुनाई देती है। झारखंड में यह और भी देसी, और भी निकट, और भी खेत-मड़ैया से जुड़ी हुई लगती है। यही कारण है कि झाल-मुड़ी का इतिहास किसी एक प्रदेश की संपत्ति नहीं बनता। यह साझा लोक-इतिहास का स्वाद है। इसमें नदी है। रेल है। बाजार है। कच्ची सड़क है। और प्रवासी जीवन की स्मृति भी है। जहाँ लोग जाते रहे, वहाँ अपना भोजन भी ले गए। और जहाँ गए, वहाँ का तेल, मिर्च, चना, मूंगफली, धनिया, प्याज, टमाटर, आलू और नींबू मिल गया। इस तरह एक ऐसा व्यंजन बना, जिसकी सीमा नक्शे से तय नहीं होती।
बंगाल की मुड़ी बिहार में भूँजा बन जाती है-यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं, स्वाद का भी है।
- फोटो : गांव जंक्शन
बंगाल की मुढ़ी अपनी पहचान में कोमल है। उसमें एक प्रकार की घरेलू विनम्रता है। बंगाली भोजन में मुढ़ी का स्थान बड़ा स्वाभाविक है। सुबह हो या शाम, चाय के साथ हो या तरकारी के साथ, वह सहजता से उपस्थित हो जाती है। इसी सहजता से लोक की बोली में, उसके व्यंग्य में, उसके मुहावरों में, मुढ़ी जगह बना लेती है। “घर बिगाड़े बूढ़ी, पेट बिगाड़े मुढ़ी” जैसी कहावत इस खाद्य का लोकजीवन में रचा-बसा होना बताती है। कहावत में चुटीलापन है। जन-अनुभव है। और थोड़ा-सा हँसता हुआ जीवन-दर्शन भी। भोजन का यह रूप केवल पेट नहीं भरता। वह कहावतें भी रचता है। व्यवहार भी बनाता है। आदतें भी गढ़ता है।
अब बंगाल की यही मुढ़ी बिहार आते-आते भूँजा में बदल जाती है। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं है। स्वाद-बोध का भी है। बिहार की खाद्य-संस्कृति में भुना हुआ, तला हुआ, सेंका हुआ, मसालेदार और ठोस स्वाद अधिक गाढ़ा होकर आता है। वहाँ मुढ़ी में अक्सर भूँजे चने, भुजिया, मूंगफली, सरसों तेल, प्याज, हरी मिर्च, नमक, नींबू और कभी-कभी सत्तू या आलू की संगति हो जाती है। “भूँजा” अपने नाम में ही भूनने की गंध रखता है। वह मुरमुरे की कोमलता को थोड़ा कठोर बनाता है। उसे चरित्र देता है। बिहार की मुढ़ी ऐसे ही भूँजा में प्रवेश करती है, जैसे नदी का पानी मिट्टी में घुलकर नया रंग ले ले। यहाँ भूगोल स्वाद के साथ जुड़ जाता है। जनपद की जलवायु, श्रम, बाजार और जीवन-संघर्ष सब कुछ मिलकर व्यंजन का रूप बदलते हैं।
झाल-मुड़ी के भीतर सरसों तेल की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल तेल नहीं है। यह पूर्वी भारत की रसोई की पहचान है। इसकी तीखी गंध ही बताती है कि खाना तैयार है। उसमें देहात की मिट्टी है। कच्चे खेत हैं। हरी सब्जियों की स्मृति है। और है वह निर्भीक स्वाद, जो किसी चर्बीदार कृत्रिमता के सहारे नहीं चलता। सरसों तेल झाल-मुड़ी को केवल रस नहीं देता। वह उसे प्रादेशिकता देता है। यही वह बिंदु है जहाँ यह व्यंजन बंगाल की सौम्यता और बिहार की उग्रता के बीच एक पुल बन जाता है। मुढ़ी दोनों जगह है। अंतर है तो संयोजन का। कहीं वह तरकारी की संगति में नरम होती है। कहीं भूँजे के साथ तीखी। कहीं भोज्य है। कहीं व्यंग्य है। कहीं शाम का सन्नाटा है। कहीं बाजार का शोर।
महाराष्ट्र में इसी परिवार का एक स्वाद है भेल-पुरी। यह झाल-मुड़ी का समकक्ष है। पर उसका स्वभाव अलग है। भेल-पुरी में इमली है। खटाई है। सेव है। कभी चटनी है। कभी कच्चे आम की छुअन है। वह समुद्र-तट और नगर-जीवन के बीच पला स्वाद है। उसकी चाल तेज है। उसका रंग चटक है। झाल-मुड़ी में सरसों तेल की गंध है। उसमें पूर्वी भारत की चिकनी मिट्टी की आर्द्रता है। उसमें शाम का धुंधलका है। भेल-पुरी और झाल-मुड़ी दोनों सड़क के व्यंजन हैं। दोनों में तत्कालता है। दोनों में हाथों की चपलता है। पर एक पश्चिमी तट की खुली हवा में बनती है, दूसरी पूरब की नम मिट्टी और नदी-किनारे की स्मृति में। यही भारतीय खान-पान की सबसे सुंदर बात है। एक ही आधार अनेक रूप धारण कर लेता है। मुरमुरा वहीं का वहीं रहता है। मनुष्यता उसका अर्थ बदलती रहती है।
झाल-मुड़ी की विधि भी उसकी संस्कृति का हिस्सा है। इसे बनाने में कोई आडंबर नहीं। कटोरे में मुढ़ी। साथ में अंकुरित चना। उबला आलू। बारीक कटा प्याज, टमाटर, हरी मिर्च। मुंगफली। भुनी हुई सामग्री। ऊपर से सरसों का तेल। नींबू का रस। नमक। धनिया। लाल मिर्च। फिर सबका मिलन। यह मिलन जितना सरल दिखता है, उतना ही अर्थपूर्ण है। इसमें कोई एक वस्तु प्रधान नहीं। सब साथ हैं। सब बराबर हैं। जैसे लोकजीवन में भिन्न-वर्ग, भिन्न-वर्गीय स्वाद, भिन्न ऋतुएँ एक ही प्लेट में आ मिलती हैं। झटपट खाने की सलाह भी इसमें छिपी है। क्योंकि मुढ़ी देर तक नहीं रहती। वह हवा खींच लेती है। नम हो जाती है। अपनी कुरकुराहट खो देती है। यह भोजन क्षण का है। और क्षणभंगुरता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
इसमें सामाजिक इतिहास भी है। झाल-मुड़ी बाजारों का भोजन है। मेलों का भोजन है। स्टेशन का भोजन है। रिक्शेवाले का भोजन है। छात्र का भोजन है। दफ्तर से लौटते आदमी का भोजन है। यह बड़े घर की दावत नहीं। पर छोटे घर की बड़ी राहत है। इसकी अर्थव्यवस्था भी जनतांत्रिक है। थोड़े से धन में स्वाद। थोड़े से समय में तृप्ति। थोड़े से श्रम में सृजन। यही कारण है कि यह भोजन केवल पेट का नहीं, जीवन-शैली का संकेतक भी है। जो समाज अपने स्वाद को इतनी सहजता से रच ले, वह अपनी स्मृतियों को भी बचाए रखता है।
झाल-मुड़ी की लोकगंध भी उल्लेखनीय है। इसमें कच्चे प्याज की तीक्ष्णता है। नींबू की ताजगी है। सरसों तेल की साँस है। भुनी मूंगफली की गरमाहट है। और मसालों की वह चुटकी, जो जीभ पर पड़ते ही बचपन, गली, दादी, अम्मा, ठेला, बारिश, धूल, स्कूल-बस्ता, सब कुछ जगा देती है। झाल-मुड़ी जैसे भोजन पर लिखते समय रसना के साथ स्मृति भी चल रही है। छपरा याद आ रहा है। अशोक जी का ठेला। और स्मृति के साथ संस्कृति भी।
यदि गौर से देखें, तो झाल-मुड़ी की पहचान में भारतीयता के कई सूत्र एक साथ बंधे हैं। धान का कृषि-संबंध। तेल का देसीपन। नींबू की अम्लता। मिर्च की चुभन। प्याज की सरलता। चने का प्रोटीन। मूंगफली की आत्मीयता। और मुरमुरे की हवा-भरी हल्कापन। यह भोजन इसीलिए इतना प्रिय है कि यह किसी एक स्वाद पर नहीं टिकता। यह एक राग है। कई सुरों से बना। बहुतों की जीभ पर बसता हुआ। और फिर भी अपना।
झाल-मुड़ी का भूगोल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह पूर्वी भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को बताता है। खेत से निकला धान, मिल में फूला, बाजार में बिका, ठेले पर सजा, हाथों में मिला, और जीभ पर उतर गया। बीच में कितने ही प्रदेश आए। कितनी ही बोलियाँ आईं। पर दाने की आत्मा वही रही। बंगाल की मुढ़ी, बिहार का भूँजा, झारखंड की देसी तासीर, ओडिशा का सहज स्वाद, और महानगरीय सड़क का नया रूप। सब मिलकर झाल-मुड़ी की कथा बनाते हैं। यह कथा बताती है कि भारत का भोजन सिर्फ रसोई में नहीं बनता। वह यात्रा में बनता है। मेलजोल में बनता है। आदान-प्रदान में बनता है। और सबसे अधिक भूख में बनता है।
अंततः झाल-मुड़ी कोई साधारण नाश्ता नहीं। वह भूगोल की कविता है। लोकजीवन का संक्षिप्त इतिहास है। भाषा का स्वाद है। क्षेत्रीयता की खुली किताब है। बंगाल की मुढ़ी से शुरू होकर बिहार के भूँजा तक पहुँचने वाली यह यात्रा बताती है कि भारतीय खान-पान किसी दीवार से नहीं, एक-दूसरे में उतरने से बनता है। झाल-मुड़ी में यही उतरना है। यही मिलन है। यही चटपटापन है। यही लोक की आत्मा है। और शायद इसी कारण, एक मुट्ठी मुढ़ी में पूरा पूर्व भारत अपने मौसम, अपनी मिट्टी, अपने श्रम और अपनी स्मृति के साथ हँसता हुआ दिखाई देता है।
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