सीतापुर के पाल्हापुर गांव के लगभग 70 वर्षीय मूलचंद राजवंशी पिछले तीन दशकों से युवाओं को नि:शुल्क कुश्ती सिखा रहे हैं। अविवाहित रहकर जीवन कुश्ती को समर्पित करने वाले मूलचंद के अखाड़े में सुबह चार बजे से प्रशिक्षण शुरू हो जाता है। उनके कई शिष्य सेना-पुलिस में हैं, लेकिन अखाड़े के लिए अब भी स्थायी जमीन नहीं है।
सुबह के चार बज रहे होते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 110 किलोमीटर दूर, सीतापुर जिले के पाल्हापुर गांव में यही दंगल का समय होता है। हल्की ठंडक और सन्नाटे के बीच अलग-अलग गांवों और जिलों से आए 20–30 युवा सड़क किनारे बने एक साधारण से वर्गाकार अखाड़े में इकट्ठा होने लगते हैं। मिट्टी की खुशबू और जोश से भरे माहौल में यहीं से शुरू होती है कुश्ती की कड़ी ट्रेनिंग।
सीतापुर की महोली तहसील के इस गांव में लगभग 70 वर्षीय मूलचंद राजवंशी पिछले कई दशकों से युवाओं को कुश्ती सिखा रहे हैं। उन्होंने विवाह न करने का संकल्प लेकर अपना पूरा जीवन इस परंपरागत खेल को समर्पित कर दिया। खास बात यह है कि वे बिना किसी फीस के प्रशिक्षण देते हैं। रोजाना सुबह करीब 4 बजे से शुरू होकर यह अभ्यास सत्र सुबह 8 बजे तक चलता है, जिसमें दांव-पेच, फिटनेस और अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
मूलचंद की ख्याति आसपास के जिलों तक फैली हुई है। लखीमपुर, हरदोई और अन्य क्षेत्रों से भी युवा उनके पास कुश्ती सीखने आते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका यह अखाड़ा युवाओं के लिए न सिर्फ प्रशिक्षण का केंद्र है, बल्कि जुनून, अनुशासन और संघर्ष का प्रतीक भी बन चुका है।
सेना और पुलिस में सेवाएं दे रहे शिष्य
मूलचंद के सिखाए बच्चों ने पहले स्कूल में कुश्ती जीतना शुरू किया। फिर, आसपास के स्थानीय दंगलों में भी उनके शिष्य जीतने लगे। उनके सिखाए कई लोग सेना में भर्ती हुए और कुछ पुलिस बल में सेवाएं दे रहे हैं। महोली तहसील के तीन सगे भाइयों को इन्होंने कुश्ती सिखाई और तीनों ने भारतीय सेना में सेवाएं दीं। 24 किलोमीटर दूर हरगांव से कुश्ती सीखने आए युवा बॉबी पांडे बताते हैं, 'मुझे कुश्ती में रुचि पैदा हो गई है और हम यहां हर रोज आते हैं।'
अपने बारे में बताते हुए वह कहते हैं, 'मेरे ताऊ पहलवानी करते थे। उन्हें देखकर मैंने भी कुश्ती के दांव-पेच सीख लिए। आसपास का कोई भी व्यक्ति मुझसे कभी कुश्ती में नहीं जीत सका। जहां भी दंगल होता, मैं उसे देखने निकल पड़ता। दूर के दंगलों में भी कभी पैदल तो कभी साइकिल से पहुंच जाता। फिर, मैने सोचा कि मैं बच्चों को भी कुश्ती सिखाऊंगा। वर्ष 1993 से मैने यह काम शुरू कर दिया।' कुश्ती का यह गुरुकुल तीन दशक से अधिक समय से चल रहा है। लेकिन, मूलचंद कहते हैं कि हमारे पास अखाड़े के लिए स्थाई जमीन नहीं है।
गरीब परिवारों के बच्चों को सिखाते हैं कुश्ती
मूलचंद के पास कुश्ती सीखने वालों में बहुत से गरीब परिवारों के बच्चे हैं। 14 वर्षीय मोहन कुमार गौतम मूलचंद के होनहार शिष्यों में से एक हैं। मोहन जब डेढ़ साल के थे, तब उनकी मां की सिंचाई के इंजन में फंसने से मौत हो गई थी। इसके बाद, वह अपने नाना-नानी के घर पाल्हापुर चले आए। मोहन यादव लगभग दो साल से कुश्ती सीख रहे हैं और अब उन्हें ढाक, कला जंग, मुल्तानी, दंडक और चरखा जैसे कई दांव-पेच आने लगे हैं। मोहन ने इस साल मार्च में लखीमपुर जिले के कंधरा गांव में वर्षों से चली आ रही कुश्ती में हिस्सा लिया और लगातार 6 कुश्तियां जीतीं। उन्हें लगभग 300 रुपये ईनाम के रूप मिले, जो उन्होंने अपने नाना-नानी को दे दिए। कक्षा 9 में पढ़ने वाले मोहन बताते हैं, उनके वर्तमान स्कूल में कुश्ती जैसे खेल नहीं होते। वह चाहते हैं कि उनका एडमिशन किसी ऐसे स्कूल में हो जाए, जहां कुश्ती की प्रतियोगिताओं में भाग लेने का मौके उन्हें मिल सके।
गांव में कुश्ती के प्रति भर रहे हैं जुनून
ग्रामीण इलाके के कुश्ती के गुरू मूलचंद युवाओं में कुश्ती के प्रति अनोखा जुनून भर रहे हैं। शायद इसी का नतीजा है कि आसपास के स्कूलों के छात्र कुश्ती प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। कक्षा आठ में पढ़ने वाला नीरज राठौर अपने स्कूल की तरफ से शिक्षा विभाग की 69वीं प्रदेशीय विद्यालयीय कुश्ती प्रतियोगिता खेलने गोरखपुर तक गए। नीरज बताते हैं, 'वर्ष 2025–26 की इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। हालांकि, मैं इसे जीत नहीं सका। हम अगले साल इसे जीतने के लिए पूरी जान लगा देंगें। नीरज पाल्हापुर के अखाड़े में 4 किलोमीटर दूर बड़ागांव से कुश्ती सीखने आते हैं।'
नीरज के पिता मिश्रीलाल राठौर अपने बच्चे की मेहनत से बहुत खुश हैं और वह चाहते हैं कि उनका बेटा एक दिन देश के लिए कुश्ती खेले।
करौंदी गांव के रहने वाले 18 वर्षीय आयुष सिंह बताते हैं, 'बचपन में मेरे शरीर में बहुत दर्द रहता था। मेरे पिता ने एक दिन मुझे इस अखाड़े में लाए और यहां होने वाली कुश्ती दिखाई। उसके बाद, मैं रोज सुबह उठकर यहां की कुश्ती देखने आने लगा। एक दिन गुरु जी से मैने भी कुश्ती सीखने की इच्छा जाहिर की और मैं अब कुश्ती सीख रहा हूं।' आयुष 14 साल की अवस्था से कुश्ती खेल रहे हैं और कई बार जिला स्तर पर भी खेले हैं। वह तीन बार प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं। साल 2025 में, उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय की तरफ से ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी यूथ गेम्स की कुश्ती में प्रतिभाग किया था।
मिट्टी में हल्दी, तेल, मट्ठा का छिड़काव
अखाड़ा आमतौर पर एक वर्गाकार भूमि होती है, जिसकी मिट्टी को बार-बार खोदाई कर भुरभुरी और बारीक बनाया जाता है। अखाड़े की मिट्टी में समय-समय पर हल्दी, तेल, मट्ठा और पानी का छिड़काव कर उन्हें अच्छी तर मिला दिया जाता है। मूलचंद बताते हैं, इन तत्वों के मिश्रण से तैयार यह मिट्टी शरीर के लिए लाभकारी बन जाती है।
चुनौतियों से जूझ रहा ग्रामीण अखाड़ा
रिंकू भारती, अभिराज सिंह, आदर्श सिंह और अनुराग समेत कई खिलाड़ियों का कहना है कि उनके पास कोई स्थायी अखाड़ा नहीं है, इसलिए उन्होंने सड़क किनारे ही अभ्यास स्थल बना रखा है। खेतों की सिंचाई के दौरान वहां पानी भर जाता है, जिससे अभ्यास प्रभावित होता है। बरसात में भी जलभराव की समस्या बनी रहती है। खिलाड़ियों की मांग है कि उन्हें स्थायी अखाड़े के लिए जगह उपलब्ध करायी जाए।
कई खिलाड़ियों के घरों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में, वह ऐसे खानपान की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं, जो किसी पहलवान के लिए जरूरी होती है। कई खिलाड़ी इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे अपनी बेहतर डाइट की व्यवस्था नहीं कर पाते। कुश्ती सिखा रहे मूलचंद डाइट को लेकर कहते हैं कि 'जो चाहे बना, वो खाए चना।' इसके अलावा, दूध और घी के सेवन पर भी वह जोर देते हैं।
ओलंपिक में पदक जीतने का सपना
मूलचंद का सपना है कि उनके शिष्य एक दिन देश के लिए पदक जीतें। बढ़ती उम्र के बावजूद सफेद दाढ़ी वाले गुरुजी मूलचंद राजवंशी का जोश कम नहीं हुआ है, बल्कि वे युवाओं में कुश्ती के प्रति उत्साह जगाने के लिए और अधिक प्रेरित नजर आते हैं।
(यह स्टोरी मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के मई 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)