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Fertilizer Subsidy: भ्रष्टाचार एवं बिचौलियों पर लगाम के लिए डीबीटी के जरिए किसानों को मिले उर्वरक सब्सिडी
डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Tue, 08 Jul 2025 09:54 PM IST
सार
उर्वरक सब्सिडी प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (डीबीटी) के जरिए दिए जाने से किसानों को समय पर आर्थिक सहायता मिलेगी और भ्रष्टाचार एवं बिचौलियों की भूमिका पर भी लगाम लगेगी। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा भी मजबूत की जा सकती है।
उर्वरक सब्सिडी के उपयोग को युक्तिसंगत बनाने के लिए इसके वितरण के तरीके में सुधार की आवश्यकता है।
- फोटो : गांव जंक्शन
भारत में 40 करोड़ एकड़ कृषि योग्य भूमि है, जो दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए शुरू की गई हरित क्रांति ने गेहूं, धान, बाजरा, ज्वार और मक्का की हाइब्रिड किस्मों के साथ उत्पादन और उत्पादकता में कई गुना वृद्धि की। इसके परिणामस्वरूप, पिछले पांच दशकों से भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है और 50000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का चावल निर्यात करता है। वर्ष 2022 में, भारत में 193 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरक खपत थी और कुल 30 करोड़ मीट्रिक टन उर्वरक खपत हुई, जो दुनिया में दूसरी सबसे अधिक खपत है।
उत्पादन से अधिक उर्वरक खपत
यूरिया सबसे अधिक उपयोग होने वाला उर्वरक है और इसकी मांग को पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी में गेहूं-धान फसल चक्र की उत्पादकता 10 टन प्रति हेक्टेयर से अधिक है, जहां उर्वरक खपत राष्ट्रीय औसत से दोगुनी (250 किग्रा नाइट्रोजन, 120 किग्रा फॉस्फोरस, 200 किग्रा पोटैशियम प्रति हेक्टेयर) है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में धान की 2-3 फसलों के चक्र में अधिक उर्वरक की खपत होती है। जबकि, वर्षा आधारित फसलों (बाजरा, ज्वार, दलहन, तिलहन) वाले राज्यों में इसकी खपत कम है। गन्ना और कंद वाली फसलों को अधिक पोषक तत्वों की जरूरत होती है, जिससे उनकी उर्वरक खपत भी अधिक है।
उर्वरक सब्सिडी नीति और चुनौतियां
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने उर्वरक सब्सिडी नीति अपनाई है, जिसके तहत औसतन 1.5 लाख करोड़ रुपये सालाना दिए जाते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 1.68 लाख करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी का अनुमान है, जिसमें यूरिया के लिए 1.19 लाख करोड़ और फॉस्फेटिक-पोटाश उर्वरकों के लिए 49,000 करोड़ रुपये शामिल हैं। यूरिया का मूल्य 267 रुपये प्रति 45 किग्रा बैग तय है, जो बिना सब्सिडी के 1750 रुपये हो सकता है। डीएपी का मूल्य 1350 रुपये प्रति बैग है, जो बिना सब्सिडी बढ़कर 3500 रुपये हो सकता है। हालांकि, 2023-24 में सब्सिडी खर्च 1.88 लाख करोड़ से घटकर 1.77 लाख करोड़ रुपये रहा। आयात और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कमी इसका प्रमुख कारण है।
उर्वरक दुरुपयोग और किसानों की परेशानी
दुर्भाग्यवश, सब्सिडी वाले उर्वरकों का आधे से अधिक हिस्सा उद्योगों में गैर-कानूनी रूप से उपयोग हो रहा है, जिससे किसानों को सब्सिडी का लाभ नहीं मिलता। बुवाई के समय उर्वरकों की कमी के कारण किसानों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है या खुले बाजार से महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। इससे फसल उत्पादकता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सहकारी कंपनी इफको द्वारा वर्ष 2021 से नैनो यूरिया की जबरन बिक्री भी किसानों के शोषण का कारण बनी है। इफको का दावा है कि 500 मिली नैनो यूरिया 50 किग्रा यूरिया की जगह लेता है, लेकिन पंजाब कृषि विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने इसे कृषि के लिए अप्रभावी पाया। हालांकि, वर्ष 2024-25 में इफको ने नैनो यूरिया की 876 करोड़ रुपये मूल्य की 365 लाख बोतलें बेचीं।
प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण है समाधान
उर्वरकों का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकार कई वर्षों से प्रयासरत है। सबसे प्रभावी समाधान उर्वरक सब्सिडी का प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (डीबीटी) है। भूमि राजस्व रिकॉर्ड आधारित किसान कार्ड के जरिए प्रति एकड़ सिंचित भूमि के लिए 7000 रुपये और बारानी भूमि के लिए 4000 रुपये की सब्सिडी दी जा सकती है। कृषि मंत्रालय ने पीएम-किसान, फसल बीमा योजना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के डाटा को उर्वरक मंत्रालय के साथ साझा किया है। डीबीटी से पारदर्शिता बढ़ेगी, भ्रष्टाचार कम होगा और उर्वरक की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित होगी। यह किसानों को उर्वरकों का युक्तिसंगत उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित करेगा।
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