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Peharua Village S Rare Turtle Haven How A Community United To Save An Endangered Species
गांव का प्यार संकटग्रस्त जीवों की बना ढाल : कुर्मू ताल के दुर्लभ कछुओं को नाम से बुलाते हैं पहरुआ गांव के लोग
रामजी मिश्र, शाहजहांपुर
Published by: Umashankar Mishra
Updated Sat, 11 Jul 2026 02:47 PM IST
सार
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के गांव पहरुआ के तालाब में संकटग्रस्त प्रजातियों के सैकड़ों कछुए सदियों से ग्रामीणों के साथ सांस लेते आए हैं। प्रदूषित होते पानी, कचरे के बढ़ते बोझ और सिकुड़ते दायरे के कारण तालाब और इसमें रहने वाले दुर्लभ कछुओं को बचाने के लिए गांव के लोग, वन विभाग और प्रशासन अब एकजुट हो उठे हैं।
पहरुआ गांव ने संकटग्रस्त कछुओं व कचरे के बोझ से दबे कुर्मू ताल के संरक्षण की मिसाल पेश की है।
- फोटो : एआई
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर, धूल भरे रास्तों के पार बसा है पहरुआ - एक ऐसा गांव जिसकी पहचान बस्ती के बीचोबीच स्थित तालाब से है। कुर्मू ताल नामक उस तालाब में रहते हैं वे दुर्लभ, संकटग्रस्त, सदियों पुराने कछुए, जिन्हें यहां के लोग न केवल जानते हैं, बल्कि उनसे प्यार करते हैं, उनकी रक्षा करते हैं, और उनके नाम भी रखते हैं।
लगभग 1,200 मतदाताओं वाले पहरुआ गांव ने जो काम किया है, वह बड़े-बड़े संरक्षण संगठनों के लिए भी एक मिसाल है। राम गंगा नदी से महज 200 मीटर दूर, बाढ़ के थपेड़े झेल चुका और प्रदूषण से जूझता यह तालाब आज एक नई करवट ले रहा है।
पहरुआ गांव के बच्चों ने इन कछुओं के नाम भी रखे हैं।
- फोटो : रामजी मिश्र
बच्चे नाम से बुलाते हैं, कछुए चले आते हैं
तालाब के किनारे खड़े होकर जब गांव के बच्चे आवाज लगाते हैं, तो पानी की सतह पर हलचल होने लगती है। कुछ ही क्षणों में दर्जनों कछुए एक साथ बाहर आ जाते हैं। गांव के बच्चों ने कछुओं के नाम भी रख दिए हैं - कोई 'भूरा' है, कोई 'बड़कू'। यह महज नामकरण नहीं, यह एक रिश्ते की भाषा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
तालाब के पश्चिमी छोर पर रहने वाले 28 वर्षीय प्रेमशरण शर्मा बताते हैं कि कछुओं और यहां के लोगों का साथ-साथ रहना पीढ़ियों से चला आ रहा है। यह तालाब उनके पुरखों के जमाने में भी ऐसा ही था - जीवंत, गहरा, और इन जीवों से भरा। धार्मिक आस्था भी इस रिश्ते को और गहरा बनाती है।
दबी हुई पीठ और पांच नाखूनों वाले ये कछुए यहां के लोगों को समुद्र मंथन और कच्छप अवतार का स्मरण कराते हैं। ग्रामीणों के लिए ये केवल जलीय जीव नहीं - ये पूज्य हैं, शुभ हैं।
पहरुआ गांव के लोग, प्रशासन, वन विभाग अब इन कछुओं को बचाने के लिए एकजुट हो उठे हैं।
- फोटो : रामजी मिश्र
वैज्ञानिक आंकड़ों की कड़वी सच्चाई
गांव के लोगों की आस्था और स्नेह के बावजूद, तालाब और कछुओं का जीवन धीरे-धीरे खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा था। वर्ष 2026 की फरवरी में वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया ने सर्वेक्षण किया तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। तालाब में दो संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान हुई - ब्लैक पॉन्ड टर्टल (जियोक्लेमिस हैमिल्टोनियाई) और इंडियन सॉफ्टशेल कछुआ (निल्सोनिया गैंगेटिका)। ये दोनों प्रजातियां वन्यजीव अधिनियम1972 की अनुसूची एक के तहत संरक्षित हैं - अर्थात् इनका शिकार दंडनीय अपराधों में गिना जाता है।
गांव के तालाब के पानी की गुणवत्ता की स्थिति भी भयावह थी। किसी भी स्वस्थ तालाब में घुलित ऑक्सीजन का स्तर कम से कम चार मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। मगर, यहां पहले नमूने में यह 2.8 और दूसरे में मात्र 1 मिलीग्राम प्रति लीटर घुलित ऑक्सीजन दर्ज की गई। टीडीएस की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 500 है, जबकि दोनों नमूनों में यह 813 और 948 पाई गई। अमोनिया का स्तर भी तय मानक से कई गुना अधिक था, और पानी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की उपस्थिति भी दर्ज हुई।
लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के वैज्ञानिक अनिल गौतम कहते हैं, ऐसे प्रदूषण का असर पूरी खाद्य शृंखला पर पड़ता है। वह बताते हैं, जब ऑक्सीजन नहीं होगी तो छोटे जीव नहीं बचेंगे, और जब छोटे जीव नहीं बचेंगे तो कछुए भी नहीं बचेंगे। इसके अलावा, तालाब के आसपास से सात नालियां सीधे तालाब में गिरती थीं। किनारों पर गोबर के ढेर, झोपड़ियां और वाहन खड़े करने की आदतें तालाब को धीरे-धीरे निगल रही थीं। कभी एक एकड़ में फैला यह तालाब - जिसकी गहराई आज भी लगभग 15 फीट है - सिकुड़ता जा रहा था।
शाहजहापुर के जिलाधिकारी जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने पहरुआ के तालाब को कुर्मू ताल नाम दिया है।
- फोटो : रामजी मिश्र
गांव उठा और तालाब को दी नई सांस
पहरुआ गांव के 70 वर्षीय ब्रजकिशोर शर्मा की पीड़ा उनके शब्दों में साफ झलकती है - 'हम अब इसमें कूड़ा नहीं डालते, लेकिन हमारे घरों की नालियां सीधे इसमें जाती हैं। हम चाहते हैं कि नालियों का रास्ता बदल दिया जाए।' गांव के लोगों की बदलाव की यह भावना सामूहिक अभियान बन गई।
हाल में ग्रामीणों ने पर्यावरण प्रेमियों, वन्यजीव कार्यकर्ताओं, स्थानीय नेताओं और जिला प्रशासन के साथ मिलकर एक चौपाल की और काम में जुट गए। जिलाधिकारी द्वारा 'कछुआ मैन' की उपाधि से सम्मानित आलोक मिश्र बताते हैं, तालाब की सफाई की गई तो प्लास्टिक, कांच, रबड़, थर्मोकोल और मेडिकल अपशिष्ट के कचरे से कई ट्रालियां भर गईं।
तालाब की सफाई में पूरा एक महीना लगा। 40 वर्षीय कृष्ण पाल कठेरिया कहते हैं कि गांव का पुराना नाला ठीक हो जाए, तो गंदे पानी को तालाब से बाहर मोड़ा जा सकता है। युवा महिपाल गुर्जर सोशल मीडिया पर इन कछुओं की रील्स बनाकर दुनिया को बताते हैं कि 'हमारे गांव में आज भी सदियों पुरानी यह अनमोल जैव विविधता है।'
कछुआ संरक्षण में जुटे युवाओं को मिला सम्मान।
- फोटो : रामजी मिश्र
रात का पहरा - शिकारियों से जंग
यह सब इतना आसान भी नहीं था। रात के अंधेरे में शिकारियों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। लेकिन, गांव के लोगों की सजगता के आगे हर बार उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा है। डीएफओ सचिन कुमार बताते हैं, वन विभाग का स्टाफ रात्रि में अचानक निरीक्षण करता है और गश्त भी करते हैं।
कुर्मू ताल बनेगा पर्यटन-प्रेरणा का केंद्र
जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह भी जून के महीने में पहरुआ गांव पहुंचे। उन्होंने गांव के तालाब को 'कुर्मू ताल' नाम दिया और यहां पिकनिक स्पॉट बनाने की घोषणा भी की। इसी दौरान सीएसआर फंड से 10 लाख रुपये की लागत से तालाब के आसपास विकास कार्य कराने, सीसीटीवी कैमरे लगाने और नालियों में फिल्टर चैंबर बनाने की योजना भी सामने आई।
इस कार्यक्रम में कछुआ संरक्षण में जुटे युवाओं - आलोक मिश्र, प्रेमशरण शर्मा, ऋषि सिंह, देवसरन शर्मा, धर्मेंद्र सिंह और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के रंजीत - को 'कछुआ मित्र सम्मान' से नवाजा गया। जिलाधिकारी के पर्यावरण प्रेम को देखकर ग्रामीणों ने भी उन्हें तालाब और कछुआ संरक्षण से जुड़ा स्मृति चिह्न भेंट किया। यह आदान-प्रदान महज औपचारिकता नहीं, एक साझे संकल्प का प्रतीक बन गया।
जिला गंगा समिति के जिला परियोजना अधिकारी डॉ. विनय कुमार सक्सेना कहते हैं - 'यह गांव इन दुर्लभ प्रजातियों की वजह से एक विशेष पहचान रखता है। जन सहभागिता से जो काम हुआ है, वह अभूतपूर्व है।'
पहरुआ गांव की कहानी केवल कछुओं की नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की कहानी है, जो इन्सान और प्रकृति के बीच तब बनता है, जब लोग अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं। यह उस सामूहिक चेतना की कहानी है, जहां मजदूर से लेकर युवा, किसान और जिलाधिकारी तक सब एक ही लक्ष्य के लिए कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।
(यह स्टोरी मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जुलाई 2026 अंक में प्रकाशित की गई है।)
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