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मेघालय का कोंगथोंग गांव : जहां जन्म के समय सीटी से होता है नामकरण और मौत के बाद स्मृति बन जाती है सीटी की धुन

विनीता परमार, शिलॉन्ग से लौटकर Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 15 Jul 2025 06:37 PM IST
सार

पूर्वी खासी हिल्स की गोद में बसे गांव कोंगथोंग में जन्म के समय हर मां अपने बच्चे का नामकरण सीटी की धुन से करती है। सीटी की धुन जीवनभर साथ चलती है और मौत के बाद वह एक स्मृति बन जाती है। संवाद, संस्कृति और भावनाओं से जुड़ी यह जीवंत परंपरा जिंगरबाई कहलाती है।  

मेघालय के हरे-भरे पहाड़ों में बसा है सीटी वाला गांव कोंगथोंग, जहां हर सीटी की अपनी कहानी है।
मेघालय के हरे-भरे पहाड़ों में बसा है सीटी वाला गांव कोंगथोंग, जहां हर सीटी की अपनी कहानी है। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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मेघालय, भारत के उत्तर-पूर्व में बसा राज्य, जहां बादल धरती को छूते हैं और बारिश संगीत बनकर बरसती है। शिलॉन्ग इस राज्य की राजधानी है, जो यहां आने वाले हर यात्री के सपनों की शुरुआत का केंद्र है। शहर की चकाचौंध छोड़कर पूर्वी खासी हिल्स की ओर निकलते हैं तो असली जादू शुरू होता है। 

घाटियों की गहराई में झांकते गांव

शिलॉन्ग की सुबह किसी कवि की कल्पना से कम नहीं लगती। सुबह के सात बजे मैं अपने ड्राइवर खरबुदान के साथ निकल पड़ी कोंगथोंग की ओर। हम 'सीटी वाले गांव' के नाम से मशहूर कोंगथोंग की ओर बढ़ रहे थे। कोंगथोंग नाम इतना रहस्यमय था कि मन रोमांच और कौतूहल से भर गया। खरबुदान ने जैसे ही कार मुख्य मार्ग पर मोड़ी, शिलॉन्ग पीछे छूटने लगा और सामने खुलते गए हरे-भरे पहाड़। पक्की सड़क थोड़ी संकरी और घुमावदार होने के साथ ही अत्यंत सुंदर भी थी। हर मोड़ एक नया दृश्य लेकर आता, कभी घाटियों में गहराई तक झांकते गांव, कभी बादलों में छिपे पाइन वृक्ष, तो कभी दूर बहते झरनों की धीमी आवाज। 

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सीढ़ीनुमा खेतों में आलू के फूल

सीढ़ीनुमा खेतों में आलू के फूलों ने बीच रास्ते में कुछ देर रुकने को मजबूर कर दिया। सफेद, गुलाबी और हल्के भटीले रंग के फूल और चारों तरफ पाइन के पेड़ कश्मीर जैसा दृश्य बना रहे थे। खरबुदान ने बताया कि यहां बारिश एक कहानी सुनाने आती है। सचमुच, उन बूंदों की आवाज में किसी अजनबी लोकगीत जैसी मधुरता थी। हमने कई छोटे गांवों को पार किया - साधारण से घर, झाड़ू और आलू के खेत वहां के लोगों के संघर्ष को बयां कर रहे थे। इन गांवों के लोग पर्यटकों के आदी नहीं, लेकिन हर कोई मुस्कान के साथ स्वागत करता है। बच्चों की आंखों में जिज्ञासा और बुजुर्गों की आंखों में अपनापन था।

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यहां शुरू होता है असली मेघालय 

शिलॉन्ग से करीब तीन घंटे की यात्रा के बाद मुख्य सड़क से कटकर निकली एक संकरी सड़क पर गाड़ी नीचे की ओर उतरने लगती है। खरबुदान ने मुस्कराकर कहा, 'अब असली मेघालय शुरू होता है।' यह रास्ता पहले मिट्टी और पत्थरों से बना था। सांसद राकेश सिन्हा ने इस गांव को गोद लिया तो स्थानीय लोगों को यह सड़क नसीब हुई।

सड़क के एक तरफ ताजा काटे गए पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई थी। जगह-जगह लिखा - भूस्खलन क्षेत्र (लैंडस्लाइड एरिया) - डर और रोमांच दोनों पैदा कर रहा था। हम लगभग 1200 मीटर नीचे उतर रहे थे, कोई दूसरी गाड़ी सड़क पर नहीं थी। जैसे ही कोंगथोंग के करीब पहुंचे तो हवा में कुछ अलग तरह की ध्वनि महसूस हुई। हम कोंगथोंग लिखे गेट के पास थे, मानो किसी स्वप्नलोक में पहुंच गए हों। बच्चे खेल रहे थे। साइकिल चलाते एक बच्चे को मैंने रोकना चाहा, तो उसके पास कोई शब्द नहीं था, न संगीत, न आवाज - वह 'सीटी' थी। मधुर, लयबद्ध और कुछ कहती हुई। मैं चौंक गई!

कोंगथोंग किसी जादुई लोक की तरह दिखता है। पहाड़ी ढलानों पर बसे बांस और लकड़ी के छोटे-छोटे घर, हर ओर हरियाली और बीच से जाती ईंट वाली एक सड़क। गांव के बीच एक छोटा-सा चौक था, जहां कुछ बच्चे खेल रहे थे। तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ आया और सीटी बजाकर किसी को बुलाया। फिर, दूर एक महिला ने ठीक वैसी ही धुन में सीटी बजाकर उत्तर दिया। मैंने ड्राइवर की ओर देखा और उसने मुस्कराकर समझाया - 'यहां हर इन्सान का नाम एक सुर होता है।'

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जिंगरबाई से जन्मे 900 सुरीले नाम 

कोंगथोंग में लोग एक-दूसरे को बुलाने के लिए सीटी बजाते हैं। इस परंपरा को 'जिंगरबाई' कहा जाता है, जिसका अर्थ है... 'प्यार से बुलाने वाली धुन।' यह नाम मां अपने बच्चे को जन्म के समय देती है... न सिर्फ उसका पारंपरिक नाम, बल्कि एक व्यक्तिगत ध्वनि, एक संगीत की रचना, जो केवल उसका होता है। इस गांव में 900लोगों के नाम की अलग-अलग धुन हैं।

सीटी बजाकर कहा - ये मेरा नाम है

गांव में जिस परिवार ने मुझे ठहराया, वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी लोककथा में होता है - सरल, स्नेही और अपनत्व से भरपूर। उनकी बेटी लिडिया, एक शर्मीली, लेकिन जिज्ञासु लड़की थी। वह पानी लेकर आई, फिर धीरे-धीरे मुझसे बातें करने लगी। जब मैंने उससे ‘जिंगरबाई लॉबी’ - सीटी से जुड़े नामों - के बारे में पूछा, तो उसकी आंखों में चमक आ गई। वह झटपट मुझे बाहर ले गई और एक मधुर, लयबद्ध सीटी बजाई। ‘ये मेरा नाम है,’ उसने हंसते हुए कहा। लिडिया ने कहा, “आपको सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन हमारे लिए यह हमारी पहचान है।”

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सीटी की भाषा को पहचानता है जंगल   

गांव के कुछ बुजुर्गों से भी मुलाकात हुई। एक बुज़ुर्ग, जिनके सफेद बाल और झुर्रीदार चेहरा किसी पहाड़ी ग्रंथ की तरह था, उन्होंने बताया कि जब वे जंगलों में जाते हैं तो साथी को पुकारने के लिए सीटी का ही इस्तेमाल करते हैं। “शब्दों से जानवर चौंक जाते हैं, डर जाते हैं। लेकिन, सीटी तो पंछियों की आवाज जैसी होती है। जंगल इसे जानता है, पहचानता है। यह उसकी भाषा है।” लोगों ने बताया कि नजदीक से बुलाने की सीटी छोटी होती है, लेकिन खेतों या कहीं दूर जाने पर सीटी लंबी हो जाती है। 

मैं अवाक् थी...यह केवल एक संचार प्रणाली नहीं थी, यह एक जीवंत संस्कृति थी।

मौत के बाद स्मृति बन जाती है सीटी

गांव के एक बुजुर्ग ने धीमे स्वर में एक और रहस्य साझा किया, 'जब यहां कोई मर जाता है तो उसकी सीटी... उसका नाम... उसी के साथ चला जाता है। कोई और उसकी सीटी नहीं बजाता। वह लय उसकी स्मृति बन जाती है। कुछ भी न रहे, वो सुर हमें हमेशा उसके होने का एहसास देता है।' शब्द गले में अटक गए। कितनी गहराई है इस परंपरा में... जहां एक धुन पहचान, भाव, स्मृति और सम्मान... सबकुछ बन जाती है।

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काठ के फर्श पर काली चाय की चुस्की  

थोड़ी देर बाद चाय परोसी गई। काठ के फर्श पर बैठकर काली चाय और कच्ची सुपारी के पान का स्वाद चखना अदभुत अनुभव था। वह स्वाद किसी फाइव स्टार होटल की प्लेट में नहीं मिल सकता। पास बैठी महिला... शिदाप खांगशित - जिनके चेहरे पर अनुभवों की चमक थी, मुस्कराकर बोलीं, 'मैं राष्ट्रपति के कार्यक्रम में जा चुकी हूं, हमारी परंपरा को दिखाने।' उनकी आंखों में गर्व की चमक थी और चेहरे पर उस गांव की छवि, जिसने अब खुद को दुनिया से जोड़ लिया है, फिर भी अपनी मौलिकता नहीं खोई है।

खासी संस्कृति का जीवंत प्रतीक 

गांव के कुछ अन्य लोगों से बातचीत में पता चला कि कोंगथोंग को अब एक विशेष दर्जा मिल चुका है - 'सीटी वाले गांव' के रूप में। यह खासी समुदाय की संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन गया है, जहां पर्यटक आने लगे हैं। बड़ी-बड़ी गाड़ियां, हाथों में कैमरे, मोबाइल और अनगिनत सवालों के साथ।
वे लोग आते हैं और पूछते हैं:

‘आप कैसे बात करते हैं?’
‘कोई गाना सुनाइए, सीटी वाला!’


गांव की महिलाएं पहले संकोच से मुस्कराती हैं, फिर धीमे से अपनी सीटी बजाती हैं - जैसे कोई गुप्त खजाना किसी अजनबी को सौंप रही हों। उनके लिए यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, जीवन का गूढ़ हिस्सा है। वे थोड़ा पीछे हट जाती हैं, जैसे कोई अपनी आत्मा का अंश दिखा दिया हो, जिसे वे किसी हल्की नज़र से बचाना चाहती हैं।

कोंगथोंग की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग...सभी एक ऐसी परंपरा में जी रहे हैं, जहां मौन भी संवाद करता है और संवाद भी मौन हो सकता है।

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विदाई की सीटी

जब विदा लेने का समय आया तो मन में एक अजीब-सा खालीपन था। लिडिया की मां शिदाप खांगशित से मैंने अनुरोध किया कि मेरे नाम के लिए भी एक सीटी बना दें, तो वो हँसने लगीं, मैंने आपको जन्म नहीं दिया आपके साथ नाभिनाल वाला रिश्ता नहीं जमता। फिर, उन्होंने ने विदाई में मेरे लिए एक सीटी बजाई, और मैंने रुककर उसे रिकॉर्ड कर लिया। वह हँसकर बोली, “अब जब याद आए, तो सुन लेना।”

गाड़ी जैसे ही गांव से बाहर निकली, पीछे घाटियों में वह सीटी धीमे-धीमे गूंजती रही- जैसे कोई स्वर मेरे साथ चल पड़ा हो।

कोंगथोंग केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभूति है... ऐसा ठिकाना, जहां प्रकृति, संस्कृति और आत्मा के बीच कोई दीवार नहीं है। यह उस संसार की याद दिलाता है, जहां भाषा केवल शब्दों में नहीं, सुरों में बहती है; जहां हर संवाद में भावना की गूंज है और हर मौन के पीछे एक गीत छिपा है।



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