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HARYANA: धान की सीधी बिजाई का लक्ष्य अधूरा, भूजल संरक्षण को झटका, पराली प्रबंधन के लक्ष्य पर भी पड़ेगा असर

डॉ. वीरेन्द्र सिह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 11 Jun 2025 01:14 PM IST
सार

हरियाणा में धान की सीधी बिजाई और पराली प्रबंधन से जुड़ी योजनाएं भूजल और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कृषि विभाग की अनदेखी और बकाया भुगतान की समस्या ने इनके लक्ष्यों को जोखिम में डाल दिया है। नीतिगत सुधार, समय पर प्रचार और भुगतान प्रक्रिया को सरल करके इन खामियों को दूर किया जा सकता है। धान उत्पादन की डीएसआर विधि को बढ़ावा और पराली प्रबंधन को प्रभावी बनाकर टिकाऊ खेती और पर्यावरण संरक्षण में हरियाणा मिसाल कायम कर सकता है।
 

सीधी बिजाई धान का लक्ष्य अधूरा, हरियाणा में भूजल संरक्षण और पराली प्रबंधन को झटका।
सीधी बिजाई धान का लक्ष्य अधूरा, हरियाणा में भूजल संरक्षण और पराली प्रबंधन को झटका। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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हरियाणा में भूजल संरक्षण और पर्यावरण हितैषी खेती को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई धान की सीधी बिजाई (DSR) विधि और पराली प्रबंधन योजनाएं कृषि विभाग की उपेक्षा के कारण संकट में हैं। खरीफ-2025 के लिए निर्धारित 4 लाख एकड़ डीएसर का लक्ष्य और पराली प्रबंधन की योजनाएं विभाग की जटिल कार्यशैली और देरी के कारण पूरा होने की संभावना कम है। पिछले साल के 200 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान और देर से प्रचार ने किसानों का विश्वास डगमगाया है, जिससे इन योजनाओं में उनकी रुचि घट रही है। यह स्थिति न केवल भूजल संरक्षण को प्रभावित करेगी, बल्कि पराली प्रदूषण की समस्या को भी बढ़ाएगी।

भूजल संरक्षण की कुंजी धान की सीधी बिजाई 
धान की सीधी बिजाई (DSR) तकनीक हरियाणा में भूजल संरक्षण का एक प्रभावी तरीका हो सकती है, जहां भूजल संकट बढ़ रहा है। यह विधि पारंपरिक रोपाई की तुलना में 30% कम पानी, बिजली, ऊर्जा, और श्रम की खपत करती है। साथ ही, यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करती है और फसल को 10-15 दिन पहले पकने में मदद करती है, जिससे पराली प्रबंधन आसान हो जाता है। हरियाणा सरकार ने खरीफ-2025 के लिए 4 लाख एकड़ (कुल धान क्षेत्र का 10%) पर DSR विधि से धान की खेती का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए 4,500 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन और पराली प्रबंधन के लिए 1,200 रुपये प्रति एकड़ की घोषणा की गई है।

समय पर किसानों को जागरूक करना जरूरी 
DSR विधि से धान की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय 20 मई से 5 जून तक है, लेकिन कृषि विभाग ने प्रोत्साहन योजना का विज्ञापन 7 जून को प्रकाशित किया, जब बुवाई का समय समाप्त हो चुका था। यह एक गंभीर लापरवाही है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए। देरी और खानापूर्ति की इस प्रवृत्ति ने किसानों की योजना में भागीदारी को प्रभावित किया है, जिससे 4 लाख एकड़ का लक्ष्य मुश्किल लग रहा है। समय रहते यदि किसानों को धान की सीधी बिजाई की जानकारी मिल जाती, तो इसकी खेती का रकबा बढ़ाया जा सकता था, जिसे अब झटका लगने की संभावना बढ़ गई है। 

बकाया भुगतान से किसानों का विश्वास टूटा
पिछले साल 50,540 किसानों ने 1.80 लाख एकड़ पर DSR विधि को अपनाया, लेकिन कृषि विभाग ने अभी तक 200 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान (DSR के 55 करोड़ और पराली प्रबंधन के 145 करोड़) जारी नहीं किए हैं। इस जटिल और किसान-विरोधी कार्यशैली ने किसानों का सरकारी योजनाओं में भरोसा कम किया है। परिणामस्वरूप, खरीफ-2025 में किसानों ने इन योजनाओं में कम रुचि दिखाई, जिससे DSR विधि से धान की खेती और पराली प्रबंधन के लक्ष्य पर असर पड़ने की आशंका है।

हरियाणा में भूजल संकट रोपाई का दुष्परिणाम
हरियाणा में 2022-23 में 16 लाख हेक्टेयर पर धान की खेती हुई, जिससे 59 लाख टन उत्पादन हुआ। 1968 तक किसान पर्यावरण हितैषी DSR विधि का ही उपयोग करते थे, लेकिन हरित क्रांति के दौरान रोपाई विधि को बढ़ावा देने से भूजल संकट गहरा होता चला गया। आज हरियाणा के अधिकांश ब्लॉक भूजल के लिए ग्रे-जोन में हैं। DSR विधि को फिर से अपनाना भूजल संरक्षण और टिकाऊ खेती की दिशा में एक जरूरी कदम है।

नीतियों में सुधार और सख्ती की जरूरत 
सरकार को DSR विधि से धान उत्पादन और पराली प्रबंधन योजनाओं को किसान-हितैषी बनाने के लिए खामियों को दूर करना होगा। रोपाई धान पर पूर्ण प्रतिबंध और DSR विधि को अनिवार्य करना जलवायु परिवर्तन के दौर में जरूरी है। इसके अलावा, सभी कंबाइन हार्वेस्टर पर सुपर-स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) को कानूनी रूप से अनिवार्य करने से पराली को जैविक खाद में बदला जा सकता है, जिससे प्रदूषण कम होगा और मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी।
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