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ग्रामयुग: जिंदगी की तपती दुपहरी में याद आती है गांव की अमराई की ठंडी छांव

उमेश चतुर्वेदी Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 29 Jul 2025 03:43 PM IST
सार

आम के पल्लव के बिना पूजा-आचमन और शुभ संस्कार अधूरे हैं। भारत की जीवन शैली ही नहीं, जीवन है आम, जिसमें संस्कृति और परंपरा समाहित है, जो विरह और मिलन का बहाना है, बच्चों के उत्पात का गवाह है, तो दोस्तों के बीच रसाल रंग बहाने का जरिया भी है।  

गांव में आम का मौसम उत्सव से कम नहीं होता। बच्चे तो आम के बगीचे में पहुंचने का मौका खोजते रहते हैं।
गांव में आम का मौसम उत्सव से कम नहीं होता। बच्चे तो आम के बगीचे में पहुंचने का मौका खोजते रहते हैं। - फोटो : दुर्गादत्त पांडेय
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विस्तार
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आधा बैसाख बीत चुका है, सूरज देव फजीरे (सुबह) से ही आग बरसाने लगे हैं। स्कूलों में छुट्टियां हो चुकी हैं, गरमी की लंबी छुट्टियां। घर-घर उदबाहन (उत्पाती) बच्चों से परेशान है। दिनभर धमाचौकड़ी, शोर-शराबा मचा रहता है। घर की बड़ी-बूढ़ी दादी-ईया इस उदबाहन हंगामे से परेशान हैं। इस बीच मोहल्ले का सबसे बड़ा उत्पाती अवतरित होता है। उत्पाती आवाजें मंद पड़ जाती हैं, मानो सभी शांत हों, इशारों में बात होती है। अचानक माहौल में सन्नाटा छा जाता है। धीरे से पहले एक निकलता है, मां टोके उससे पहले ही बहाना सोच लिया गया है...आ रहे हैं ट्यूबवेल से नहाकर...और देखते ही देखते मोहल्ले की उत्पाती सेना बगीचे में अमराई के बीच पहुंच जाती है। 

सिल-बट्टे पर पिसी आम की चटनी 
मोहल्ले के बाबा भी लंबी छुट्टी पर गांव आ चुके हैं, कलकत्ता में नौकरी करते हैं, बैंक में चपरासी हैं। वह सुबह चाय पीकर नहाने चले जाते हैं। पड़ोसी के ट्यूबवेल पर ठंडे पानी की धार में नहाने जैसा आनंद और कहां है। नहाने से पहले वह टिकोरे की खोज में अमराई का एक चक्कर लगा आते हैं। टिकोरे का दिन बीत चुका है...तो यों कहें कि कच्चे आम की खोज में हैं। अपने-आप गिरा मिल गया तो ठीक...नहीं तो किसी से तोड़वा लेंगे...ज्यादा नहीं, बस दो-तीन आम चाहिए। लौटते वक्त ट्यूबवेल के तरसोत (गीली ) जगह पर अपने आप उगे और खिले पुदीने की कुछ पत्तियां भी साथ लेते जाते हैं। घर पहुंचते ही आम और पुदीना गृहस्थिन को पकड़ा देते हैं। चैत-बैसाख और ज्येष्ठ की दोपहरी में सिल-बट्टे पर पिसी आम और पुदीने की चटनी का दाल-भात के साथ जो स्वाद मिलता है, उसका जवाब नहीं है। बाबा ही क्यों, तकरीबन हर घर की यही कहानी है। आम की चटनी तभी से सिल-बट्टे पर पीसी जाने लगती है। जब से आम के दाने गोटगर या कहें कि बड़े टिकोरे या अमिया के रूप में विकसित होने लगते हैं।

बचपन से हमने पढ़ा है, आम फलों का राजा है। आम को संस्कृत में रसाल कहते हैं। रसाल यानी रस से सराबोर। इसके रस का कमाल है कि आम सभी को लुभाता है। आम चाहे कच्चा हो या पक्का, उसे देखकर हाथ लपक उठते हैं, नजरें लालची हो जाती हैं। रसाल के लालच से भला कौन बचा है, जो बच गया, वह या तो देवता है या कुछ और, मनुष्य तो कतई नहीं। 

आम की मंजरियों का मौसम 
बसंत पंचमी बीतने के साथ ही आम के पेड़ों पर ध्यान जाना शुरू हो जाता है। बौर आए कि नहीं, कितना बौर आया है, इस बार आम की फसल कैसी होगी? इस तरह की उधेड़बुन पूरे गांव में शुरू हो जाती है। पेड़ बौर से गदरा गया तो आंखें चमक उठती हैं, इसी उम्मीद में कि इस साल की गर्मी स्वर्ग का सुख देगी। गर्मियों के स्वर्ग को हर वह जीभ जानती है, जिसने पके आम के रस को चखा है। मंजरियों से गदराए आम के पेड़ का सौंदर्य भी लुभाता है। सिर्फ मधुमक्खियों और भौरों को ही नहीं, मनुष्य को भी। बसंत में मन बौरा जाता है, लोकगीतों में यह बौराना भरा पड़ा है। मंजरियों से उठती गंध से सराबोर माहौल जैसे मादक हो जाता है। इस माहौल में भी पिया घर न लौटे तो विरह के स्वर फूट पड़ना स्वाभाविक है। रोटी के चक्कर में अपने घर से दूर हाड़तोड़ मेहनत करना भोजपुरी माटी का पुराना दर्द रहा है। मान को भुलाकर, अपमान का दर्द झेलना, ताकि पीछे छूटे घरवालों को रोटी मिल सके। बसंत में पीछे छूट गई नवेली की मिलन की चाह बढ़ जाती है। फगुआ में प्रियतम का इंतजार कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है, लेकिन प्रियतम नहीं लौटे हैं तो विरहिणी के बोल फूट पड़ते हैं:

अमवां मोजराइ गइले, महुआ कोचइले
बाकी चइतो में राजा हमार घरवा न अइले


विरहिणी का दर्द बढ़ चुका है कि आम में मंजरी लग गई हैं, महुआ में कोच भी लग गए हैं, लेकिन इस चैत में उसके पिया घर नहीं लौटे। कुछ सौभाग्यशाली भी हैं, क्योंकि गदराए आम-महुआ के सीजन में उनके पिया लौट आए हैं। लेकिन, उन्हें गांव-जवार के मिलन से फुरसत नहीं है। फसल की कटाई भी चल रही है। पीछे छूटे बाबूजी और भाई का साथ देना है। गृहस्थिन सज-धज कर बाट जोह रही है कि पिया उसकी ओर देखें, लेकिन भरे-पूरे घर में प्रिय के लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होता। ऐसा नहीं कि उनका मन मिलन के लिए नहीं छटपटा रहा, लेकिन घर-परिवार की चौतरफा डटी नजरें और नेह-दुलार के बीच निकल पाना कठिन है। ऐसे में, नायिका को आम का ही सहारा लेना पड़ता है...मंजरियों और कोच से भरे आम और महुआ का।

अमवां-महुअवा के झूमे डरिया
तनी ताकी न बलमुआ हमरी ओरिया

गरमी में बच्चों की लंबी छुट्टियां गांव में आम के बगीचे में गुजरती हैं।
गरमी में बच्चों की लंबी छुट्टियां गांव में आम के बगीचे में गुजरती हैं। - फोटो : स्टॉक
नायिका आम और महुआ की मंजरी और कोच के जरिए खुद की तुलना कर रही है और अपनी ओर प्रियतम का ध्यान बंटाना चाहती है। मिलन और विरह का प्रतीक ही नहीं है रसाल, बल्कि बेटी की विदाई के दर्द को जब अभिव्यक्ति देनी होती है, तो लोककवि की कल्पनाओं में भी आम कुछ इस तरह शामिल हो जाता है-

अमवां से मीठि महुईया ए बाबा

विदा होती बेटी को अमराई की याद आती है, जो पीछे छूट रही है और यह छूटना उसके दिल में अजीब-सी हूक पैदा करता है। इसी दर्द में ये बोल फूट पड़ते हैं, जिसमें बेटी पिता से कहती है- हे बाबा, आम से ज्यादा मीठा महुआ है। 

पेड़ की फुनगी पर चढ़ जाते हैं बच्चे
आम और उसकी अमराई उत्पाती बच्चों का पसंदीदा है। यह उसकी खासियत ही है कि सिर्फ एक पके हुए पीले आम के लिए बच्चे पेड़ की फुनगी पर चढ़ जाते हैं। बुढ़िया आन्ही यानी तेज तूफानी आंधी की भी उन्हें परवाह नहीं रहती। कोशिश बस यही होती है कि आम हाथ आ जाए, न आए तो डाल को हिलाकर या किसी फुनगी से मारकर आम नीचे गिरा लो और फुर्ती से उतरकर उसका स्वाद लो। आम का स्वाद देवरस से नहीं भरा होता, तो भला मृत्यु का सामना करने भला कोई क्यों जाता। आखिर, पके आम की ऊंची पतली टहनी पर चढ़ना मौत को आमंत्रण देना ही तो है। 

अपने हर रूप में आम देता है आमंत्रण 
आम हर रूप में पसंद किया जाता है, टिकोरा है तो धनिये और पुदीने के साथ मस्त चटनी का स्वाद मिलता है और थोड़ा बड़ा हुआ और गुठली लग गई तो चटपटा अचार का कच्चा माल बन जाता है। गर्मियों में शायद ही कोई घर होगा, जहां आम महाराज अपनी फांकियों के साथ मसालों के बीच धूप में अपनी परीक्षा न दे रहे हों। इस परीक्षा में बनकर तैयार हुआ आम का अचार बरसात और जाड़े में रोटी हो या भात, पूड़ी हो या कुछ और...स्वाद ग्रंथियों को जगाने के लिए अक्सर याद किया जाता रहता है। आम पक गया हो तो फिर क्या ही पूछना!
पूजा-अनुष्ठान आम के पल्लव के बिना अधूरे माने जाते हैं।
पूजा-अनुष्ठान आम के पल्लव के बिना अधूरे माने जाते हैं। - फोटो : गांव जंक्शन
फलों का राजा यूं ही नहीं है आम 
जिस तरह राजा अपनी प्रजा के लिए हर मौके पर काम आता है, आम भी हर रूप में उपयोगी है। कच्चे आम को छील-काटकर सुखाकर खटाई और अमचूर बना लिया जाता है, जिसका उपयोग कभी सब्जी तो कभी चटनी में होता है। कच्चे आम को गुड़ के साथ उबालकर और उसमें हल्का नमक-मिर्च डालकर खट्टा-मीठा गुरम्मा भी खूब चटकारे लेकर खाया जाता है। पके आम के रस में रोटी तोड़कर खाने में बाबा को खूब आनंद आता था। आम पकने के साथ ही अमावट बनाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। दादी अम्मा पके आम का रस निकालकर उससे अमावट बना लेती हैं। अमावट बनाने की प्रक्रिया भी जबरदस्त है। आम का रस निचोड़ा, धूप में प्लास्टिक शीट या साफ कपड़ा बिछाया और रस की मोटी परत उस पर बिछा दी, रस की परत सूख गई तो उसे उठाकर रख लिया। यह प्रक्रिया आम के मौसम में हर दिन दोहराई जाती है, जिससे अमावट की परत धीरे-धीरे मोटी होती रहती है। अमावट बन गया तो उसे किसी सूखे और अंधेरे कोने में डाल दिया जाता है। आम का सीजन बीतने के बाद जब-जब रसाल का रस याद आएगा तो यह अमावट ही काम आएगा।

गंवई जीवन में आम से जुड़ा हर कदम उल्लास का बहाना रहा है। बगीचे में भीड़ लगी हुई है और आम तोड़ा जा रहा है। अचार के लिए आम की फांकें तैयार करते वक्त मोहल्ले भर की चूड़ियां खनक रही हैं। दादी-ईया मसाला तैयार कर रही हैं और पड़ोस की चाची और फुआ फांकियों में मसाला भर रही हैं। अमावट बन रहा है। पड़ोसी चाची के साथ अम्मा आम को छील रही हैं, उसका रस निकालकर बर्तन में रख रही हैं। सारे आम से रस निकाले जा चुके हैं और फिर धूप में कपड़ा बिछाया जा रहा है, उस पर आम के रस की परतें बिछाई जा रही हैं, तपती धूप में अमावट की तह बैठाई जा रही है। 

आम की फांके देसज सौंदर्य का भी जरिया होती हैं। भिखारी ठाकुर की नायिका की आंख कंटीली है...इतनी कंटीली कि उन्हें दूसरा कोई उपमान नहीं सूझता- अंखिया जइसे अमवां के फंकिया।

पूजा-आचमन में आम का पल्लव   
आम पवित्र है, उसके पल्लव के बिना पूजा और आचमन की कल्पना नहीं की जा सकती। शादी-विवाह हो या मुंडन-जनेऊ या श्राद्ध, हर मौके पर पंडितजी घर के नाई से जिन वस्तुओं की मांग करते हैं, उनमें आम का पल्लव सबसे पहला होता है। जनेऊ की पटरी हो या विवाह का पीढ़ा, वह तैयार होगा तो सिर्फ आम की ही लकड़ी से, आम की सूखी लकड़ी के बिना हवन हो नहीं सकता। 

भारत की जीवन शैली ही नहीं, जीवन भी है आम, जिसमें संस्कृति और परंपरा भी समाहित है, जो विरह और मिलन का बहाना भी है, बच्चों के उत्पात का गवाह है, तो दोस्तों के बीच रसाल रंग बहाने का जरिया... तभी तो वह बन पाया है फलों का राजा... रसों का राजा... यानी रसाल। 
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