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तीन दोस्तों का डेयरी मॉडल : आठ गायों से शुरू हुआ सफर, अब 50 गोवंश का परिवार, बिलोना घी ने संवारी जिंदगी

रामजी मिश्र, कृषि एवं ग्रामीण विकास पत्रकार Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 17 Oct 2026 03:37 PM IST
सार

आठ गायों की आहट से शुरू हुई यह कथा अब पचास गोवंश के आंगन तक आ पहुंची है। शाहजहांपुर के पसगवां में तीन दोस्तों ने दूध की धार से रोजगार की राह निकाली और बिलोना घी में मेहनत का स्वाद घोल दिया।

गोशाला में गायों के लिए आर.ओ. का पानी, मालिश की मशीन और निगरानी के लिए सेंसर की व्यवस्था है।
गोशाला में गायों के लिए आर.ओ. का पानी, मालिश की मशीन और निगरानी के लिए सेंसर की व्यवस्था है। - फोटो : रामजी मिश्र
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विस्तार
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शाहजहांपुर के पसगवां गांव में तीन दोस्तों ने नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने की राह चुनी। राजस्थान से लाई गई आठ गायों से शुरू हुआ उनका सफर आज 50 गोवंश का परिवार बन चुका है। यहां गायों को मालिश मिलती है, सेंसर सेहत उनकी पर नजर रखते हैं और घी बनता है बिलोना विधि से। आलोक मिश्र, गोपाल शर्मा और विशाल शर्मा ने जॉब क्रिएटर बनने की ठानकर यह डेयरी शुरू की। शाहजहांपुर मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर दूर पसगवां की यह आधुनिक गोशाला शुरुआत से ही बीस से पच्चीस लोगों को रोज आजीविका भी दे रही है।

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आठ साहीवाल, एक बड़ा सपना
गायों के लिए आर.ओ. का पानी, मालिश की मशीन और निगरानी के लिए सेंसर लगाए गए हैं। सेंसर बुखार, हीट में आने या किसी समस्या की सूचना तुरंत देते हैं। गायों को बांधा नहीं जाता, बल्कि चरने-टहलने के लिए खुला भू-भाग है और हर गाय के पास सेंधा नमक का बड़ा खंड रहता है।

मेन्यू के अनुसार सहजन, गिलोय, भूसा, हरी घास, नेपियर और ज्वार जैसे चारे बदल-बदलकर दिए जाते हैं। गोपाल शर्मा बताते हैं, वर्ष 2023 में तीनों दोस्तों ने स्थानीय रोजगार देने का संकल्प लिया। आलोक मिश्र ने योजना बनाई और तीनों ने राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश में घूमकर डेयरी संचालन सीखा।

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एन.डी.आर.आई., करनाल से प्रशिक्षण भी लिया। 2024 में राजस्थान के गंगानगर से करीब एक-एक लाख रुपये में आठ साहीवाल गायें खरीदीं, जिन पर करीब आठ लाख रुपये खर्च हुए। गायों के आने से पहले मौसम से बचाव के लिए विशेषज्ञों की सलाह पर शेड बनाया गया, जिसमें ऊंचाई, ढलान, कच्चे-पक्के हिस्से व नालियों की गहराई तय की गई।

सरकार से भी गोशाला को मिला सहारा
वर्ष 2024-25 में गोशाला का चयन मिनी नंदिनी कृषक समृद्धि योजना में हुआ। करीब 23.60 लाख रुपये की परियोजना पर 11.80 लाख रुपये का अनुदान मिला। आज यहां 26 वयस्क गायों समेत 50 गोवंश हैं, जिनमें करीब 11 गायें दूध देती हैं। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद के अनुसार, जिले में वर्ष 2024 में चार लाभार्थी योजना से जुड़े।

वर्ष 2025-26 में आठ का लक्ष्य था, लेकिन सभी 15 आवेदक चुने गए। वर्ष 2026-27 में छह का लक्ष्य है। जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं, योजना से पशुपालक साहीवाल, गिर और थारपारकर जैसी उच्च उत्पादन क्षमता वाली नस्लों की डेयरी शुरू कर रहे हैं।

यह योजना प्रदेश के सभी जिलों में लागू है और 50 प्रतिशत महिला पशुपालकों के चयन का प्रावधान है। दस गायों की इकाई की अनुमानित लागत 23.60 लाख रुपये है, जिस पर 50% (अधिकतम 11.80 लाख रुपये) अनुदान दो किस्तों में मिलता है।

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दूध-घी से 37 लाख की आय
गोपाल शर्मा बताते हैं कि औषधीय दूध करीब 90 रुपये लीटर बिकता है। रोज लगभग 95 लीटर दूध मिलता है, जिसमें 80 लीटर की बिक्री से सालाना करीब 25 लाख रुपये आते हैं। बाकी दूध से मट्ठा और घी बनता है। सर्दियों में उत्पादन करीब 150 लीटर प्रतिदिन हो जाता है।

बिलोना घी का बाजार भाव 3,000-3,500 रुपये किलो है, लेकिन तीनों दोस्त इसे करीब 2,900 रुपये किलो में बेचते हैं। साल में करीब तीन क्विंटल घी से लगभग नौ लाख रुपये और रोज 20-22 लीटर छाछ की बिक्री से करीब तीन लाख रुपये मिलते हैं। इस तरह, डेयरी की सालाना आय करीब 37 लाख रुपये पहुंच गई है।

दूध और घी शाहजहांपुर शहर में दुग्ध वाहन से और ऑनलाइन भी पहुंचाए जाते हैं। मांग बढ़ने के साथ तीनों दोस्त काम विस्तार की तैयारी में हैं।

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बचत नहीं, बस्ती की खुशहाली
गोशाला में करीब 10 स्थाई कर्मचारी व एक भंडारी काम करते हैं। कर्मचारियों को भोजन, आधा लीटर दूध और ड्रेस मिलती है। चिकित्सकीय देखरेख, सफाई व आपूर्ति पर करीब 18 लाख रुपये और चारे-पोषण पर 15 लाख रुपये सालाना खर्च होते हैं। गोपाल और विशाल शर्मा अपनी जमीन पर चारा भी उगाते हैं, जिससे लागत घटती है। आलोक मिश्र बताते हैं, गोबर की खाद से उगे चारे में रसायन नहीं डाला जाता। गोमूत्र से कीटनाशक द्रव्य भी बनाया जाता है। 

इन युवाओं का लक्ष्य अपने काम को बढ़ाकर अधिक लोगों को रोजगार देना अधिक है। तीन दोस्तों का कहना यही रहा है कि अपने लिए बचत नहीं देखनी है। अभी तो खास बचत भी नहीं हो रही, लेकिन जिन परिवारों की आजीविका यहां से जुड़ी है, उनको सहारा मिलना ज्यादा मायने रखता है।
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